देवघर में आकर मुझे पता चला कि यह संपूर्ण चराचर जगत् बस दो लोगों का है - एक तो अडानी जी का और उनसे जो बच गया वो बाबा का....
इधर मैंने रिक्शे में बैठते हुए सहमति दी उधर भाईसाहब ने स्पीकर की आवाज़ बढ़ाई - "सुनीं- सुनीं भगवान, जनि बिहान होखे दीं"....
ना चाहते हुए भी इस सुंदर दोहे पर ध्यान गया। शायद अमीर ख़ुसरो ने अपने गुरु निज़ामुद्दीन औलिया के निधन पर यह लिखा था - "विधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय"।
सुबह होते ही उनके गुरु का यह पार्थिव शरीर भी उनसे दूर हो जाएगा इसलिए ख़ुसरो चाहते ही नहीं कि यह रात बीते।
बहुधा लोगों को मैं कुंडलियों और हाथ की लकीरों में से अपने भविष्य को निकाल लेने की बेचैनी में देखता हूँ । लोग पैसे देकर यह जान लेना चाहते हैं कि कल क्या होगा? लेकिन बहुत बार आगे की जान लेना जान ही ले लेता है।
अगर हम जान लें कि हमारा यह प्रियजन, हमारी यह प्रिय वस्तु आज की रात ही हमारे पास है, तो शायद उससे पहले हमारी ही जान निकल जाए और हम भी वही चाहते जो ख़ुसरो चाहते थे - "भोर कभी ना होय"।
इधर रास्ता बीतता जा रहा है -बी. एन. झा की हवेली बीत गई, स्व. रामलाल पंडा के सुपुत्र झलखू महाराज की हवेली बीत रही है, अब पंडित शिवराम झा चौक आएगा....।
लगता है मैं कब से जान रहा हूँ देवघर को। वैसे भी किसी शहर को जान लेने में वक़्त ही कितना लगता है, हाँ लोगों को जानने में भले ही सदियाँ लग जाएँ।
तभी रिक्शे के किसी गोपनीय स्थल में लगे हुए स्पीकर ने अगली पंक्ति गाई - "आज राजाजी के कोरवे में जवान होखे दीं"।
समझ में आ गया। यह कोई भोजपुरी गाना है, मैं बेवज़ह आध्यात्मिकता के टावर पर चढ़ रहा था।
देवघर में हिंदी, खोरठा, अंगिका, बंगाली, संथाली और मैथिली भाषाएँ बोली जाती हैं लेकिन सुनी जाती है, केवल एक - भोजपुरी।
ड्राइवर महोदय से कुछ कहता तब तक वो खुद बोल पड़े - सर! उतरिए।
लगभग तीस प्रतिशत ही उतर पाया था तब तक मेरे माथे पर पीला चंदन लगा कर बीच में लाल चंदन से महादेव लिखा जा चुका था। मैंने आदरपूर्वक चंदन लगाने वाले ब्राह्मण को दक्षिणा दी।
शत प्रतिशत उतर कर सीधा हुआ ही था तब तक एक फोटोग्राफर मुस्कुराते हुए सामने खड़े हुए - सर! एक फोटो प्लीज़...
उनकी श्यामल मुस्कुराहट और धवल निवेदन में मैंने व्यवसायिकता ढूँढी लेकिन निकली बस सरलता।
दिल से एक आह निकली। मेरे जैसे लोग जीवन में कितने सादामिजाज या लापरवाह होते हैं! एक ढंग का फोटो तक नहीं होता पास में। कभी किसी सरकारी काग़ज़ पर फोटो चिपकाना पड़े तो सोचना पड़ता है कि किस फैमिली-फोटो से क्राप करके अपना चेहरा निकालें।
मैंने बहाना बनाया - अरे! पहले दर्शन तो कर लेने दीजिए भाई!
दर्शन की बात सुनते ही एक दिव्य आत्मा हाथ में चिप लगे कार्ड लिए प्रकट हुई - विशिष्ट दर्शनम्... वीआईपी पास लीजिए तीन सौ रूपये मात्र...।
तमाम उतार - चढ़ाव के बाद इस बार का 'स्पर्श-दर्शन' जितनी सहजता से हुआ वो सदैव स्मृति में रहेगा। देवघर मैं आजादी से पहले ( 2014 ) भी आया और बाद में भी अनगिनत बार आया। लेकिन अत्यधिक भीड़ के कारण मंदिर प्रांगण से ही हाथ जोड़कर बाहर निकल गया।
इस बार जैसे ही द्वार से बाहर निकला सामने फिर वही साँवली प्रतिमूर्ति, हल्के पीले रंग की साधारण शर्ट के ऊपर गले में एक गमछा लपेटे - सर! फोटो हो जाए एक... फुल एचडी, हाई एफपीएस, हाई आईएसओ,... एक फोटो मात्र 100 रुपये।
मैंने उनके हाथों में सहमे हुए 'निकाॅन' के बुजुर्ग कैमरे को देखा और कहा - बस भी कीजिए। इस बेचारे पर इतना लोड मत दीजिए।
साँवली मूर्ति मुस्कुराई। जैसे साक्षात् कृष्ण मुस्कुरा रहे हों। सर! अकेले में आपकी एक फोटो यहाँ से बहुत बेहतरीन आएगी....
उन्होंने मेरी फोटो ली और प्रिंटर वाले लड़के के पास भागे - भागे जाकर प्रिंट ले आए।बड़े करीने से एक प्लास्टिक फाइल में फोटो डाली और मेरे हाथ में देते हुए बोले- देखिए सर! क्या बेहतरीन फोटो है!
मैंने फ़ोटो में खुद को तलाश किया। हाँ! मेरे जैसी आकृति खड़ी तो है!
मंदिर में कहीं धूप, कहीं छाँव और लोगों के धक्कों के बीच पूरे फोटोग्राफ में मैं कम और वो दूसरा आदमी ज्यादा दिख रहा था जो उस समय धक्का मारते हुए पीछे से गुजरा था। बगल में मुझसे लगभग एकदम सटे एक सुकन्या भी फोटो में दिखी जिसकी फोटो सामने से कोई आईफोनधारी ले रहा था। नीचे दंडवत् करते हुए एक चाची थीं जिनके जुड़े हुए हाथ पर बाद में कोई पैर रखकर भाग गया था और ऊपर शिव-पार्वती के गठबंधन की तैयारी में लगे पंडे महाराज भी फुल एचडी में नि:शुल्क दिख रहे थे। दिखने को तो मैं भी दिख ही रहा था फोटो में, अपनी क्षमता के अनुसार...
वो मुस्कुराते हुए मेरे जवाब की आशा में शायद अब भी थे।
मैंने फोटो रख ली। पैसा उनके हाथ में दिया और कहा - आप यक़ीनन एक बेहतरीन फोटोग्राफर हैं।
उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थोड़ी और फैल कर गाढ़ी हो गई।
मैंने पूछा -आपकी एक फोटो मैं ले लूँ ?
साँवली मूर्ति सहसा उदास हो गई। मेरा फोटो आप लेंगे?
मैंने फिर पूछा - अच्छा! आपने अपनी फोटो कब खिंचाई थी?
फोटोग्राफर ने लगभग याद करते हुए धीरे से कहा - जब आधार कार्ड बना था...
मैंने कुछ कहा नहीं। क्या कहता! मैं जानता हूँ दुनिया में ऐसे विरोधाभास भी होते हैं। दूसरों की फोटो बनाने वालों की खुद अपनी तस्वीर नहीं होती।
वो इतने उत्साहित थे जैसे पहली बार फोटो ली जा रही हो उनकी। उन्होंने मुझसे आँख बचाकर पसीने से भरे चेहरे को हथेलियों से साफ़ किया। बाल ठीक किए, कैमरे को गले में लटकाया और चेहरे पर वही निर्मल मुस्कुराहट...।
मैंने फोटो बना ली। जब तक फोटो बन रही थी तब तक वो मुस्कुराते रहे।
मैं जब चलने लगा तो थोड़ी दूर तक छोड़ने आए और बोले - आपकी फोटो मेरे दिल में बस गई है सर!
मैं हँस पड़ा - तो मैंने आपको यूँ ही बेहतरीन फोटोग्राफर नहीं कहा।
उनके वापस चले जाने के बाद अपनी इस फोटो को हाथ में लिए अब अपनी उस फोटो के बारे में सोचता हूँ जो उनके दिल में बसी है। मुझे लगता है वो फोटो भी ऐसे ही कुछ होगी उसमें भी लाइन में खड़े भक्तगण होंगे, आरती करते कोई पंडा महाराज होंगे, किसी के ललाट पर चंदन घिसता कोई ब्राह्मण होगा, दंडवत् करती हुई कोई चाची होंगी और कहने को तो फोटो मेरी है ही....
असित कुमार मिश्र
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