Saturday, December 9, 2017

Friday, December 8, 2017

यूपी-बिहार की पैसेंजर ट्रेनों में एक साथ कई मोर्चे पर युद्ध करना होता है। पटना में गया वाली ट्रेन जैसे ही रुकी, मुझे आपातकालीन खिड़की के पास सीट खाली दिखाई दी। मैंने कंधे से बैग उतार कर ऊपर की रेक में घुसाया और बैठने के लिए झुका तो पाया कि एक पल पहले जो सीट खाली थी उस पर एक महाशय बैठे हुए हैं। सहसा यकीन नहीं हुआ। मुझे लगा कि ग़लती से मैंने भाई साहब को न देखा हो। और फ़कत आँखों को यकीन दिलाने के लिए मैंने उनसे पूछा - भाई साहब! आप एकदम अचानक से सीट पर कैसे प्रकट हो गए?
भाई साहब ने विश्व विजेता मुस्कान के साथ आपातकालीन खिड़की की ओर इशारा करते हुए कहा - 'हम अक्सर ट्रेन में इसी खिड़की की तरफ़ से ही घुसते हैं'।
मैंने आपातकालीन खिड़की का इससे बेहतर इस्तेमाल पहले नहीं देखा था। मन ही मन भाई साहब के टैलेंट को नमन किया और सामने की सीट पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद यात्रियों की भीड़ और सीटों की उपलब्धता में सामंजस्य स्थापित होने के बाद ट्रेन ने सरकना शुरू किया। मेरे साथ यात्रा कर रहे आचार्य मित्र आसपास के माहौल से विरक्त कंपटीशन बुक में खोए हुए थे। मुझे भी न चाहते हुए किताब खोलनी पड़ी। जैसे ही किताब में रेखांकित किए गए एक पद की पंक्ति पर नज़र गई - 'कबहूँ वा विसासी सुजान के आँगन मों अँसुवानि लै बरसौ'...
'घनानंद' के विरहाकुल आँसुओं में मैं पूरी तरह डूबता उसके पहले ही पीछे की सीट से किसी देशद्रोही कंपनी के मोबाइल ने जैसे शंखनाद किया - पियवा से पहिले हमार रहलू ऽऽ...
घनानंद के उस रीतिकालीन विरह के आँसुओं पर जब यह आधुनिक विरह का ज्वार-भाटा भारी पड़ने लगा तो मैंने किताब बंद कर देना ही ठीक समझा। आखिरकार लगभग तीन घंटे बाद सहयात्रियों के कन्धों के अनचाहे दबाव और कानों पर गिरतीं सांस्कृतिक लाठियों से लड़ते-झगड़ते उतरने का समय आया। गया स्टेशन से बाहर आकर हम हजारीबाग जाने के लिए बस स्टेशन पर पहुँचे। गया का बस स्टेशन मेरे द्वारा देखे गए अब तक के ऐतिहासिक इमारतों में अद्वितीय है। लगभग मर चुके पीले रंग की पियरी में कराहते इस भवन को देख कर लगता है कि अंग्रेज़ों ने इसे जैसे ही रंगवाना शुरू किया होगा वैसे ही उन्हें भारत छोड़ना पड़ा। अपनी दीवारों पर जगह-जगह उग आए पीपल के पौधों को धारण किए यह भवन अपने सरकारी होने के भार को ज़्यादा दिन सहन नहीं कर पाएगा।
खैर! हमने एक कंडक्टर जैसी वेशभूषा वाले सज्जन से पूछा कि - सर हजारीबाग के लिए बस कब है?
उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा - वो सामने दुनिया भर की बसें तो खड़ी हैं...
मैंने कहा - नहीं सर! सरकारी बस कब है?
उन्होंने बताया कि सरकारी बस एक ही है सुबह चली गई। जाना है तो प्राइवेट बस से ही जाइए।
मैंने सरकारी और निजी क्षेत्र के इस अद्भुत सामंजस्य को भी नमन किया। और अब हम उस बस के आसपास चक्कर काटने लगे,जिसे दुल्हन की तरह सजाया गया था और उसके माथे पर मोटे-मोटे अक्षरों से लिखा था 'गया - हजारीबाग सुपरफास्ट एक्सप्रेस मेल'।
तभी बगल में खड़े आचार्य जी ने खुफिया खबर सुनाई कि इस बस का टिकट उस पेड़ की आड़ में मिल रहा है। रुकिए मैं लेकर आता हूँ।
मेरे लिए यह नई बात थी। हमारे यहाँ आप बस की खाली सीट पर बैठ जाइए समयानुसार कंडक्टर आपके पास आकर खुद टिकट दे जाएगा। लेकिन गया में आधी सीटें फोन पर बुक होतीं हैं और बची-खुची बहुत गंभीर सिफारिशों पर। थोड़ी देर बाद आचार्य जी ने आकर बताया कि सारी सीटें बुक हो गई है खड़े होकर जाने की भी सुविधा नहीं है।
हालाँकि हम थोड़े परेशान तो हुए कि अगर समय से बस नहीं मिली हजारीबाग पहुँचने में रात हो जाएगी और कोई होटल भी नहीं मिलेगा। लेकिन फिर भी मैंने आचार्य जी से कहा कि - अच्छा आप परेशान न होइए कोई उपाय बनेगा अभी।
और मैं ढूँढते-ढूँढते उस बस के ड्राइवर साहब के पास पहुँचा और कहा कि - ड्राइवर साहब! सीट दिलवाइए हम भी स्टाफ़ ही हैं... ।
ड्राइवर साहब ने एक नज़र ऊपर से नीचे तक मुझे देखा। इधर लगातार यात्रा के युद्धों से हम ड्राइवर-कंडक्टर से भी ज्यादा हसीन दिख रहे थे।
अचानक ड्राइवर साहब ने कहा - देखिए! 'साजन' तो भर गई है 'पागल' दो घंटे बाद है उसी से आ जाइए।
मैंने थकी हुई बसों की भीड़ में देखा एक बस के पीछे मटमैले लेकिन स्टाइलिश अक्षरों में लिखा था 'साजन' और दूसरी बस जिस पर 'पागल' लिखा था वो अभी एकदम जाने के मूड में नहीं दिख रही थी।
लेकिन मेरे एक दो बार और कहने पर उन्होंने मुझे 'साजन' के केबिन में ही जगह दी।
         गया से हज़ारीबाग का रास्ता ऊँचा - नीचा है। बस के शीशे पर छाई ग़र्द के बीच पहाड़ों की झलक देखना अच्छा लगता था। लगभग हर पहाड़ी पर सबसे ऊपर मंदिर और मंदिर के लिए जाते हुए नागिन की तरह टेढ़े-मेढ़े रास्ते। जंगलों से लकड़ी काट कर ला रही औरतों की एकाध कतारें,उनकी कमर से चिपके दुधमुंहे बच्चे, और उनके सिर पर लकड़ी के बोझ का वज़न। मानों प्रकृति ने स्त्री को कुछ अधिक वज़न ढोने के लिए अभिशप्त कर दिया हो। धीरे-धीरे शाम का अंधेरा छाता जा रहा था और अंधेरे में हज़ारीबाग हमारे नज़दीक आता जा रहा था।
           जब हम हज़ारीबाग बस स्टेशन पर उतरे तो शाम के सात बज रहे थे। शहर अंधकार से लड़ने के लिए रोड लाइट्स लगा कर तैयार था और इधर हमने रात भर रुकने के लिए होटल ढूँढना शुरू किया। लगभग दस होटल्स के चक्कर काट लेने के बाद पता चला कि हमने तो बहुत देर कर दी। लोगों ने सुबह से ही कमरे बुक करा लिए हैं। कुछ होटल वालों ने हाॅल में गद्दे बिछा रखे थे और एक तकिए के साथ एक कंबल का किराया चार सौ रुपए। हमने कुछ जगहों पर इस अवसर का भी लाभ उठाना चाहा लेकिन हमारे पहुँचते-पहुँचते वहाँ भी रिक्त स्थान की पूर्ति हो चुकी थी।
हम लोगों से होटल्स का पता पूछते, लोग भी इतने सज्जन थे कि कई सारे होटल्स का एड्रेस बताते-समझाते। कुछ लोग तो थोड़ी दूर तक साथ भी आए और खुद ही हम लोगों के लिए निवेदन किया। लेकिन उनकी भी मज़बूरी थी। एक ही दिन हज़ारों अभ्यर्थियों के आ जाने से कोई भी शहर व्यवस्थित नहीं रह सकता।
लगभग ढाई घंटे इस कोने से उस कोने घूमने के बाद जब पैरों ने शरीर को लगभग जवाब देते हुए कहा कि - तुमको और चलना हो तो चल लो, अब चलना हमारे बस की बात नहीं है। तब तय हुआ कि पहले खाना खाया जाए। हम फिर बस स्टेशन आए और कुछ खाने-पीने के लिए नज़र दौड़ाई। हर दुकान के बोर्ड पर तली हुई मछलियों के मसालेदार चित्रों को देखते-देखते इतना तो पता चल ही गया कि आज की रात भोजन भी नहीं मिलने वाला।
लेकिन तभी एक लिंक रोड पर थोड़े से उजाले में एक बोर्ड दिखा - 'मिश्रा जी शुद्ध भोजनालय'। यह बोर्ड देखकर हमें उतनी ही खुशी हुई जितनी खुशी किसी डॉक्टर को मरीज़ देखकर होती है या किसी ट्रैफ़िक पुलिस को बिना हैलमेट लगाए व्यक्ति को देखकर होती है। हम जल्दी से उस शुद्ध भोजनालय के पास पहुँचे और शुद्ध भाव से ही पूछा - पंडी जी! भोजन में क्या-क्या है?
पंडित जी ने बताया कि - 'सब कुछ' है।
'सब कुछ' शब्द पर शायद आचार्य जी को संदेह हो गया उन्होंने पूछा कि नाॅनवेज भी है?
पंडी जी ने - धीरे से कहा कि - हाँ वो भी है... ।
एक आखिरी उम्मीद के दिए को भी बुझता देखकर मैंने आचार्य जी से कहा - चलिए सेव खरीद लेते हैं।
आचार्य जी ने गर्वोन्नत होकर कहा - नहीं! अभी घर से लाया हुआ भोजन रखा हुआ है बैग में।
अब तो रहा नहीं गया मुझसे और फट ही पड़ा - तो अब तक चुप क्यों थे देवता?
आचार्य जी ने कहा कि - वो हम 'इमर्जेंसी' के लिए रखे थे न!
मैंनें खीझ कर कहा - गुरुदेव! अब इसके बाद जो इमर्जेंसी होगी उसमें तुलसी दल और गंगा जल की जरूरत होती है भोजन की नहीं।
             पानी की दो बोतलें खरीद लेने के बाद भोजन ग्रहण करने के लिए जगह का चुनाव भी बड़ी समस्या थी। परीक्षार्थियों की भारी भीड़ के कारण कहीं पैर रखने की भी जगह नहीं थी। अचानक मैंने देखा कि बस स्टेशन के बाएँ कोने पर एक गैरेज़ रूपी बारामदे में दो अभ्यर्थी अखण्ड सहचर भाव से लिपट कर सोए हुए हैं और उनसे थोड़ी दूरी बना कर एक भिक्षुक महाराज दीन-दुनिया से बेख़बर प्लास्टिक की बोरियों पर चैन की नींद ले रहे हैं। मैंने आचार्य जी से कहा - बैग से चादर निकाल कर बिछाइए यहाँ।
इस तरह हमारे एक साइड में एकाकार हुए विद्यार्थी युगल थे और दूसरी तरफ़ भूत, भविष्य और वर्तमान की चिंता से मुक्त भिक्षुक महाराज।
पहला कौर मुँह में डालते हुए आचार्य जी ने फ़ीकी हँसी हँसते हुए कहा - आज हमारे यह दिन आ गए कि हमें भिखारी के साथ सोना पड़ रहा है!
मैंने कुछ कहा तो नहीं। लेकिन मन में जरूर सोचा कि - हम हिंदी वाले लोग कितने कुटिल और छली होते हैं। भिखारियों की दीन-हीन दशा और उनकी फटी बिवाइयों वाले पैर पर कविता-कहानी लिखकर ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी ले लेंगे लेकिन एक रात मजबूरी में अपने ही पात्रों के साथ सोना पड़ जाए तो... ।
मुझे नागार्जुन की एक और बात याद आई। उन्होंने एक बार अपने बड़े पुत्र शोभाकांत को समझाते हुए कहा था कि - "कभी भी अपनी तुलना ऊपरी वर्ग से मत करो। नीचे देखो तब समझ में आएगा कि जीवन क्या है! तुम्हें तो किसी तरह दोनों समय रूखा-सूखा खाना मिल जाता है, अपने आसपास देखो कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें दो - दो दिन तक अन्न देखने तक को नहीं मिलता"।
               खैर आचार्य जी उधर चादर तान कर सोए और इधर हमने आखिरी कोशिश करते हुए हज़ारीबाग के ही फेसबुक मित्र भाई अमित सिंह जी से कहा कि - भैया अपने किसी दोस्त से पूछिए कि शहर से इधर-उधर कोई होटल मिल सकता है क्या?
अमित भाई जैसे चौंक पड़े - मेरे शहर में होकर आप होटल में रुकेंगे? मेरे घर जाइए। मैं मम्मी को बता रहा हूँ कि आप वहीं हैं...
मैंने कहना चाहा कि - भैया! अभी आप बैंगलोर में हैं न! घर फिर कभी आ जाऊंगा अभी के लिए होटल ही ठीक है।
लेकिन उधर से अमित भैया ने कहा कि - अरे माँ तो है न! आप चलिए मैं होल्ड पर ही हूँ।
मैंने आचार्य प्रवर को जगाया - गुरुदेव चलिए! अमित भैया के घर चलना है।
गुरुदेव अब तक उस परिस्थिति में लेटे-लेटे सांसारिक विषय-वासनाओं से ऊपर उठ चुके थे। उन्होंने चलने की तैयारी की। जूते पहने, चादर बैग में रख ही रहे थे कि थोड़ी दूर पर खड़े दो लड़कों ने कहा - धन्यवाद भैया।
मैंने कहा - आप लोग क्यों धन्यवाद दे रहे हैं भाई?
दोनों भाइयों ने खुशी से बताया - आप लोग जा रहे हैं न तो इस जगह पर अब हम सोएंगे।
मैं हतप्रभ रह गया। जिस जगह पर सोने में हमें अपनी बेइज्जती लग रही थी वो जगह हम ही जैसे लड़कों के लिए इतनी उपयोगी है कि उन्होंने धन्यवाद दिया!अद्भुत है प्रकृति भी हम थाली में जो रोटियाँ फेंक देते हैं उनसे भी हमारे जैसे ही पेट भरते होंगे यह सोचने की फ़ुरसत कहाँ है इस फोर - जी टाईम में?
               दस मिनट बाद ही हम अमित भैया के बेहद खूबसूरत घर के सामने खड़े थे वहाँ उनके मम्मी-पापा दोनों खड़े मिले। जैसे ही अंकल जी को पता चला कि हम टीचिंग की परीक्षा देने आए हैं वैसे ही उन्होंने अपने जीवन के शैक्षिक उतार चढ़ावों से हमें लैस करना शुरू कर दिया उधर इन सब बातों से एकदम अलग आंटी को बस एक बात की चिंता - क्या खाओगे? सुबह से कुछ खाया कि नहीं? चाय पियोगे? ठंड तो नहीं लगी न?
             हज़ारीबाग की सुबह बलिया की तरह एक ही बार नहीं होती। वहाँ सूरज पहले पहाड़ और बड़े - बड़े पेड़ों से लड़ता है। पहले गर्मी छाती है चिड़ियों की आवाज़ें थक जाती हैं तब सूरज सिर पर चढ़ आता है कि लो आ गए न!
गरम कंबल की गरमी और पिछली रात की थकान ने शायद परीक्षा और परीक्षार्थी के बीच एक मूक समझौता करा दिया था। लेकिन तभी आंटी ने आवाज़ दी - पानी गरम हो गया है बेटा नहा लो।
हम नहा धोकर तैयार हुए तब तक आंटी ने सत्तू की पूरियाँ सब्जी और दही नाश्ते की मेज पर रख दिया और कहा कि जल्दी से नाश्ता कर लो।
हालांकि सुबह सात बजे नाश्ते की आदत कभी नहीं रही इसलिए मैंने कहा भी - अरे आंटी इसकी एकदम जरूरत नहीं थी...
मेरी बात काटते हुए चश्मे के पीछे से आँखें दिखाते हुए कहा उन्होंने - जरूरत कैसे नहीं थी परीक्षा में बैठना है...
इधर हमने खाना शुरू किया तभी अंकल जी ने पूछा - अच्छा आप लोग तो ब्राह्मण हैं माँस - मछली खाते हैं कि नहीं?
मैंने हँस कर आचार्य जी की ओर संकेत करते हुए कहा - ये कभी-कभी अंडे खा लेते हैं।
इधर आचार्य जी ने आँखों की मिसाइलें मुझ पर तान लीं। उधर रसोईघर से निकल कर आंटी ने कहा - "बेटा! अब यह मत सोचना कि चार तरह की सब्जियाँ क्यों नहीं मिलीं, तुम लोगों को भी तो सोचना होगा न कि माँ अब बूढ़ी हो गई है"।
            पता नहीं इस एक वाक्य में क्या था कि मुझे खाने की थाली धुँधली दिखने लगी। आचार्य जी भी भावुक हो गए।
मुझे याद आया कि 'संस्कृति के चार अध्याय' में 'दिनकर' ने भारत की सांस्कृतिक विभिन्नता का वर्णन करते हुए कहा है कि-" कोस कोस पर बदले पानी,चार कोस पर बानी"। मतलब यहाँ हर एक कोस पर पानी का स्वाद बदल जाता है और हर चार कोस पर बोली बदल जाती है।
लेकिन पूरी दुनिया में अगर कोई चीज़ कभी नहीं बदलती तो माँ मातृत्व और ममता। माँ चाहे बलिया की हो या गोरखपुर की हज़ारीबाग की हो या अफ्रीका की उसके आवाज़ में भिन्नता हो सकती है लेकिन मातृत्व में नहीं।
            परीक्षा के दौरान मेरी कोशिश रहती है कि आगे - पीछे से कोई सवाल - जवाब न करूं। लेकिन आगे-पीछे से ही सवाल - जवाब होने लगते हैं तो बेरुखी से 'मुझे नहीं आता' कहना भी बहुत अज़ीब सा लगता है। इसलिए जैसे ही प्रश्न पत्र खोलने का आदेश हुआ मैंने सबसे आसान सवाल आगे वाली बहनजी से पूछ लिया - हैलो! गोदान तो जयशंकर प्रसाद की रचना है न?
बहन जी ने मुझे उसी नज़रों से देखा जिन नज़रों से 'गोदान' में मिस मालती ने मिस्टर खन्ना को देखा था। और अफ़सोस से कहा उन्होंने - अगर बता भी दिया तो क्या कर लोगे!
यही सवाल मैंने पीछे वाले भाई से भी किया। अब इस सवाल का चमत्कार यह हुआ कि तीन घंटे में मुझसे किसी ने कुछ भी नहीं पूछा।
पेपर बहुत अच्छा होने की खुशी ने पिछले दिन के तनाव को दूर करने में काफ़ी मदद की। अब हमारी ट्रेन रात के साढ़े दस बजे हज़ारीबाग रोड रेलवे स्टेशन से थी।मेरा अनुमान था कि रेलवे स्टेशन पास में ही होगा। लेकिन बस स्टेशन पर आकर पता चला कि हज़ारीबाग से हज़ारीबाग रोड रेलवे स्टेशन की दूरी इतनी ज्यादा है कि बस से तीन घंटे लगेंगे। अत्यधिक भीड़ के कारण बस में घुसना एक जटिल प्रक्रिया थी। दो तीन बसें भर कर निकल जाने के बाद एक बस में टिकट मिली। कंडक्टर ने ऊपर बैठने का आदेश दिया।
मैंने बस में झांककर कहा कि- इसमें तो ऊपर सीट ही नहीं है।
कंडक्टर ने मेरी बुद्धि पर तरस खाते हुए बस की छत दिखाते हुए कहा - उधर ऊपर...
हे भगवान! मैंने जिंदगी में बेहद छोटे - मोटे पाप किए हैं। बस और ट्रेन की छत पर बैठकर यात्रा करने जैसा दुष्कर्म कभी नहीं किया।
मैंने कंडक्टर को डाँट कर पूछा - और रास्ते में पुलिस ने पकड़ा तो?
मेरे सवाल का जवाब मिलने से पहले ही बीस लड़के बस की छत पर सवार हो गए। मैंने आचार्य जी से कहा - गुरुदेव! जीवन का एक यह भी अनुभव ले लिया जाए। थोड़ी देर बाद जब ऊपर बैठने क्या हिलने की भी जगह नहीं रही तो बस ने चलना शुरू किया। रास्ते में पेड़-पौधे, पुलिस चौकियाँ आतीं गईं लेकिन किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। हाँ! एक बात यह समझ में आई कि जिस बस के ऊपर पच्चीस - पचास लोग बैठे न हों उस बस को अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता यहाँ ।
                रेलवे स्टेशन पर आकर जैसे जान में जान आई। लगा कि अब हमारी समस्याओं का अंत हो गया। अब तो बस ट्रेन में बैठना है और सुबह पाँच बजे बनारस उतर जाना है। लेकिन हमें क्या पता था कि  हज़ारीबाग को हमसे मुहब्बत हो चुकी थी। स्टेशन के प्रतीक्षालय में जब हमने इंतज़ार की लगभग आधी सज़ा काट ली तो अचानक अनाउंस हुआ कि "धनबाद के रास्ते हजारीबाग गया सासाराम डेहरी आन सोन होते हुए वाराणसी को जाने वाली गंगा - सतलुज एक्सप्रेस आठ घंटे की देरी से आएगी, आपकी असुविधा के लिए हमें खेद है"।
दस बजे की ट्रेन सुबह सात बजे आएगी। यह सोच कर ही जैसे धड़कनें ठहर गईं। इसका मतलब यह कि आज की रात हज़ारीबाग रेलवे स्टेशन पर काटनी होगी। मुझे लगता है कि भारतीय रेल विभाग जितनी सुविधा और विनम्रता से हमारी असुविधा के लिए खेद जताता है उतनी विनम्रता किसी भी दूसरे सरकारी विभाग में नहीं होती होगी।
हाँ! अच्छा यह हुआ कि इस बार बिना कुछ कहे आचार्य जी ने बैग से चादर निकाला, बिछाया और सो गए।
मैं क्या कहता और सुनता। ठंड की रात छोटा सा प्लेटफॉर्म जहाँ शौचालय भी ट्रेन के आने-जाने पर खुलता हो वहाँ रात भर काटना।
बेमन से फेसबुक खोला अचानक नरेन भैया का मैसेज़ दिखा। जिसमें लिखा था - असित भाई हज़ारीबाग में कोई भी बात हो तो बताइएगा।
अब बताने के लिए था ही क्या! मैंने उत्तर में लिखा कि नहीं सब ठीक है। रात वाली ट्रेन कल सुबह आएगी। दुआ कीजिएगा कि तब तक जिवित रह जाऊँ।
मैंने फेसबुक भी बंद किया और आचार्य जी के बगल में लेट गया। नीचे का ठंडा फर्श हमारी ऊष्मा से गरम हो रहा था और उसकी शीतलता से हम शीतल। तभी मोबाइल बजा। उधर से आवाज आई - असित भाई! मैं सेक्शन इंजीनियर प्रभाष चंद्रा बोल रहा हूँ। अधिकारी आवास खोल दिया गया है आप उसमें चले जाएँ।
सहसा यकीन नहीं हुआ। कुछ मिनट पहले रेलवे को दी गई छोटी-मोटी गालियों को भारतीय नेताओं की तरह वापस लिया और बगल में लेटे आचार्य जी को जगाया।
मैंने नरेन भैया को फोन करके कहा कि - भैया इतना इंतज़ाम करने की क्या जरूरत थी आप लोग सीमा पर सारी रात खड़े रहते हैं मैं एक रात प्लेटफॉर्म पर नहीं गुजार सकता!
नरेन भैया ने जो कहा वो देश के हर नागरिक के लिए याद रखने की बात है। कहा उन्होंने कि - असित भाई! हम सेना के लोग हैं हमारे लिए हमारा सिविलियन फर्स्ट होता है...
         मैं नहीं जानता कि मुझे होटल्स तक ले जाने वाले हज़ारीबाग के वो लोग फिर कभी मिलेंगे कि नहीं! मुझे यह भी नहीं पता कि बैंगलोर में कहीं इंजीनियर अमित सिंह भाई से कभी मिलना होगा कि नहीं! जीवन में फिर कभी उस एक रात की माँ से मिल पाऊँगा कि नहीं! देश के किसी सीमा से उल्टे-सीधे पोस्ट लिखने वाले फौजी नरेन भैया और प्रभाष चंद्रा सर से मिलना होगा कि नहीं...
मुझे तो इतना भी नहीं पता कि ज़िंदगी की वो दो रातें फिर जीवन में कभी आएंगी या नहीं कि जब हम सड़क के किनारे से उठ कर एयरकंडीशन्स रूम में पहुँचे या प्लेटफॉर्म से उठ कर सीधे अधिकारी आवास तक पहुँच गए... उसके पहले चाहता हूँ कह दूँ - शुक्रिया जिंदगी... शुक्रिया दोस्तों!

असित कुमार मिश्र
बलिया

      

Monday, December 4, 2017

असित - वेंट टू वेंट....

असित - वेंट टू वेंट....

अगर गौ गंगा और गीता की शपथ लेकर कोई बात कहनी हो तो कहना ही पड़ेगा कि मुझे प्यार से नहीं यात्राओं से डर लगता है। हिंदी साहित्य की जितनी भी विधाएँ हैं उनमें 'झूठ - साँच' कुछ ना कुछ लिख ही लूँगा, लेकिन यात्रा वृत्तांत में तो कुछ भी नहीं। यात्रा वृत्तांत से याद आया बरसों पहले साकिन मौजे तरौनी बड़की, थाना बहेड़ा, जिला - दरभंगा बिहार राज्य में छत्रमणि मिसिर के घर एक 'नायालक' पौत्र का जनम हुआ। बाप थे गोकुलानंद मिसिर और माँ थीं उमादेवी। गोकुलानंद मिसिर को पक्का यकीन था कि ये नालायक भी अन्य पुत्रों की तरह असमय ठग कर चल बसेगा इसलिए उसका नाम ही रख दिया ठक्कन मिसिर। लेकिन माँ तो माँ ही होती है उसे पक्का यकीन था कि वैद्यनाथ धाम की मनौती से प्राप्त यह छठवाँ पुत्र जिवित रहेगा इसलिए माँ ने नाम रखा बैजनाथ मिसिर। हालाँकि इस खुशी में खुद माँ ही चल बसी।
'यात्री' के उपनाम से पहली कविता मैथिली में लिखने वाले बैजनाथ मिसिर के अतिरिक्त हिंदी में दूसरा 'जनकवि' हुआ ही नहीं। जनकवि का मतलब है जनता का कवि और 'जनता के कवि' होने का मतलब है कि - एक पोस्टकार्ड पर मात्र पाँच पंक्तियाँ लिखीं आईं थीं एक दिन,बैजनाथ मिसिर के पते पर। लिखा था - बाबा चरण स्पर्श! आपके लिखे को हमेशा पढ़ा है, महसूस किया है। किसी दिन मेरे शहर से गुज़रना हो तो आपको भी देखने का सौभाग्य मिले ...
और अगले हफ़्ते ही बैजनाथ मिसिर उस पोस्ट कार्ड भेजने वाली महिला का दरवाज़ा खटखटाते नज़र आए।
दरवाज़ा खोलने वाली महिला ने देखा कि सफ़ेद गमछे के ऊपर बंदर छाप टोपी, बढ़ी हुई दाढ़ी, धूल - धूसरित कपड़े.... कोई याचक विप्र है।बहुत हुआ तो कुछ आटा - पिसान लेगा और क्या!
लेकिन बूढ़े ने अप्रत्याशित बात कही - अब दरवाज़े से हटोगी भी कि यहीं खड़ी रखोगी मुझे ?
दुर्भाग्य से वो महिला ना फेसबुक पर थी ना व्हाट्स ऐप पर कि उस बूढ़े को पहचान सके।उसने डरते - डरते कहा - घर में कोई नहीं है आप घर में क्यों घुसे चले आ रहे हैं!
बूढ़े ने आँगन की कमसिन धूप में खेल रही छोटी सी बच्ची को गोद में उठाते हुए कहा - ये तो है न घर में! मैं इसी के लिए तो आया हूँ।
महिला ने सोचा होगा कि कोई बच्चा चुराने वाला तो नहीं आ गया? फिर संकोचवश पूछा होगा कि पहले बताइए कौन हैं आप? नाम क्या है आपका?
बूढ़े ने अपने परिचय में कहा होगा - दमा का सनातन मरीज़ /रात को थोड़ा सोने वाला/घुमक्कड़ी का शौकीन /मैं, यानी /अर्जुन नागा... /उर्फ़ बैजनाथ मिसिर /उर्फ़ यात्री जी /साकिन मौजे तरौनी बड़की /थाना बहेड़ा /जिला दरभंगा /बिहार राज्य...
       यह परिचय कोई साधारण परिचय तो था नहीं। अब वो महिला उधर अपनी कज्जलित आँखों में अजश्र धारा लिए गोंइठे की आँच पर पानी गरम करने लगी ताकि अपने प्रिय कवि के पैर पखार सके और उधर जनकवि ने उस छोटी सी बच्ची के गाल सहलाए। बच्चे केवल एक ही भाषा समझते हैं प्यार की भाषा मनुहार की भाषा दुलार की भाषा.... ।
और हँसती हुई उस छोटी सी बच्ची के दो छोटे - छोटे दाँत बाबा नागार्जुन के द्वारा हिंदी साहित्य के इतिहास में ऐसे गड़े जिसे मिटाने का दु:साहस कोई स्वप्न में भी नहीं कर सकता।और यहीं बाबा ने अपनी प्रशंसिका की उस बच्ची पर एक कविता लिखी -
तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कान।
मृतक में भी डाल देगी जान
.......
यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज
मैं न सकता देख
मैं न पाता जान
तुम्हारी यह दंतुरित मुस्कान।
          आज फेसबुक पर दस बीस लोगों के द्वारा चीन्हने-पहचानने पर खुद को 'सेलेब्रिटी' समझने के इस दौर में सोचता हूँ कि वो  हमारे वो पूर्वज किस मिट्टी के बने होंगे और उनके प्रशंसक - प्रशंसिकाओं का हृदय कितना विशाल रहा होगा...। जीवन - सरिता के इस कंटक प्रवाह में जहाँ रोज़ सैकड़ों - हज़ारों समस्याएँ जन्म लेतीं हैं और उन दुष्चक्रों के बीच भी अपनी हिंदी के लेखक कवि के लिए मुस्कुराते हुए समय निकाल लेना कितने उदार हृदय का परिचायक है, यह बताने के लिए शब्द नहीं है।
          खैर! मेरे जीवन में यात्रा के जो भी संयोग - दुर्योग बने वो या तो आयोगों के द्वारा परीक्षा और साक्षात्कारों के बीच बने या फिर किसी सेमिनाॅर या साहित्यिक कार्यक्रमों के लिए। इधर उत्तर प्रदेश के आयोग रूपी हाँडी में जब अपनी दाल नहीं गली तो तय हुआ कि अब जिस भी राज्य से विज्ञापन निकले वहीं धूनी रमा देनी चाहिए। इस क्रम में पड़ोसी राज्य बिहार ने सबसे पहले अवसर दिया। वहाँ लिखित परीक्षा पास करने के बाद पता चला कि कुछ दसेक सवाल ग़लत होने के कारण मामला कोर्ट में गया है।
इधर हम उत्तर प्रदेश वाले पहले से ही जानते हैं कि यूपी की भर्ती में कुल छह चरण होते हैं - प्री ,मेन, इंटरव्यू, हाईकोर्ट, सुप्रीमकोर्ट फिर सीबीआई जाँच तब नियुक्ति। लेकिन यही बीमारी पड़ोसी राज्य बिहार को भी लग जाएगी, ऐसा तो सोचा भी नहीं था।
यूँ तो निज़ी तौर पर मैं शरिया कानूनों के ख़िलाफ़ हूँ लेकिन केवल एक मामले में ऐसा ही कोई कानून चाहता हूँ जिससे जम्बू द्वीप के ऐसे विषय विशेषज्ञों को तत्काल पकड़ कर उनके नितम्ब द्वीप पर पाँच सौ कोड़े लगाए जाएँ जिन्हें जवाब तो छोड़िए सवाल तक करने नहीं आता। और ऐसे ही नालायकों की वज़ह से परीक्षा और मज़ाक दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए हैं।
लेकिन जब तक मैं विचारों से उग्रवादी होकर कोई ऐसा - वैसा संगठन बनाता इसके पहले ही झारखंड ने टीजीटी के परीक्षा की तिथि घोषित कर दी। और परीक्षा - केन्द्र निर्धारित किया था - हजारीबाग। परीक्षा हमें बस एक बात सिखाती है - सबसे पहले रहना। अतः सबसे पहले हमने बनारस से हजारीबाग की टिकटें बुक कराईं। संयोग से रिजर्वेशन मिल भी गया। वर्तमान काल में ट्रेन में रिजर्वेशन मिलने मात्र से मनुष्य, मनुष्येतर हो जाता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों का रिकॉर्ड देखने से पता चला कि हमारी वो रिजर्व ट्रेन वामपंथ की तरह पथभ्रष्ट हो चुकी है और 'अच्छे दिनों' की तरह कब आयेगी इसका भी भरोसा नहीं है। अब एक तरफ़ परीक्षा छूटने का भय और दूसरी तरफ़ अपनी रिज़र्व सीट की गद्देदार स्लीपर सीट छूटने का मोह न दीन का होने दे रहा था न दुनिया का। अंतत: दिल को मजबूत करके कड़ा फैसला लेना ही पड़ा और साथ जाने वाले एक वरिष्ठ आचार्य मित्र की संस्तुति मिलने पर तय किया गया कि बलिया से पटना और पटना से गया और तब हजारीबाग पहुँचा जाए। हालाँकि इस तरह दूरी तो थोड़ी बढ़ जाती और समय भी ज्यादा लगता लेकिन इससे शरीर और साहित्य दोनों के बचे रहने का अवसर भी ज्यादा था। तय यह भी हुआ कि पटना में रह रहे 'कायस्थ कुल - कुलांगार' श्री नरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव जी के यहाँ रात्रि विश्राम किया जाए। श्रीवास्तव जी का व्यक्तित्व बहुत ऊँचा है और उससे भी ऊँचा है उनका घर। तकरीबन 'चार बाँस चौबीस गज़ अंगुल अष्ट प्रमाण' चढ़ने के बाद मोटी - मोटी हिंदी अंग्रेज़ी की किताबों के बीच थोड़ी सी जगह मिली जहाँ बैठा जा सके।
        पटना तक की यात्रा के बाद अगली यात्रा करनी थी गया की। धार्मिक दृष्टि से गया की भूमि अत्यंत पवित्र है। ऐसा माना जाता है कि गया ही वह भूमि है जहाँ पिण्डदान करने से पितरों की आत्मा मोक्ष प्राप्त करती है। हालाँकि मेरी आत्मा को सबसे ज्यादा कष्ट 'गया' के नाम पर ही मिला है। पटना से गया की यात्रा बस से सुविधाजनक होगी या ट्रेन से यह जानने के लिए पटना में अध्यापक मित्र श्री साहब लाल सिंह जी की सेवा ली गई। साहब सर और श्रीमती उषा सिंह जी बड़े ही सहृदय और साहित्यिक अभिरुचि के हैं। दोनों लोग न सिर्फ़ मिलने आए बल्कि पथ भी बताया और पाथेय की भी व्यवस्था की।
साहब सर ने पूर्णतया बिहार की लय में बताया - हम लोगों को जब जाना रहता है न ऽऽ तो हम लोग ट्रेनवे से गया जाते हैं।
हमने भी 'मनाजन: येन गता स: पंथा' का अनुसरण ठीक समझा और सुबह नौ बजे ट्रेन की राह पकड़ी।
            'पटना - गया पैसेंजर' की सीट पर बैठते ही गया को लेकर बचपन की जो स्मृतियाँ थीं वो 'चेन-पुलिंग' करने लगीं। हमारे ज़माने में ट्रांसलेशन ज्ञान के लिए कम विद्यार्थियों को कूटने के लिए ज्यादा पूछे जाते थे। एक तो अंग्रेज़ी शुरू ही होती थी कक्षा छह से। मतलब अभी ए बी सी डी ठीक से आई नहीं तब तक अंग्रेज़ी के मास्टर साहब अनुवाद का लेसन शुरू कर देते थे। साथ ही साथ राइटिंग भी सुधरती रहे इसके लिए वो अक़्सर ब्लैक - बोर्ड पर हिंदी में वाक्य लिख देते थे और उसके नीचे हमें अंग्रेज़ी में अनुवाद लिखना होता था। पाठ को जीवंत और प्रभावी बनाने के लिए उन्होंने एक अद्भुत विधि भी विकसित की थी। वो अनुवाद पूछते समय हमेशा क्लास के लड़के - लड़कियों का नाम बीच में घुसा देते थे। जैसे राजेश के लिए लिखते थे - राजेश आम खाता है...अंग्रेज़ी में अनुवाद लिखो।
स्वाति के लिए लिखते थे कि- स्वाति दूध पीती है...इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद लिखो। अच्छा! एक दुर्भाग्य मेरे साथ शुरू से रहा। ये खाने - पीने वाले जितने भी अनुवाद रहे, सब के सब मेरे दोस्तों के हिस्से में आते थे और मेरे हिस्से में वही रूखा सूखा, आना - जाना।
मास्टर साहब मजबूत कदमों से मुझ कमजोर विद्यार्थी के पास आते और कहते - चलो तुम लिख कर दिखाओ! असित, गया गया।इसका अंग्रेज़ी अनुवाद क्या होगा? हम छोटे से दिमाग पर आवश्यकता से अधिक जोर लगाकर लिखते - असित, वेंट टू वेंट...। अब इसके बाद जो थप्पड़ों का निनाद हमारी सिसकियों के स्वर में एकाकार हो रहा होता तभी मास्टर साहब गरज़ते - ससुर एक ही बात कौ बार बताएँ कि- गया इज़ अॅ नेम अॅ प्लेस...।
तब उस बाल मन में जो पहली भीष्म प्रतिज्ञा उभरी थी वो यही थी कि जीवन में भले ही कभी असित- वेंट टू पेरिस लिखूँगा या नहीं, भले ही मेरी जिंदगी में असित- वेंट टू माॅरीशस लिखा जाएगा या नहीं लेकिन एक बार असित - वेंट टू वेंट मतलब असित, गया - गया। लिखकर जरुर दिखाना है...।
(शेष अगले भाग में)

असित कुमार मिश्र
बलिया