Saturday, September 10, 2016

विक्रम - बैताल की आधुनिक कथा भाग एक

विक्रम - बैताल की आधुनिक कथा        (भाग एक)

पेड़ पर लटकते हुए बैताल को विक्रम ने अपने कंधे पर जनतंत्र की तरह लाद लिया और मँहगाई की तेज़ गति से चल पड़े।
दस कोस की यात्रा के बाद अचानक बैताल ने कहा - राजन! हमारे शास्त्रों में कहा गया कि "काव्यशास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम्" अर्थात विद्वानों का समय काव्यशास्त्र आदि की चर्चा में ही व्यतीत होना चाहिए। निद्रा और विवाद में समय बिताने वाले मूर्ख होते हैं। फिर आप चुप क्यों हैं? किसी विषय पर सार्थक चर्चा चलाइए।
विक्रम ने खिसिया कर कहा - देखो बैताल! चुपचाप एलपीजी सिलेंडर की तरह कंधे पर पड़े रहो। एक तो ऐसे ही मूड आफ है उस पर तुम और परेशान मत करो।
बैताल ने अट्टहास किया और कहा - राजन किस बात से व्यथित हो? बताओ संवाद से ही हल निकलता है।
विक्रम ने कहा - मैं आर्यावर्त के लोगों की मनोदशा नहीं समझ पा रहा हूँ। देश के एक कोने में एक सामान्य व्यक्ति अपने कंधे पर पत्नी की लाश लिए सत्तर किलोमीटर की यात्रा करने लगता है। मार्ग में तीन हज़ार गाड़ियाँ गुजरी होंगी लेकिन किसी ने उसके साथ चलना उचित नहीं समझा। वहीं देश के दूसरे कोने में शहाबुद्दीन के जमानत से मुक्त होने पर तेरह सौ गाड़ियों का काफिला चल पड़ता है। क्या है यह?
बैताल ने मुँह से सुरती थूकते हुए कहा - राजन! बेवकूफ मत बनो। जनता की बात मत करो। जनतंत्र की रीति समझो।जनतंत्र में आम और जनता दोनों का एक ही अंजाम होता है - दोनों चूस कर फेंक दिए जाते हैं। इसीलिये जब भी जनता और तंत्र की लड़ाई हो तो तुम भी तंत्र की ओर हो जाना। आम और पेड़ की लड़ाई में हमेशा पेड़ की ओर रहना। याद रखना जनता और आम चूस कर फेंक दिए जाते हैं इसीलिए आर्यावर्त के लोग खुशी खुशी स्वयं को "आम-जनता" कहते हैं। जब तक इस आम जनता का वास्तविक अर्थ लोग नहीं समझेंगे तब तक यही स्थिति रहेगी। खैर कोई दूसरी बात करो राजन।
     विक्रम ने कहा - बैताल! हम अपनी कोई भी जनकल्याणकारी योजना लागू नहीं कर पाते हैं जैसे आधार कार्ड को ही देख लो। सुश्री कैटरीना कैफ से लेकर श्री अमिताभ बच्चन जी के द्वारा व्यापक प्रचार प्रसार कराया गया फिर भी पचपन प्रतिशत जनता का आधार कार्ड नहीं बन पाया। ऐसा क्यों है?
बैताल ने हँसते हुए कहा - राजन शर्त याद है न। मेरे समाधान बताने पर अगर तुम्हारे मुख से "सही कहा" निकल गया तो मैं फिर डाल पर जाकर लटक जाऊंगा। बैताल ने आगे कहा - जानते हो! तुम जनता की मनोदशा को समझ नहीं पा रहे। याद करो हर फिल्म के पहले ट्रेलर दिखाया जाता है कि - 'सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है'। शराब की बोतलों पर साफ़ साफ़ लिखा रहता है कि - शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। फिर भी लोग उसे खरीदते हैं।
राजन! तुम्हें भी कुटिल व्यापार नीति अपनानी चाहिए।शुद्ध घी के डिब्बे पर जब तक लिखोगे नहीं कि घी खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है तब तक घी बिकेगा नहीं। अमूल दूध को बेचना है तो उस डिब्बे पर लिखा होता है - "माँ का दूध ही सर्वोत्तम है"।यही व्यापार की नीति है। तुम वास्तुदोषों का निवारण करके स्वर्ग जैसे उपवन में शहद की दुकान नहीं चला सकते लेकिन मैं श्मशान भूमि में बियर की दुकान खोल दूं तो खूब चलेगी।
व्यथित हृदय से विक्रम ने कहा - अच्छा! तब हमें आधार कार्ड बनवाने के लिए क्या करना चाहिए?
बैताल ने कहा - देखो राजन हिंदुस्तान का हर आदमी ईमानदार है सिर्फ उसके पड़ोसी को छोड़कर। तुम बस यह प्रचारित करा दो कि अगर आप अपने पड़ोसी से बदला लेना चाहते हैं तो उसका आधार कार्ड बनवा दीजिए।
जैसे अगर आप जानते हैं कि आपका पड़ोसी करोड़ों रुपये की अवैध कमाई करता है और उसके कई बैंकों में अकाउंट हैं।अगर उसका आधार कार्ड बन जाए तो आगे चलकर आधार कार्ड से उसके सारे खाते पकड़ में आ जाएंगे और उसे या तो आय का श्रोत बताना होगा या इन्कम टैक्स देना होगा।
इसी तरह मान लीजिए कि आपका पडोसी बैंक में डकैती करता है या एटीएम से धोखाधड़ी करता है तो उसका आधार कार्ड बनवा दीजिए। आप जानते हैं कि आधार कार्ड में आँखों के रेटिना के प्रिंट लिए जाते हैं और आगे चलकर बैंक के एचडी सीसीटीवी फुटेज को जूम कर उसकी आँखों के रेटिना को आधार कार्ड से मैच कराया जाएगा तो पडोसी के घर पहुंचने से पहले ही पुलिस उसके पहुंच जाएगी। क्योंकि बंदा कुछ भी कर ले आँखे तो खुली ही रहेगी न। अगर हेल्मेट चश्मा या फोटो फ्रेमिक ग्लास भी रहा तो हाई क्वालिटी के कैमरे चश्मे के बाद भी रेटिना के फुटेज निकाल लेंगे।
आधार कार्ड एक बहुउद्देशीय योजना है अगर इसे ढंग से लागू किया जाए तो सिलेंडर की सब्सिडी से लेकर खाद्यान्न घोटाला और सार्वजनिक जगहों पर अपराध करने वाले अपराधियों तक पुलिस की पहुंच आसान हो जाएगी।
रूस में वैज्ञानिकों की एक टीम इस तरह का सेटेलाइट बना रही है जो आने वाले दिनों में आसमान में से आँखों की रेटिना को हमेशा लोकेट करता रहेगा ठीक वैसे ही जैसे मोबाइल में नेटवर्क। मतलब साफ है कि अगर आपके पड़ोसी की जेब में आधार कार्ड है तो वह हमेशा नज़र में है। इसी तरह मान लीजिए अगर आपके पड़ोसी ने आप पर हमला कर दिया और आपका आधार कार्ड क्षतिग्रस्त हो गया तो निकटतम केंद्र में सूचना पहुंच जाएगी। और आपका पड़ोसी आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। तो अगर आप अपने पड़ोसी को ढंग सिखाना चाहते हैं तो अपनी जेब से भी बीस रुपया लगाकर उसका आधार कार्ड बनवा दीजिए। उसके हाथ पैर पर भी गिरना हो गिरिए लेकिन उसका आधार कार्ड बनवा कर ही चैन लीजिए...
      अचानक विक्रम के मुँह से निकला - सही कहा बैताल भाई। आर्यावर्त में यही नीति सफल होगी।
इधर बैताल अट्टहास करते हुए उड़ गया और फिर उसी डाल पर जाकर लटक गया।
असित कुमार मिश्र
बलिया

Tuesday, August 16, 2016

ये रहा रियो वाला मैडल

हफ्ते भर से रियो में मैडल की तलाश जारी है। मुझसे भी एक दो मित्रों ने पूछा कि असित भाई रियो वाला मैडलवा कहाँ है?
देखिए! खेलों की बहुत समझ नहीं है मेरी, क्योंकि बचपन में मुझे खेलता देख कर बाबूजी दूर से ही गरियाने लगते - खाली खेलऽ ससुर, बइठ के दु अच्छर पढ़िहऽ - लिखिहऽ मत। वही खेलों से जो दूरी बनी वो आज भी है। मेरे जीवन में क्रिकेट का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है सात रन। वो भी बाॅलर ने बैट पर ही गेंद मार दी होगी।
तो मैं नहीं बता सकता कि आपके मैडल कहाँ हैं? वैसे भी मैं छोटी मोटी कथा कहानियों वाला हूँ भाई! मुझे कहाँ इस फील्ड में घुसा रहे हैं। छोड़िए ये मैडल की बातें। अपने गाँव की एक कहानी सुनाता हूँ।
         कुछ साल पहले एक लड़का था मेरे गाँव में, नाम था लंगड़ा। मने नाम तो संतोष था उसका, लेकिन उसके एक पैर का पंजा थोड़ा सा टेढ़ा था।तो नाम पड़ गया लंगड़ा। सातवीं में था। हकलाता भी था थोड़ा बहुत। हमारे कस्बे के स्कूल के बहुत बड़े फील्ड में ब्लाक रैली हो रही थी।इलाके के एक से एक दौडने वाले लड़के ट्रैक पर स्पाइस सूज और लाल पीले ड्रेस में रन अप के लिए तैयार हो रहे थे। पता नहीं क्या लंगड़ा के मन में आया कि गेम टीचर से जा कर बोला कि - माट्साब! हमहूँ दौड़ेंगे।
माट्साब ने देखा कि एक फटे कुर्ते, हाफ पैंट और नंगे पैर वाला जमूरा खड़ा है।
उन्होंने डांट कर भगा दिया।
लंगड़ा फिर घुस गया और फिर कहा - माट्साब - हमहूँ दौड़ेंगे।
अबकी माट्साब ने एक दो थप्पड़ धरा कर लंगड़ा के दौड़ने का भूत उतार दिया।
लंगड़ा रोते हुए गाँव में पहुँचा। तुरंत खबर फैल गई कि गाँव की इज्जत पर किसी ने हाथ उठाया है। गाँव कुछ मामलों में बहुत अच्छे होते हैं। भले ही गाँव का लंगड़ा पिछड़े वर्ग में आता हो, लेकिन बाहरी मामले में बाभनों की लाठियां भी उसी के तरफ से चलेंगी। तुरंत आपातकालीन बैठक हुई और आदेश पारित हुआ कि हमारा लंगड़ा उस फील्ड में दौड़ेगा तो दौड़ेगा,अब चाहे गोली चले या भाला।
रेफरी ने अपनी समस्याएं बताईं कि इस लड़के से दो गुने उम्र के धावक हैं ये, और सब पुलिस की तैयारी वाले हैं। फिर लंगड़े के पास जूता भी तो नहीं।
गाँव वालों ने कहा कि - हमारा लंगड़ा ऐसे ही दौड़ेगा। नहीं तो अभी के अभी खेल बंद।
खैर! लंगड़ा दौड़ा उसके फटे कुर्ते के दोनों पल्ले फहराने लगे और दो सौ मीटर की रेस के सभी पुरनके चैंपियन लंगड़ा से लाठी भर पीछे रह गए।
         आज पच्चीस साल का हो गया है लंगड़ा। अब उसे हम लोग संतोष कहते हैं और दिल्ली में यही संतोषतवा कहीं दस हजार पर काम करता है। आप पूछ रहे थे न कि कहाँ है मैडल ? पेट की आग में अक्सर सोने जलकर राख हो जाते हैं दोस्त।
मैं यह नहीं कह रहा कि संतोष 'बोल्ट' बन जाता रेसिंग का। लेकिन उसे एक मौका तो मिलना चाहिए था न!
          ऐसे ही एक बार हमारे खेत में गेहूँ की कटाई हो रही थी। पंद्रह बोझे हमारे होते हैं और सोलहवाँ बोझा काटने वाली मजदूरिन लड़की का। यही सोरहिया सिस्टम है। मजदूरिनें पंद्रह बोझे छोटे छोटे बाँधती हैं और सोलहवाँ खूब बड़ा। इसी पर एक दिन बाबूजी चिढ़ गए और एक बहुत बड़े बोझे को देखकर बोले कि इसे अकेले उठाकर घर लेकर चली जाओ सौ रुपए इनाम दे दूंगा। अचानक एक सांवली सी गठे बदन वाली लड़की आई, साँस अंदर खींचा, और बोझा उठाकर कपार पर रखकर चल दी। बाबूजी हैरान रह गए। मैंने कहा कि - ए बाबूजी सौ रुपियवा दीजिए उसे देते आएं...।
बाबू जी मुझी पर भड़क गए - भाग!! ससुरा एहिजा से।
           जानते हैं भारी बोझा लेकर चल रही किसी लड़की के कमर का लचीलापन देखिएगा कभी, और किसी वेट लिफ्टर से पता कीजिएगा कि शरीर में यह लचक कितने मेहनत से आती है?  जिसे भारत की गरीबी यूं ही सिखा देती है। आप पूछ रहे थे न कि मैडलवा कहाँ है? आज वो लड़की कहीं औरत होकर कटिया पिटिया कर रही होगी। मैं यह नहीं कह रहा कि वो लड़की 'कर्णम मल्लेश्वरी' ही बन जाती। लेकिन एक मौका तो उसे भी मिलना चाहिए था न! ऐसी सौ मजदूरिन लड़कियों में एक वेट लिफ्टर बन सकती है। और ऐसा संतोषवा तथा लड़कियां भारत के हर गाँव कस्बों में पाए जाते हैं।
बहुत बड़ा हो जाएगा अगर ज्यादा उदाहरण दिया तो। लगभग दस दिन पहले आजमगढ़ की एक खबर छपी थी कि कोई यादव लड़का देश स्तर का धावक होकर भी खेतों में काम कर रहा है। वो भी वही मैडल है, जिसे आप रियो में ढूंढ रहे थे। ये मैडल यहाँ से चले ही नहीं, तब तक आप रियो पहुँच गए और इन्हें ढूंढने लगे। आपने पीछे मुड़कर कभी देखा ही नहीं कि ये मैडल रास्ते में कहाँ अटक गए।
             दरअसल भारत क्लर्को का और नेताओं का देश है। मेरे बाबूजी भारत के वही टिपिकल पिता हैं जो अपने बच्चे को खेलता नहीं देख सकता।और भारत का हर पिता दयाशंकर मिसिर ही होता है। उन्हें मेरे पढ़ लिख कर क्लर्क बना देने में ही खुशी होगी असित कुमार तेंदुलकर उन्होंने कभी सोचा भी नहीं।
नीतियाँ भी कुछ ऐसी ही दोषपूर्ण हैं। सचिन तेंदुलकर जी पर हम खुश हुए तो उन्हें भारतीय वायुसेना में कैप्टन बना देंगे मनोनीत सांसद बना देंगे। लेकिन उन्हें कोई अत्याधुनिक क्रिकेट स्कूल खोलकर नहीं दे सकते कि - लो भाई अपने जैसे बच्चे तैयार करो।
साइना नेहवाल जी पर बहुत खुश होंगे तो उनके हाथों में कैंट आर ओ का डब्बा थमा कर विज्ञापन की दुनिया में घसीट देंगे, लेकिन उन्हें किसी बैडमिंटन स्कूल में दो घंटे देने के लिए नहीं कहेंगे।
आप देख सकते हैं हर गली मुहल्ले में क्लर्क बनाने वाले हाईस्कूल इंटर कॉलेज। डाक्टर इंजीनियर बनाने वाले वो चमकदार बिल्डिंग्स और होल्डिंग। लेकिन पूरा बलिया जिला घूम लीजिए एक भी न कोच मिलेगा न स्पोर्ट्स कालेज। और लगभग पूरे भारत का यही हाल है। हर गाँव में दो चार असफल बीटेक और चार छह असफल बी एड धारी जरुर हैं लेकिन एक सफल सचिन नहीं मिलेगा आपको।
            जाति वर्ग संप्रदाय गलत चयन की लड़ाई लड़ कर, पेट की आग को दबा कर कोई ललिता कोई दीपा करमाकर रियो में पहुँचती हैं। और इस हाल में भी अगर आपकी शिकायत है कि दीपा सोना नहीं ला सकी तो आपको बता दूँ कि उतने सोने का तो झुमका पहन कर हमारे गाँव की औरतें किरासन तेल की लाइन में खड़ी होती हैं।करना है तो गर्व कीजिए इस बात के लिए, कि ललिता और दीपा इस कुपोषित और संक्रमित हाल में भी अकेले भारत के लिए लड़ने पहुँच गईं।अगर मैडल चाहिए तो हर ललिता और दीपा के कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा होना होगा। उन्हें भरोसा दिलाना होगा कि दीपा, भारत भूखा रह जाएगा लेकिन तुम नहीं।पहले हम रियो नहीं पहुंचेंगे। तुम्हें अपने साथ लेकर चलेंगे... क्योंकि कोई भी मैडल दीपा को नहीं मिलता....देश को मिलता है।

असित कुमार मिश्र
बलिया
        

Friday, June 24, 2016

बोतल भी उठा लाया....

कुछ मामलों में गाँव का इतिहास भूगोल राजनीति ही नहीं अर्थशास्त्र और गृहविज्ञान तक अलग होता है।समाचार और हेडलाइंस यहाँ तब आते हैं जब दूसरी जगहों पर लोग उसकी समीक्षा ही नहीं पोस्टमार्टम कर चुके होते हैं। इसी तरह हमारा न्याय शास्त्र भी अलग होता है कई बार 'फैसला आन दि स्पाॅट' करने में गलतियाँ भी हो जाती हैं।
वो हमारे भी खेलने खाने के दिन थे। हमारा मासूम सा चेहरा हमारे गुनाहों को छुपा लेने का बहुत बड़ा हथियार था ही, उस पर भी सबसे सम्मानित परिवार के हम ही ठहरे। यूं गाँव के 'नवयुवक मंगल दल' के प्रथम अध्यक्ष बनाए गए। पहला आक्रमण गाँव के हालावादियों पर करने का प्लान बना। पहले शिकार के रूप में एक वकील साहब का चयन किया गया जो अक्सर हाला की प्याला का पान कर आत्मा का अवैध कनेक्शन परमात्मा से जोड़ने लगते थे। थे तो बड़े योग्य लेकिन पता नहीं कैसे शराब की लत लग लगी। हमारे 'सामाजिक बहिष्कार कार्यक्रम' को वो पहले ही फेल कर चुके थे। क्योंकि शराबियों का अलग ही समाज होता है और उनकी आकांक्षाएं भी अलग। इसीलिए उन पर हमारे इस सामाजिक बहिष्कार रुपी आग्नेयास्त्र का असर नहीं हुआ था। अब हमारे सामने बह्मास्त्र यही था कि जब भी ये शराब पी कर आएं, इन्हें पीट दिया जाए।इन क्रांतिकारियों में उनका खुद का लड़का भी था।
      शाम के समय गाँव, गाँव बन जाता है। चूल्हे से धुआँ उठने लगता है आटा गूंथने वाली चूड़ियाँ खनखनाने लगती हैं, और कोई सास दुआर पर बैठ कर नवकी कनिया को सरापने लगती है - जा ए पुरा पर वाला मामा एइसने लुआठ नियर लइकी खोजलऽ"। लगभग इसी समय वकील साहब मिर्ज़ा असदुल्ला खां गालिब के प्रतिनिधि बने चले आ रहे थे। उन्होंने मिसरा उठाया ही था-" दर्दे दिल भी गमे दौरां के बराबर से उठा..... आग सहरा में लगी और धुआं घर से उठा... तक आते आते उन पर थप्पड़ों की बरसात हो चुकी थी। उस धक्का मुक्की में मैं ही पता नहीं कैसे उनके सामने आ गया और उन्होंने मुझे पहचान लिया। खैर टेंशन नहीं थी क्योंकि लोग गंगा जल में खड़े होकर भी कहते कि मैं मारपीट करता हूँ तो कोई नहीं मानता।
       हम अपने ब्रह्मास्त्र का असर देखना चाहते थे, लेकिन वकील साहब दिख ही नहीं रहे थे।अचानक सड़क पर एक चाय की दुकान से आवाज आई - "आवऽ सोनू बाबू चाय पियाईं"। मैं चौंक गया क्योंकि आवाज हमेशा की तरह वकील साहब की ही थी। मैं अपराध बोध से शर्माते-शर्माते गया। उन्होंने हमेशा की तरह एक दिलफरेब शायरी के बाद चाय की प्याली धराई।
अब मेरे मुँह से निकला - वकील साहब! माफ कीजिएगा उस दिन आपको मारने वालों में मैं भी था।
वकील साहब ने शायरों की तरह ठहाके लगा कर कहा - सोनू बाबू! आप झुट्ठे परेशान हैं चोट हमको थोड़े लगी थी। ऊ जो बोतलवा हम पिए थे वही ससुरा पिटाया।
वकील साहब इस दुनिया में नहीं अब। लेकिन आज भी हम "बोतलवा" को रोज पीटते हैं... खूब पीटते हैं।
एक दिन डा कुमार विश्वास के पेज पर एक बहुत अच्छी शायरी आई। मैं सोच ही रहा था कि उन्हें धन्यवाद कह आऊं। तब तक किसी 'नव युवक मंगल दल' वाले भाई, कुमार विश्वास जी को दस बीस गाढ़ी गाढ़ी गालियां देते हुए अवतरित हुए। मैं असहज हो गया लेकिन चुप रहा।दो मिनट बाद "कुमार विश्वास" पेज की सीनियर एडमिन रुचिका आईं और उन्होंने लिखा कि - भैया, आपको इतने अच्छे संस्कार देने वाले आपके माता-पिता को मेरा प्रणाम।
दो मिनट में रुचिका के इस कमेंट को सात सौ लाइक मिले और सैकड़ों समर्थन भी। दुबारा वो गालियों वाले मुँह नहीं खुल पाए।
       मैं समझ नहीं पाता कि जब हम कुमार विश्वास को शब्दों से पीट नहीं पाएंगे तो फिर गालियाँ हम लिखते ही क्यों हैं? यहाँ शब्दों से पहचान है हमारी। शब्द यहाँ रोते हैं, गाते हैं, हँसते हैं, मुस्कुराते हैं। शब्द ही पीटते हैं शब्द ही पिटाते हैं... मेरे दोस्त! किसी कुमार विश्वास को कभी चोट नहीं लगेगी, उसी वकील साहब की तरह। बस बोतलवे पर फैट मार रहे हैं हम।
बात यहाँ किसी कुमार विश्वास जी की नहीं है बात यहाँ हमारी आपकी सबकी है। कल किसी चर्चित कवि श्री शायक आलोक जी ने श्री वीरू सोनकर के लिए एक वाक्य लिखा - "वीर बेटा! मेरा यौनांग तुम्हारे मुख से सुंदर है "।
संभव है इन दोनों कवियों में कुछ वाद विवाद हो। मैं बहुत नहीं जानता इन लोगों के बारे में। और मनुस्मृति भी मैंने थोड़ी बहुत पढ़ी है पर, इससे पतित, निकृष्ट और गंगा वाक्य जीवन में मैंने पढ़ा न सुना।
कविता के बारे में मेरी समझ बहुत अच्छी नहीं। एम ए का वाइवा था परीक्षक महोदय ने सवाल किया था - तुम्हारा प्रिय कवि?
मैंने कहा था - धूमिल।
उन्होंने अगला सवाल किया - साठोत्तरी कविता के बाद बताओ?
मैंने कहा - सर! साठोत्तरी कविता के बाद भी कवि हुए क्या!
पता नहीं क्या हुआ परीक्षक महोदय मेरे उत्तर पर तालियाँ बजाने लगे। सच कहता हूँ मैं नहीं जानता कि आजकल कैसी कविता आ रही हैं, कौन कौन लिख रहे हैं! लेकिन दोस्त! धूमिल जैसा भदेस, धृष्टता की हद तक, और आक्रोश की भाषा में ही लिखने वाला जब कहता है कि - "कविता भाषा में आदमी होने की तमीज़ है"।
तो जरूर एक बार हम सभी को सोचना चाहिए कि अपने पाठकों के प्रति हमारा कोई दायित्व है कि नहीं? जिस दिन पहला फॉलोअर बनता है हमारा, उस दिन बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ जाती है हम पर। हम कौन सी दिशा, भाषा और चिंतन दे रहे हैं समाज को अपने इस साहित्य से?
         कल मेरे "इंजीनियरिंग वाले" पोस्ट पर एक इंजीनियर साहब मुझे "बलियाटिक चुनौती" दे गए साहित्य में दो-चार हाथ करने की। और साहित्य के नाम पर मैं डर जाता हूँ क्योंकि एक पंक्ति ही आती है मुझे साहित्य के नाम पर -
मानुष प्रेम भयहुं बैकुंठी। नाहीं त काह छार भई मूठी।।
मैंने उनसे खूब हंसी मजाक किया। मेरे पास सैकड़ों कारण थे कि उनको गालियाँ देता, भगा देता, दुराचार करता। लेकिन मैंने देखा कि वो साधारण पाठक ही थे। बस भ्रम हो गया था उन्हें कि मैं इंजीनियरिंग की शिकायत कर रहा हूँ।
गलत मत समझिएगा, संत नहीं हूँ मैं। ईंट का जवाब पत्थर से नहीं परमाणु बम से देता हूँ। लेकिन भाषिक अभद्रता नहीं करता। आक्रोश और अभद्रता में अंतर होता है।
एक बार फेसबुक के महारथी कहे जाने वाले श्री अजीत सिंह सर मुझसे अभद्रता कर बैठे। सीधे उनके इनबॉक्स में समझा आया कि- सर! बलिया का हूँ कलम कुदाल और कट्टा तीनों चलाता हूँ। तब मैं पच्चीस लाइक पाता था और अजीत सर पच्चीस सौ। लेकिन लड़ गया उनसे।और एक दिन उन्होंने पश्चाताप करते हुए मेरी एक पोस्ट तारीफ के साथ शेयर की। आज भी फेसबुक पर मैं छोटे-मोटे लोगों को दुश्मन नहीं बनाता क्योंकि मेरे एकमात्र दुश्मन अजीत सिंह सर हैं।
लेकिन मैंने बेहतर लिख कर जवाब दिया उन्हें। गालियाँ नहीं दी ब्लाक नहीं किया अनफ्रेंड नहीं किया। जबकि सैकड़ों कारण थे मेरे पास। और उनकी कोई आवश्यकता भी नहीं थी मेरे जीवन में। कहीं मेरा जिक्र आने पर अजीत सर कहते हैं कि नहीं मैं असित को नहीं जानता। मैं भी कहता हूँ कि मैं किसी अजीत सिंह सर को नहीं जानता। दुश्मनी अपनी जगह है इसमें अभद्रता अश्लीलता जातिगत टिप्पणी अमर्यादा कहां से आई?
            आज फेसबुक पर अमर्यादित आचरण टिप्पणियाँ लेख बढ़ते जा रहे हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि दुश्मनी मत कीजिए। कीजिए। खूब कीजिए। लेकिन इतनी गुंजाइश बची रहनी चाहिए कि, अगर कभी मिलें तो शर्मिंदा न हों।
इसीलिये जब भी आक्रोश में आकर गालियाँ लिख रहे हों, अभद्रता करने जा रहे हों तो याद कीजिएगा मेरी बात - चोट 'वकील साहब' को लगेगी नहीं, और 'बोतलवा' पर फैट मारने से कोई फायदा नहीं :)
असित कुमार मिश्र
बलिया

       

Tuesday, June 21, 2016

योग दिवस का सीधा प्रसारण

नमस्कार। जैसा कि आप सभी जानते हैं आज वर्ड योगा डे है पूरे देश की तरह बलिया में भी योगा डे सेलिब्रेट किया जा रहा है। आइए आज हम ले चलते हैं आपको जनता के बीच और जानते हैं योगा डे पर उनकी राय। कैमरामैन कतवारु चौधरी के साथ मैं रजमतिया... लेकिन लेते हैं पहले एक छोटा सा ब्रेक।
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(सीन एक - गांव में धूल उड़ाती हुई छतरी लगी वैन रुकी है और कमांडो की तरह कूद कर रजमतिया जी माइक एक नेता टाईप आदमी पर तान लेतीं हैं सामने से कैमरामैन कतवारु जी फुल्ली सपोर्ट कर रहे हैं )
रजमतिया - हाय! आए एम रजमतिया फ्राम एक्स वाई जेड न्यूज चैनल। आज वर्ड योगा डे है आपकी क्या राय है इस पर?
आदमी -( गला खंखार कर) देखिए मोदी जी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं...
रजमतिया - (आदमी की बात काट कर) नहीं नहीं। योगा डे पर अपना मत दीजिए।
आदमी - (थोड़ा तैश में आकर) देखिए भैन जी।मोदी जी केन्द्र के लिए ठीक हैं बाकिर बिधायकी में तो हमारा मत अकलेस जादो जी को ही जाएगा...
रजमतिया - नहीं नहीं। हम बस यह पूछ रहे हैं कि योगा को आप किस नज़रिए से देखते हैं?
आदमी - (खिसियाते हुए) देखिए अब अति हो रहा है मैडम जी। जरुर ई सब सुमेसर परधनवां की चाल है। पूरा ग्राम सभा जानता है कि हम गांव की बहू बेटियों को अपने ही बहू बेटी के नजरिए से देखते हैं और...
रजमतिया - ओके ओके। हम समझ सकते हैं आपकी बात। (कैमरे की ओर देखकर) तो आप देख सकते हैं कि हर पार्टी और विचारधारा के लोग योगा को सेलिब्रेट कर रहे हैं। आइए अब देखते हैं हमारे प्रदेश का युवा क्या सोचता है योगा के बारे में -
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(सीन दो - साइकिल से आ रहे एक अट्ठाईस तीस साल के दुबले पतले लड़के को जिसने प्लास्टिक के थैले में कागज रखे हैं उसे रोक कर उसके सामने कैमरा तान दिया गया है)
रजमतिया - हैल्लो फ्रेंड! क्या आपने पिछले हफ्ते ब्लड डोनेट किया था?
लड़का - ना। हम यूपी वाले ब्लड डोनेट नहीं करते हैं।
रजमतिया - (हैरानी से) क्यों? क्यों??  ब्लड डोनेट करना तो अच्छी बात है।
लड़का - (अपने शरीर को दिखाकर) ले लीजिए ! पांच साल में समाजवाद ने जो छोड़ा हो उसे आप चूस लीजिए।
रजमतिया - ओह नो। इट्स नॉट। हम तो यह कह रहे हैं कि आप योगा डे सेलिब्रेट कैसे करते हैं?
लड़का - बहन जी! यूपी का लौंडा अलग से योगा नहीं करता।भर्तियों का फार्म भरने और परीक्षा देने के बाद कोर्ट की तारीखें गिनते गिनते ही सारा मोटापा छू मंतर हो जाता है... हटिए अभी टीजीटी पीजीटी का फारम भरने जा रहे हैं।
रजमतिया - अरे अभी तो यूपी की टीजीटी पीजीटी की परीक्षा हुई है न!
लड़का - कांहे परेशान कर रही हैं। एक विषय में बीस बीस सवाल गलत आए थे। मामला कोर्ट में जाएगा और परीक्षा रद्द होगी...
रजमतिया - ओके ओके। हम समझ सकते हैं आपकी बात। (कैमरे की ओर देखकर) तो आप देख सकते हैं कि युवाओं में भी योगा का क्रेज बढ़ रहा है। हमारी समाजवादी सरकार भी युवाओं को स्वस्थ रखने का मौका दे रही है। आइए अब हम कुछ और लोगों की राय लेते हैं लेकिन लौटते हैं एक छोटे से ब्रेक के बाद.. कहीं जाइएगा मत!
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ ( सीन तीन-) पीछे से दो चार छोटे छोटे बच्चे रजमतिया जी की टी शर्ट पकड़ लेते हैं।
रजमतिया - ओह! व्हाट् आर यू डूईंग चिल्ड्रेन्स?
बच्चे - तनीं एगो परचवा दऽ।
रजमतिया - अरे भाई हम चुनाव परचार में नहीं आए हैं हम टीवी चैनल वाले लोग हैं।
तभी बगल में एक औरत आकर कहती है - अच्छा तो तुम टीवी वाली हो। ई बताओ पहिले कि 'काला टीका' सीरियलवा में 'युग' का बियाह दुसरकी लइकिया से कांहे करवा दिए तुम लोग?
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लास्ट सीन - माइक नीचे गिरा हुआ है। राजमती जी मूर्छासन की मुद्रा में लेटी हैं और कतवारु जी धनुषासन की मुद्रा में योगा डे सेलिब्रेट कर रहे हैं।

असित कुमार मिश्र
बलिया