Monday, April 18, 2016

पादुका पुराण

पिछले दिनों मंदिर के बाहर से भरत सम किसी भाई ने मुझे राम जानकर मेरी पादुका पार कर दी। निजी गुप्तचरों के लाख प्रयास के बाद भी उस पादुका ग्राही व्यक्ति का पता नहीं चल पाया। किसी आम आदमी की पादुका चोरी होना नितांत साधारण घटना है, इसलिए इस पर कोई चर्चा नहीं होती, खबर जैसा कुछ नहीं बनता।आम आदमी होना कितना महत्वहीन है,  कितना तथ्यहीन है , यह बस वही समझ सकता है जो आम आदमी है। विदीर्ण होते हृदय को सांत्वना कैसे दूं समझ में नहीं आ रहा।
      अगर आज मैं राजनीति वाले किसी पद पर होता तो पादुका की क्या कमी होती? आजकल जनता वो नाजुक नाजुक, सुंदर सुंदर जूते नेताओं पर फेंक रही है कि क्या कहने!
कल ही टीवी पर रेड एंड चीफ के सीईओ सिरी सुमेसर परसाद जी बता रहे थे कि - हमारी कंपनी के जूते इतने सॉफ्ट,कंफर्टेबल और पकड़ में मजबूत हैं कि युवा वर्ग इन्हें पहनने के लिए कम,नेताओं पर फेंकने के ज्यादा प्रयोग कर रहा है।
'आउटलुक' पत्रिका भी 'सेक्स सर्वेक्षण' जैसे कालजयी मुद्दे को छोड़कर अब इसी पर रिसर्च कर रही है कि पिछले पांच सालों में नेताओं पर किस कंपनी के जूते ज्यादा फेंके गए।
     अगर मैं साहित्यिक जगत से संबंधित होता तो 'प्रेमचंद के फटे जूते' टाईप प्रसिद्ध रचनाएँ मुझ पर लिख दी गई होतीं। और आज मैं किसी साहित्यिक अकादमी के सचिव पद का प्रबल दावेदार माना जाता। साहित्यिक साथी गण मेरे पादुका चोरी की घटना पर विह्वल होकर 'हाय असहिष्णुता-हाय असहिष्णुता' का जाप करते हुए मोदी जी से इस्तीफे की मांग कर रहे होते। और साथी कवयित्रियां 'काव्य संध्या' के आयोजन के लिए पडोसी पाकिस्तान में कोई अच्छी जमीन तलाशने के बाद इकोनॉमी क्लास के टिकट की मांग कर रही होतीं।
       इधर अगल बगल घटनाएं तेजी से घट रही हैं। सुना है गुड़गांव का नाम गुरुग्राम कर दिया गया है। हमारे गाँव के सिरी छेदीलाल जी इससे बड़े दुखी हैं। उनका मानना है कि मुझे 'जार्ज होल' कहा जाए या 'सूराख अली' रहूंगा तो चाय वाला छेदीलाल ही न। लेकिन विपक्ष में खड़े पान की पीक को 'समाजवाद' की तरह घोंट रहे मिश्रौली गांव के परधान जी का कहना है कि- बेटा हमरे गांव का नाम अगर आज मिश्रौली की जगह सैफई होता न बता देते तुमको कि नाम का फरक क्या होता है। बूझि गए न!
अब शायद छेदीलाल जी बूझ गये हैं और चुपचाप चीनी चाय अदरक और पानी का महागठबंधन तैयार कर आग पर रख रहे हैं।
                सच कहूं तो इन बातों में मेरा मन नहीं लग रहा। मेरी स्थिति गहन गिरि कानन कुञ्ज लता गुल्मों में भटक रहे राम जैसी ही है,जो हर वन प्राणियों से पूछ रहे हैं - 'तुम देखी सीता मृगनयनी'।
हालांकि मेरी पादुका बहुत नई नहीं थी फिर भी साहचर्य जनित प्रेम तो हो ही गया था।मन उसकी स्मृति में रह रह कर भावुक हो रहा है। न जाने किन कठोर पांवों के राहुल गांधी तुल्य असहनीय भार को वहन कर रहा होगा।
बहुत कीमती नहीं थी मेरी पादुका लेकिन एक जोड़ी जूते की कीमत 'धूमिल' का 'मोचीराम' ही जानता है, तभी तो उसने कहा कि -
मुझे हर वक्त यह ख्याल रहता है कि जूते
और पेशे के बीच
कहीं न कहीं एक 'अदद आदमी' है
जिस पर टांके पड़ते हैं
जो जूते से झांकती हुई अंगुली की चोट
छाती पर
हथौड़े की तरह सहता है।
            अखबार में इधर की बड़ी खबरें दिख रही हैं। कहीं भारत माता की जय का उद्घोष है जिसे खूबसूरती से वोटों में बदला जा रहा है, तो कहीं नीतीश कुमार जी संघ से आजादी चाहते हैं, तो कहीं युवाओं के दम पर अखिलेश यादव जी चुनाव का शंखनाद कर रहे हैं, तो कहीं अरबों रुपये का आई पी एल है ....और जनता वही 'अदद आदमी' है जो आज भी अंगुली की चोट छाती पर हथौड़े की तरह सह रही है।
वही 'अदद आदमी' जिसकी बात कोई नहीं करता और जो कहीं पलायन, कहीं बाढ़, कहीं सूखा, कहीं बेरोजगारी, कहीं भ्रष्टाचार और कहीं पानी के लिए मर रहा है।लेकिन अब सबकी समझ में आ रहा है कि कैसे कोई राबर्ट वाड्रा दिन पर दिन अमीर होता जा रहा है जिनकी कुल योग्यता यही है कि वो राजशाही परिवार के सदस्य हैं। और कैसे कोई होरी आज भी बैल के पगहे में लटक कर जान दे देता है। उसकी छोटी सी योग्यता यही है कि वो सैकड़ों का पेट पालने वाला अदद आदमी है। अब सबकी समझ में आ रहा है कि कैसे 'युवा वर्ग' का आह्वान करने वाले समाजवादी रथ ने अपने पहिए से सबसे ज्यादा युवाओं को ही रौंदा है।
राजनीतिक दलों को अब समझ जाना चाहिए कि उसी 'अदद आदमी' का जूता एक दिन अचानक गायब हो जाता है, और जब अंगुली की चोट छाती पर हथौड़े की तरह सहन करने से इन्कार कर देता है तो एकाएक उछल पड़ता है और कहीं भाषण पिलाते हुए मंच पर अचानक प्रकट हो जाता है। आज तो बस मेरे जूते गायब हुए हैं, जिस दिन सबके जूते गायब होंगे, उस दिन अंगुली की चोट हथौड़े की तरह सहने वाला हिमालय की तरह चोट करेगा।
क्योंकि - "असल बात तो यह है कि
वह चाहे जो है
जैसा है जहाँ कहीं है
आजकल कोई आदमी जूते की नाप से बाहर नहीं है"
इसलिए समय आ गया है कि ढूंढिए - मेरे 'जूते' नहीं! वही 'अदद आदमी'। जिसकी बात कोई नहीं करता....

असित कुमार मिश्र
बलिया

Friday, April 8, 2016

ढाई आखर प्रेम का....

सुश्री गीताली जी की गणना तिनसुकिया (असम) के प्रतिष्ठित अध्यापकों में होती है। उन्होंने शिक्षा पर कुछ लिखने का आदेश दिया है।बडा अच्छा लगा जानकर कि गोरखपुर में तो बाकायदा अध्यापकों ने टीम बना रखी है कि कैसे शिक्षा प्रभावी रुप में दी जाए जिनमें बहन प्रीति गुप्ता और रिवेश प्रताप सिंह सर शामिल हैं।
           शिक्षा को लेकर पूरा ढांचा ही उल्टा है।पहले एक कहानी सुना लूं -आठ दस साल पुरानी बात है गाजीपुर के एक पंडीजी इलाहाबाद में सिविल की तैयारी करते थे। कभी मेन्स में अटकते कभी इन्टरव्यू में। दोस्तों ने सलाह दी कि- जा के कहीं से बी एड् मार लो। नहीं तो बियाह भी नहीं होगा।
पंडीजी औसत जजमानी वाले घर से थे। टेस्ट में सरकारी कालेज मिल गया तो कम पैसे में ही हो गया। और संयोग कि तुरंत नौकरी मिल गई बलिया जिले में। ज्वॉइन करने के बाद पंडीजी ने अपना दिमाग लगाया।रात को स्कूल में ही सोते थे। सामान के नाम पर एक तकिया चटाई और दो तीन कपड़े। स्कूल के बाद उन्हीं बच्चों को कोचिंग पढाने लगे। पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन जब उन्हीं बच्चों का केन्द्रीय विद्यालय नवोदय विद्यालय सी एच एस आदि में चयन होने लगा तो गांव के किसी व्यक्ति ने अपने घर का बाहरी कमरा पंडीजी को आफर किया। कोई चौकी लगा गया कोई ताजी दही दे जाता।
इधर गांव के कुछ सम्मानित लोगों ने पंडीजी से कहा कि हमारे बच्चों को भी पढाइए।
पंडीजी ने कहा कि हम केवल सरकारी स्कूलों के बच्चों को ही पढाते हैं।
सम्मानित लोगों ने अप्लीकेशन डाल दिया कि हमारे स्कूल का मास्टर मन का मालिक है। बारह बजे आता है छह बजे तक पढाता है। मतलब कोई टाईम टेबल नहीं है। जांच बैठ गई एक दिन बेसिक शिक्षा अधिकारी छह बजे पहुंचे तो देखा कि सच में प्रायमरी स्कूल के बरामदे में क्लास चल रही है। खिसिया कर पंडीजी की ओर आए और चौंक गए। अचानक मुंह से निकला - अरे पंडितवा तूं ईहां कैसे?
पंडीजी भी भावुक हुए अपने रूममेट को अधिकारी के रुप में देखकर। दौड़ कर लिपट गए। भरत मिलाप के बाद घर ले गए। रास्ते में किसी से बोल दिया कि ए चाची पानी भेजवाइए। किसी से कह दिया कि खाना भेजवाइए। कोई दही लेकर आया कोई घी में बना हलुवा।
अधिकारी साहब आश्चर्य चकित होकर एक लाईन लिख कर भेज दिए कि पंडितवा तो यूपी का आनंद कुमार है।
छब्बीस जनवरी को जिलाधिकारी ने पांच सौ रुपए और अंगवस्त्रम् से सम्मानित भी कर दिया। लेकिन आलोचकों ने फिर अप्लीकेशन डाला। इस बार न पहले वाले बेसिक शिक्षा अधिकारी थे न जिलाधिकारी। पंडितजी सस्पेंड कर दिए गए। थोड़ा बहुत बवाल मचा। गांव वाले धरना प्रदर्शन करने लगे। अंततः पंडीजी बहाल हुए।
         हो सकता है यह कहानी लग रही हो।बहुत शार्टकट में सुनाई है कहानी। पंडीजी आज भी सोनभद्र में तैनात हैं और बेसिक शिक्षा अधिकारी लोग शिक्षा में सुधार कैसे हो यह सीखने आते हैं उनसे। सस्पेंड और जांच से ऊपर की चीज हैं वो पंडीजी।
अब बात करता हूं वर्तमान शिक्षा की। लोग प्राथमिक विद्यालय में जूनियर विद्यालय में नियुक्त होकर सिविल की तैयारी करते रहते हैं।साथी अध्यापक गण गर्व से बताते हैं कि जो एस डी एम बना है वो मेरे विद्यालय में पढाता था हमारे साथ...। इसीलिये मैंने कहा कि शिक्षा का ढांचा उल्टा है। व्यक्ति ज्वॉइन करने के बाद भी शिक्षक नहीं बन पाया वह मन से तो एस डी एम है। पढाएगा क्या? शिक्षक सुनना तो उसे गाली जैसा लगता है वह शिक्षक होकर भी नहीं है। ये बस एक ऐसे प्लेटफॉर्म पर हैं जहां से उन्हें बीस हजार रुपये मिल रहे हैं और तैयारी का समय भी। मौका मिला कि बत्ती वाली गाड़ी पर सवार होकर निकल गए और अध्यापक वाली कुर्सी फिर किसी भावी एस डी एम का इंतजार करने लगी।
कुछ तो चालीस की उम्र तक तैयारी करते रहते हैं। बाकी के बीस साल इसी फ्रस्ट्रेशन में निकल जाते हैं कि साला मैं एस डी एम कैसे नहीं बना? अब सोचने वाली बात है कि वो पढाए क्या होंगे जीवन में।
दरअसल हमने अपना आदर्श माना है सर्वपल्ली राधाकृष्णन को। जो अध्यापक के पद से राष्ट्रपति पद तक पहुंचे। निश्चित ही शिक्षा संबंधी उनके विचार अमूल्य हैं और उनका योगदान अतुलनीय। लेकिन यह तो प्रतियोगिता हुई। बैंक का चपरासी भी मैनेजर बनने के लिए लालायित है। लेक्चरर, असिस्टेंट प्रोफेसर बनना चाहता है। असिस्टेंट जो है वो प्रोफेसर बनने के लिए व्यग्र है। जो प्रोफेसर हैं वो विभागाध्यक्ष, जो डीन हैं वो कुलपति और जो कुलपति है वह राष्ट्रपति बनना चाहता है। मैं पूछता हूं अध्यापक कहां गया? शिक्षक कहां गया? शिक्षक पद की गरिमा तो तब होती न जब कोई राष्ट्रपति कहता कि भाई मैं अध्यापक बन कर खुश रहूंगा। मुझे उसी पद पर तैनात करो।
गाजीपुर वाले पंडीजी के पास पर्याप्त अवसर था कि वो फिर से मनोयोग से सिविल में लग जाते लेकिन उन्होंने शिक्षक का पद नहीं छोड़ा।सबसे पहले तो शिक्षक को स्वयं प्रतियोगिता से मुक्त होना है। वकील साहब कार से चलते हैं और हम नहीं। ऐसी सोच एकदम नहीं चलेगी।
दूसरी बात! अक्सर मैं अधिकारियों के साथ स्कूलों में जाता रहता हूँ। किसी कमरे में दस बच्चे होते किसी में पंद्रह तो कोई क्लास शून्य।
मैं पूछता हूं कि - सर बच्चे क्यों नहीं आए?
अध्यापकों का जवाब होता है - हम क्या करें घर से उठा कर लाएं बच्चों को?
मैं चुप हो जाता हूँ। सच भी है भाई! जब सैंया कोतवाल हैं तो क्या डरना?
मैं अधिकारी नहीं हूँ सवाल करने का हक नहीं है। नहीं तो पूछता कि जब बच्चे ही नहीं हैं तो आपकी क्या आवश्यकता है यहां? आप भी घर जाइए। दीवारों और कमरों को पढाने के लिए तो आपकी नियुक्ति हुई नहीं है।
उपस्थिति की समस्या सभी सरकारी स्कूलों में है जबकि प्राईवेट स्कूल एकदम भरे हुए। चलिए एक बात पूछता हूँ - नवरात्रि का समय है अंगूर आ गये हैं बाजार में। एक दुकान में एकदम ताजा अंगूर है और दुकानदार यही सोचकर चुप है कि मेरा तो ताजा है ही मुझे क्या प्रचार करना?
दूसरी ओर बासी अंगूर वाला मिनट मिनट पर चिल्ला रहा है - लीजिए भैया अंगूर। अमेरिका का ताजा ताजा अंगूर....। अब आप बताइए किसके अंगूर बिकने की संभावना ज्यादा है? जो चुप है उसका या जो चिल्ला रहा है उसका?
निश्चित ही जो दिखता है वही बिकता है। जो चिल्ला रहा है वह सफल व्यापारी है। इसी तरह सरकारी स्कूलों के अध्यापक एम ए बीएड पी एचडी नेट टेट पता नहीं क्या क्या हैं। गजब के योग्य हैं लेकिन बेच नहीं पा रहे खुद को। बता ही नहीं पा रहे अभिभावकों को कि मैं पढा सकता हूं।
कमी यहां है - जैसे ही छुट्टी हुई हेल्मेट लगाया स्कूल से गायब। अध्यापिकाएं भी हैं स्कार्फ बांधा छतरी निकाली गायब। कितने लोग हैं जो अपने क्लास के बच्चे के घर जाते हैं उनकी टुटही चारपाई पर बैठ कर कहते हैं कि - ए चाची तुम्हारा लईका न बहुत तेज है रे दरोगा बनेगा। तोर गरीबी दूर कर देगा आंखी किरिया।
कितने लोग हैं जो रास्ते में गांव के लोगों को नमस्ते भैया नमस्ते बाबू नमस्ते चाचा कहते हैं? कितनी अध्यापिकाएं हैं जो रास्ते में किसी औरत के सिर पर सहारा देकर बोझा उठा सकती हैं?
क्यों कहेंगे भाई! अट्ठाईस सौ की पे स्केल, स्विफ्ट गाड़ी, एप्पल मोबाइल है न!
लेकिन आप भरोसा कीजिए। जैसे ही गांव के टच में आप आए, आपकी उपस्थिति बढ जाएगी। जैसे ही आपने गांव के आते जाते लडकों को नमस्ते भैया कहना शुरू किया दस दिन बाद वही लडके पहले ही आपको नमस्ते दीदी नमस्ते मैडम कहने लगेंगे। आज भी कुछ नहीं बदला भगवान् की तरह पूजा होगी आपकी, लेकिन पहले भगवान् बनना होगा।
हम लोग सरस्वती शिशु मंदिर में पढाते थे। हफ्ते में एक दिन पांच बच्चे के घर तय था जाना। महीने में पांच अभिभावकों को पोस्टकार्ड लिखते थे। पांच को फोन करते थे कि आपका बच्चा हिंदी में ठीक है। उसका बटन टूटा हुआ था कल। बाल बढ गया है उसका आदि आदि।एडमिशन के टाईम माईक वाली गाड़ी लेकर घूमते थे। विद्यालय के बैनर पोस्टर चिपकाते थे। अभिभावकों से मिलते थे। कोई तीन किलोमीटर दूर ताल में गेंहू काटता था तो वहां भी पहुंच जाते थे। तब जाकर उपस्थिति शत प्रतिशत होती थी।
अक्सर मैं हैरान रह जाता हूँ सुनकर कि बच्चों को पीटने पर अभिभावकों ने अध्यापक को पीटा। कहीं जेल भी होती है अध्यापक को। अगर मुझ पर यह नियम लगता तो यह लेख भी जेल से ही लिख रहा होता। चलिए आप से ही पूछता हूँ - आप क्लास में मार नहीं खाते थे? घर आकर कहते भी होंगे। लेकिन मां बाप भाई बहन की प्रतिक्रिया होती थी कि - तुम ही कुछ किए होगे।
विचार कीजिए इस पर। पहले अभिभावक अध्यापक पर भरोसा करता था। और आज यह भरोसा एकदम नहीं है। मैं यह नहीं कह रहा कि भरोसा बना कर पीट ही दीजिये। अपना बदला ले लीजिए। मैं बस यह कह रहा हूँ कि अभिभावकों के टच में रहिए। उन्हें बताइए कि आपका बेटा बेटी मेरा भी बेटा-बेटी है। मां बाप रोज पीटते हैं कहां होता है एफआईआर? तो बिना मां बाप बने मारेंगे बच्चों को तो यही होगा। आखिर कोई अनजान व्यक्ति कैसे मार सकता है मेरे बच्चे को? वही अनजान हैं आप उस अभिभावक के लिए।
एक बहुत छोटी सी बात कहूंगा - जहां कोचिंग पढाता हूँ वहां भीड़ संभालनी मुश्किल होती है। खिड़की के पीछे से लोग पढते हैं। सिफारिश कराते हैं। अब मेरी ही नियुक्ति वहीं बगल के इंटर कालेज में हो जाए तो क्या वही भीड़ लगेगी?
नहीं लगेगी। क्योंकि मैं अब बदल गया हूँ। अब मैं सरकारी नौकरी में हूँ मतलब आराम हो गया मुझे। तो जब ऐसी ही सोच है तो फिर मैं ही रहूंगा और दीवारें रहेंगी, बच्चे नहीं रहेंगे। मेरे क्लास में उपस्थिति कम है तो सीधे-सीधे मैं जिम्मेदार हूँ कोई और नहीं।
अगली बात- कुछ अध्यापक अध्यापिकाओं के घर जाना हुआ। गजब का साफ सुथरा घर। रंगी दीवारें, झालर मैट पेंटिंग पता नहीं क्या क्या। और कभी कभी उनके स्कूल भी जाना होता है। गजब की अव्यवस्था। बिखरी किताबें अनियंत्रित बच्चे। गंदी दीवारें।
मैं समझ नहीं पाता यह वही अध्यापक हैं जिनके घर मैं गया था। इतना दोहरापन क्यों भाई? अगर आप साफ सुथरे हैं तो हर जगह होंगे न? या अगर गंदे ही हुए तो फिर मुझे किसके घर ले गए थे अपना बता कर?
यह तो बहुत छोटी सी बात है। माना कि सरकार पैसा नहीं देती तो आप पांच अध्यापक मिल कर स्कूल को रंगवा नहीं सकते? लाईन से फूल क्यारियां नहीं बनवा सकते? स्कूल में ब्रेंच सनमाइका बोर्ड और बीस तीस अच्छी तस्वीरें सूक्तियां नहीं लगा सकते?
बस एक सत्र में ऐसा कीजिए अगर परिवर्तन नहीं होता है तो क्या होगा बहुत होगा तो आपके अधिकतम पांच हजार रुपये नुकसान हो जाएंगे यही न! सोच लीजिएगा कि असित कुमार मिश्र को दान में दे दिया इतना पैसा।
असित कुमार मिश्र
बलिया

Saturday, April 2, 2016

प्रत्यूषा बनर्जी के बहाने....

बहुत दुखदायी होता है असमय किसी पौधे का मुरझा जाना। मैं प्रत्यूषा बनर्जी को बहुत नहीं जानता। थोड़ी बहुत चर्चा जरुर सुनी थी। लेकिन अट्ठाईस साल की उम्र को बखूबी जानता हूँ और उस तनाव को भी जिससे गुजर गईं हैं वो।
        तीन चार साल पुरानी एक घटना याद आ गई। नया नया बी एड् किया था। लगता था कि दुनिया में एकलौता मास्टर मैं ही हूँ। इसी खुशी में इलाहाबाद निकल गया पढाने। वहां मेरे एक विद्यार्थी मित्र उदित थे ही।एक दिन उन्होंने बताया कि थोड़ी दूर पर मुकेश भैया हैं एकदम चलते फिरते गूगल। मने कुछ भी पूछिए और उत्तर लीजिए। सिविल की तैयारी करते हैं। मिलने चलेंगे?
मैंने कहा कि - सिविल फील्ड तो नहीं मेरा, लेकिन खलिहर आदमी हूँ तो चलो मिल लिया जाए।
मुकेश भैया चाय बना रहे थे। छननी हाथों में लिए छननी ढूंढने में व्यस्त... खैर बातें हुईं, खूब हुईं, हंसी ठहाके भी हुए।
मैंने पूछा कि भैया अगर नीली बत्ती नहीं मिली तो?
मुकेश भैया जैसे रोने के मूड में आ गए। बोले कि असित मैंने कुछ दूसरा सोचा ही नहीं यार। मर जाऊंगा मैं तो... कैसे भी नीली बत्ती लेनी है... साली एक दिन के लिए ही सही।
मैंने कहा कि भैया जब आप इतने समर्पित हैं तो जरुर मिलेगी। मुझे मत भूलिएगा लेकिन।
ऐसे ही समर्पित और लगनशील हजारों लडके हैं। मैं भी शामिल हूँ उनमें।इंटर बायोलॉजी से किया। विशेष योग्यता भी रही भौतिकी में। पक्का इरादा था कि डाक्टर बनना है। चश्मा भी लग गया था पावर वाला। लेकिन अक्सर वो नहीं होता जो हम चाहते हैं... मेरा चश्मा भी टूटा ख्वाब भी और साथ ही मैं भी।मन करता था आत्महत्या कर लूँ। मन मारकर बी ए में एडमिशन लिया हिंदी भूगोल राजनीति के साथ। हिंदी यह सोचकर लिया कि चलो बोलना और लिखना तो आता है न! भूगोल और राजनीति तो एकदम समझ में नहीं आते थे । उसमें भी सरकारी कालेज की पढ़ाई। लेकिन मन लगाया फिर एक बार। समर्पित हुआ फिर एक बार। और बी ए में हिंदी में विशेष योग्यता रही पूर्वांचल विश्वविद्यालय से। जहाँ प्राध्यापक नंबर देना और किडनी देना एक बराबर समझते हैं। हिंदी से एम ए भी कर लिया। तब पता चला कि यूपी में हिंदी के साथ संस्कृत भी चाहिए टीजीटी पीजीटी देने के लिए। फिर से बी ए किया संस्कृत से। पांच साल लगा। एक बार मुझसे परीक्षा छूट गई। एक बार रिजल्ट आने में दो साल लग गया। तब जाकर 2011 में फार्म भर पाया। भाग्य देखिए! मामला कोर्ट में चला गया अब तक परीक्षा ही नहीं हुई वह। अब शायद जून में होगी। लेकिन यहां भी तकदीर आगे है - अब बोर्ड ने नया नियम लगाया है कि इंटर में संस्कृत चाहिए। एक बार फिर अपात्र घोषित हो गया हूँ।
सच कहता हूं मैंने जीवन में दूसरा कोई फार्म ही नहीं डाला अध्यापक के अलावा। मेरा पूरा समर्पण है, मैंने दूसरा कुछ सोचा ही नहीं इसके अलावा।
अब अगर आप पूछ दें कि अच्छा असित भाई अगर टीचिंग की नौकरी न मिली तो?
तो मेरा जवाब वो नहीं होगा जो मुकेश भैया का था। मैं मरुंगा नहीं। कोचिंग पढाने लगूंगा। कुछ और करुंगा बिलकुल उसी समर्पण के साथ जो कल बायोलॉजी में था या आज हिंदी में है। क्योंकि कहानी में चान्स मिलता है जिन्दगी में नहीं। मैं ही नहीं रहा तो कौन सा टीचर और कौन सा डाक्टर? जिंदा हूँ तो उम्मीद तो है न कि आज नहीं तो कल बनूंगा ही।
दरअसल मुकेश भैया का सपना उनकी वास्तविकता पर भारी था। वो हर समय तनाव में थे। साक्षात्कार से पहले लूज मोशन, हल्का बुखार, झुंझलाहट, सामान रखकर भूलना यह सब आम बात थी। उन्होंने पहले नीली बत्ती की सोची बाद में जिंदगी।
एक कहानी और है छोटी सी ही। मुजफ्फरनगर की एक लड़की थी। ठीक ठाक घर की। इलाहाबाद गई थी लेक्चरर हिंदी की तैयारी करने। एक प्रतियोगी ग्रुप में जुडी हुई थी मुझसे। पहुचते ही फोन किया उसने कि सर कौन सी किताब लूं? मैंने कहा कि उमेश तिवारी की ले ले भाई। मैं खुद ही पढता हूँ उस किताब को।
तीन दिन बाद फिर उसका फोन आया कि सर किताब तो नहीं मिल रही। मैंने राहुल को बोल दिया है वो ला देगा कहीं से भी।
मैंने पूछा कि ये राहुल कौन हैं? तुम तो अकेले आई थी?
उसने कहा -(झिझकते हुए) जी ब्वॉयफ्रेंड है मेरा।
मैंने कुछ नहीं कहा। क्या कहता मेरे बराबर की लड़की है व्यक्तिगत बात है यह उसकी। हां थोड़ी हैरानी हुई कि यार इलाहाबाद के प्रीति गर्ल्स हॉस्टल में रहकर अल्ला पुर में बिकने वाली किताब तीन दिन में नहीं ढूंढ पाई और ब्वॉयफ्रेंड ढूंढ लिया?
ब्वॉयफ्रेंड /गर्लफ्रेंड मेरे हिसाब से देखा देखी बनते बनाते हैं। उसकी है तो मेरी क्यों नहीं? 'कोई न कोई चाहिए' टाईप फिल्मी डायलॉग सर में घूमता रहता है।
इसका एक और कारण है। इस उम्र में भावना (प्रेम और आकर्षक की) प्रबल होती है। घर परिवार से कटा हुआ लड़का लड़की का यह प्रेम फ्लो होना चाहता है। लेकिन हो कहां? न मम्मी को फुर्सत न पापा को। भाई-बहनों से ऐसे ही दूरी। साथ की लड़कियां सब जलने वाली और ब्वॉयफ्रेंड वाली। इसी बीच कोई लड़का मिल गया और वही उपादान बन जाता है उस प्रेम का।
कुछ दिनों तक सब हरा भरा लगता है। अचानक से 'भाषा विज्ञान' के ऊपर 'लैक्मे' रख दिया जाता है और 'हिंदी साहित्य' के ऊपर 'गार्नियर का फेशवाश' । महादेवी के ऊपर गाॅगल और कबीर के ऊपर स्टाॅल। फोन का आना, एस एम एस का आदान-प्रदान। और फिर वहां क्यों गई थी? वो लड़का कौन था? उस कोचिंग में क्यों गई? वो मस्टरवा क्या कह रहा था तुमसे? टाईप सवाल प्रतियोगी सवालों पर भारी पड़ने लगते हैं। और फिर घर वापसी।
गर्लफ्रेंड /ब्वॉयफ्रेंड मैं नहीं बनाता तो ऐसा नहीं कि मैं विरोध में हूँ। लेकिन आपके लक्ष्य आपके सपने और आपकी जिंदगी पर आपका गर्लफ्रेंड /ब्वॉयफ्रेंड भारी पडने लगे इससे अच्छा है कि वह प्रेम कविता, कहानी, बागवानी, रेखाचित्र बनाने में लगाइए। कुछ नहीं यार! बहुत प्यार आए तो आधा किलो ऊन खरीदो स्वेटर बुनो। नफरत जागे तो फिर से उघार कर गोला बना कर रख लो। फिर प्यार आए तो फिर दूसरा डिजाइन बनाओ।
एक समस्या और है इसके साथ-साथ। कम उम्र में अप्रत्याशित नाम पहचान या उपलब्धि का मिलना। मुकेश भैया ने एक बात कही थी - यार आधा इलाहाबाद मुझे एस डी एम कहता है। अगर नहीं बना न तो...
यह दबाव मेरे साथ भी है - यार हजारों लोग जानते हैं मुझे कि टीचर हूं। प्रेमचंदर कहते हैं और अगर टीचर न बना तो...
यह दबाव का मनोविज्ञान है। आसानी से पीछा नहीं छोडता।
मैं कभी-कभी टीवी में देखता था कोई कार्यक्रम आता था संगीत प्रतियोगिता का छोटे छोटे बच्चे,अद्भुत प्रतिभा। लेकिन जीतेगा तो कोई एक ही न। मैं रोते हुए बच्चों और रोते हुए मां बाप को देखता हूँ। अजीब हैं यार ये लोग। इस उम्र में हमारे यहां बच्चे दौड़ते हैं, गुल्ली डंडा खेलते हैं। और आपने गला काट कंपटीशन में डाल दिया अभी से? यह नहीं सोचा कि यह टूटा हुआ बच्चा फिर संभलेगा भी कि नहीं!
       बहुत बड़ा नहीं लिखना है। मुझे लगता है कि स्वर्गीया बनर्जी के साथ यही सब कारण रहे होंगे।बहुत बड़ी संख्या है जो इस उम्र में है और बहुत तरह के तनाव झेल रही है। यह तर्क की बात नहीं है। हम सबको गंभीरता से सोचना होगा इस पर। हमें यह सीखना - सिखाना होगा कि असित कुमार मिश्र को कोई झिझक नहीं है चाहे वो इलाहाबाद में लेक्चरर बने या ब्रेड पकौड़े बेचने वाला। मैं अपना सौ प्रतिशत उसी काम में दूंगा। पूरे इलाहाबाद में सबसे बेहतरीन स्वाद मेरे ब्रेड पकौड़े का होगा यह वादा करता हूं आज ही। क्योंकि सपने में जिंदगी नहीं आती। जिंदगी में सपने आते हैं।
आखिरी बात! मुकेश भैया को नीली बत्ती मिली।एक ही दिन के लिए....हां एम्बुलेंस से ही उनकी लाश गई थी घर....

असित कुमार मिश्र
बलिया