Wednesday, April 21, 2021

सब मोदिया की चाल है....

सब मोदिया की चाल है....

कोरोना-काल की तमामतर ख़बरों के बीच जहाँ हर तीसरी पोस्ट पर दर्ज़ है - 'फलाने लेखक अब हमारे बीच नहीं रहे' अथवा 'वीर रस के प्रख्यात कवि गुरदेल सिंह "तोप" की दूसरी पत्नी का कोरोना से बयासी साल में निधन'।
इन्हीं विकट परिस्थितियों में कोई 'पाॅजिटिव - न्यूज़' मिलती है तो मन करता है कि - "उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पै" देख ही लें, कहाँ क्या अच्छा हुआ है!
पिछले हफ़्ते की बात है। हमारे कालेज को उप जिला मजिस्ट्रेट श्री अभय कुमार सिंह के द्वारा अस्थायी आश्रय स्थल बनाया गया था।इसी विषय को लेकर प्राचार्य-कक्ष में हम सभी की मीटिंग चल रही थी।
साथी अध्यापक प्रवीण कुमार चौबे छोटी-मोटी समस्याओं से सदैव जूझते रहते हैं। मैंने बहुत बार कहा भी कि विवाह कर लीजिए। इन जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी।
चौबे जी उस समय सर्दी - ज़ुकाम से पीड़ित थे। हालांकि सर्दी - ज़ुकाम, बुखार- बदन में दर्द और कमज़ोरी जैसे बहाने हम मास्टरों के आगे हर दूसरा बच्चा बनाता ही है, इसलिए ना तो हम इसे सीरियसली लेते हैं और ना ही लेंगे।
अचानक चौबे जी ने कहा - "सर! बैठा नहीं जा रहा है। लाइब्रेरी में जाकर लेटता हूँ"।
               थोड़ी देर बाद सहायिका सुनीता जी ने आकर बताया - "चौबे जी तो लगता है कि दुनिया से चले गए" !
सहसा विश्वास नहीं हुआ। चौबे जी जिम्मेदार अध्यापक हैं। उन्हें कालेज का नियम पता है कि दस से तीन आप कालेज से कहीं नहीं जा सकते। मैंने जाकर देखा।उनके गिरते हुए स्वास्थ्य को देख कर उन्हें कालेज से छुट्टी दी गई। और कोरोना की जाँच कराने के लिए भी कहा गया।
लोग कहते हैं कि मित्रता बचपन में ही होती है बड़े होने पर तो सम्बन्ध बनते हैं। चौबे जी के साथ कबसे हूँ यह ठीक - ठीक याद भी नहीं। पिछली बार जब नेट का रिजल्ट आया था तब मैंने पूछा था - क्या रहा रिजल्ट?
उनका जवाब था - नेगेटिव।
एल. टी. का रिजल्ट आया था तब भी मैंने पूछा था।
उनका जवाब वही - नेगेटिव।
उसी दिन रात को लगभग साढ़े नौ बजे मैंने व्हाट्स-ऐप पर चौबे जी से पूछा था - क्या रही रिपोर्ट?
चौबे जी ने जो जवाब दिया उससे आँखें भर आईं। मित्र का कोई भी रिजल्ट पाॅजिटिव आए इससे अच्छी बात क्या हो सकती है!मैंने तुरंत उन्हें शुभकामनाएँ दीं ....।
                        संभव है मेरा यह लेख हास्पीटल की बेड पर पड़े हुए मेरे कोरोना - पाॅजिटिव दोस्त या उनके परिजन पढ़ रहे होंगे। संभावना है कि होम - आइसोलेशन की कैद काट रहे जिन आँखों तक यह लेख जाएगा उन्होंने फेसबुक पर लाशें और जलती हुई चिताओं वाले अनगिनत पोस्ट्स पहले ही देख लिए होंगे। जिन्हें साँस लेने में दिक्कत हो रही होगी उन्हें  लग रहा होगा वो बहुत सीरियस हैं और चौबे जी को थोड़ी - बहुत समस्या रही होगी!
जिन्हें खाने का स्वाद नहीं मिल रहा होगा और जो बुखार की आग में जल रहे होंगे वो मन ही मन कह रहे होंगे कि अच्छा बेटा जी! जब तुम्हारा रिजल्ट आएगा न पाॅजिटिव तब पूछेंगे!
                   आज लगभग दस दिनों बाद चौबे जी के पचहत्तर प्रतिशत रिकवर कर लेने पर आपसे बता रहा हूँ कि वो आपसे कहीं ज्यादा सीरियस थे। फिर भी उन्हें न वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ी ना हास्पिटलाइज्ड होने की। हाँ! जो दवाएँ सामान्य रूप से दी जा रहीं हैं उनके साथ-साथ आत्मबल की जरूरत थी जिसके लिए हम - आप जैसे लोग हैं।
दस प्रतिशत विशेष मरीजों को छोड़ कर आज कोरोना - पाॅजिटिव व्यक्ति को ज्यादा से ज्यादा आत्मबल और हमारे-आपके सहयोग की आवश्यकता है न कि हास्पिटलाइज्ड करने की।
बगल के गाँव के एक परभुनाथ चचा हैं उनमें भी सारे लक्षण वही थे लेकिन प्रचंड मोदी विरोधी होने के कारण न तो उन्होंने सीरियसली लिया और न ही कहीं हास्पिटलाइज्ड ही हुए।
बल्कि जिनकी रिपोर्ट पाॅजिटिव आई है उन्हें वो समझाते भी हैं - "देख लो! सर्दी - जुकाम पहले नहीं होता था! अरे! ई सब मोदिया की चाल है। एक दिन अडानी - अम्बानी को बेच देगा सब कुछ देख लेना "।
और कमाल यह कि जो अंतिम साँसे गिन रहे थे, जिनके "गऊ - दान" की तैयारी चल रही थी वो खड़े होकर कहते हैं - "भइया! ठीके कहे हैं आप। पी. एम. केयर फंड का पइसवा सब खाइये न गया ई लोग"।  
               मैंने बस मनोचिकित्सक का नाम सुना है आज तक , देखा नहीं है। जरुर वो लोग भी परभुनाथ चचा की तरह ही होते होंगे।
इसलिए पैनिक नहीं होना है, घबराना नहीं है। मैंने खुद कल एक लड़के के मौसा जी को हास्पिटलाइज्ड कराया था आज पता चला कि उन्हें बस फ्लू है।
इसी तरह देश के विभिन्न क्षेत्रों से सूचना मिल रही है कि ज्यादातर दवाएँ और जगह अनावश्यक लोगों ने घेर रखीं हैं।
आपकी सूचना के लिए बताना जरुरी है कि फेसबुक पर भी हिंदू - मुस्लिम, भाजपाई - कांग्रेसी, आपियों- बहुरूपियों की संख्या नब्बे प्रतिशत है ; आदमियों की संख्या भी दस प्रतिशत ही है जो कोरोना योद्धा के रूप में सबके लिए इलाज और आक्सीजन तथा दवाएँ उपलब्ध कराने में लगे हुए हैं।
उन्हें ग़लत सूचनाएँ न दीजिए।दस प्रतिशत उन विशेष मरीजों के लिए चिकित्सा - उपचार उपलब्ध कराने दीजिए जिन्हें वास्तव में उसकी जरूरत है।
वैसे भी ना जाने कितनी बड़ी आबादी को कोरोना हुआ और ठीक भी हो गया उन्हें पता तक नहीं चला।जिन्हें हो गया है उन्हें डराइए मत। उनका आत्मविश्वास बढ़ाइए। उनसे भले ही कहिए कि - सब मोदिया की चाल है।
मैं जानता हूँ कि आप जिस फलाने कवि के मरने की बातें फेसबुक पर कर रहे हैं, उनके पहले काव्य - संग्रह का नाम नहीं पता है आपको।
मैं समझ सकता हूँ कि वीर रस के अप्रतिम कवि गुरदेल सिंह "तोप" को उनकी दूसरी पत्नी ने बयासी साल कैसे झेला होगा! इसलिए जो बचे हुए हैं उनकी चिंता कीजिए। आपकी सूचना से किसी पर ग़लत असर न पड़े ध्यान दीजिये।
बहुत बड़ा नहीं लिखना है।
बस आखिरी बात बता दूँ कि अपनी रिपोर्ट नहीं दे रहा हूँ, उसकी आवश्यकता भी नहीं...!

असित कुमार मिश्र
बलिया

                      
                       

        

Friday, April 2, 2021

इन आँखों की मस्ती के....

इन आँखों की मस्ती के....

याद करने की तमामतर कोशिशों के बावज़ूद भी यह याद नहीं कि, इस फ़िल्मी गाने को कब सुना था। शायद तभी जब मैंने आँखें चार होना, आँखे लड़ना, आँखों का तारा होना या फिर आँखों में बसना जैसे मुहावरों को समझा होगा।
लेकिन इन मुहावरों की तह तक जाने से पहले ही किस्मत ने बी. ए. फ़र्स्ट ईयर को पढ़ाने के लिए हाथों में 'बिहारी सतसई' पकड़ा दी।अब 'आँखों में उतरने' की उमर में हम 'आँखों में खटकने' लगे।
कमाल देखिए! कि इन आँखों की मस्ती ने यहाँ भी पीछा नहीं छोड़ा। बिहारी तो जैसे हँस के कहने लगे -

अनियारे दीरघ दृगनु कितीं न तरुनि समान।
वह चितबनि औरे कछू जिहिं बस होत सुजान।।

अर्थात नुकीली, कोणदार और बड़ी-बड़ी आँखें भला किन युवतियों में समान नहीं होतीं! तात्पर्य यह कि बहुत-सी युवतियों की आँखें बड़ी-बड़ी और नुकीली होती हैं। किन्तु वह रसीली नज़र किसी किसी में ही होती है जिसके वशीभूत रसिक, गुणी या सुजान होते हैं।
सच में वह अदा किसी-किसी उमराव में होती है जिसकी आँखों में मस्ती होती है। जिसमें मस्त हो जाने का मन करता है। वैसी आँखों से सामना होते ही शिद्दत से साहेब कबीर याद आते हैं -
नैनां अन्तर आव तू, ज्यूं हौं नैन झपेऊ।
ना हौं देखन और कूं, ना तुझ देखन देउ।।

लेकिन जीवन के इतने बसंत 'आँखों - आँखों में' काट लेने के बाद यही कहूँगा कि मुद्दई को भी मुदरिर्सी का काम ना मिले।
कमबख़्त अपने ही पढ़ाए पर अपने अमल कर लिया जाए तो तालीमेआला 'आँखें लाल-लाल करके' नौकरी से मुअत्तली का परवाना काट देगा।

                     पहली बार उमराव जान और इन आँखों की अदा से मुलाकात हुई थी पिछले साल मऊ जिले के डी. सी. एस. के. (पी. जी.) काॅलेज़ में लगे पुस्तक मेले में। मैंने किताब को हाथ में उठाकर देखा था । सूरत कुछ - कुछ जानी-पहचानी लगी। थोड़ा सा गौर से देख कर याद करने की कोशिश में ही था तब तक काॅलेज़ के प्राचार्य डॉ ए के मिश्र मेले का मुआइना करने आ गए।
मैंने जल्दी से किताब रख दी। सोचा कहीं ये सवाल न हो जाए कि - "यही सब" 'फ़िल्मी कलियाँ' खरीदने आए हो" ... ।
लेकिन या तो उन्होंने किताब के साथ देखा नहीं या फिर उस किताब के चरित्रवान होने का भरोसा होगा उन्हें। मेरे चरित्र पर तो खैर...!
हाँ! जाते-जाते उन्होंने लगभग सभी स्टाॅल पर इतना ज़रूर कह दिया कि - "यह जो भी किताबें माँगे इसे दे दीं जाएं और बिल मेरे आफ़िस में भेज दिया जाए"।
उनके जाते ही दुबारा वही किताब उठाई तो विक्रेता महोदय ने आँखों-आँखों में तौलते हुए पूछा - पढ़ते हो?
मैंने आँखें चुराते हुए कहा - नहीं। लिखता हूँ।
-तो इसे ले जाओ पढ़ना और कुछ लिखना।
-अब इतना भी बड़ा लेखक नहीं हूँ। कवर - पेज़ अच्छा लगा तो देख रहा था।
-" तो कवर - पेज़ पर ही लिख देना"।
अब मैंने गौर से देखा उस बुज़ुर्गवार की आँखों में - जिसमें मस्ती की रेखा कहीं गहरे धँसी हुई थी।
मैंने किताब सामने करके पूछा था - चचा इन आँखों से इश्क़ है क्या!
- नहीं इसकी 'अदा' से... ।
अदब का तकाज़ा था कि बात वहीं ख़त्म होती लेकिन मैंने किताब थैले में रखते हुए माज़रत से कहा - मोबाइल नंबर दे सकेंगे क्या!
फिर मेरे मोबाइल में जो नंबर दर्ज़ हुए उसके तआरुफ़ में लिखा गया - "चचा बनारसी" ।
                गुज़रे हुए साल की कमबख़्ती का आलम न पूछिए! न कुछ पढ़ना हो सका न लिखना। न ठीक से जीना ही हुआ ना कमीनी मौत ही आई।
इधर हफ़्ते भर पहले यही किताब उठाई थी जो किसी दराज़ में रखे-रखे अपने पढ़े जाने की हर उम्मीद से टूट गई थी।
कवर - पेज़ पर अभिनेत्री रेखा की तस्वीर को देखते ही ख़्याल आया कि गुज़िश्ता साल मंटो की किसी किताब के कवर - पेज़ पर अदाकार नवाज़ुद्दीन की फोटो छ्प गई थी। अदब के ठहरे हुए पानी में जैसे किसी ने पत्थर उछाल दिया हो!
ख़ैर! अदाकारी के तौर पर मुझे लगता है कि नवाज़ुद्दीन का सारा किया धरा एक तरफ़ और मंटो के नाम पर अपनी तस्वीर छ्प जाना एक तरफ़। अब इससे बड़ा ईनआम न मिल सकेगा उन्हें।
मैंने सुना है कि रामायण में भगवान श्री राम की अदाकारी करने वाले अरुण गोविल जब टीवी पर राम बन कर आते थे तो लाखों-लाख, सर - हाथ अदब और सज़दे में उठ जाते थे। उनको लोग राम के सिवा किसी भी अन्य रूप में नहीं देखना चाहते थे। राम का नाम और उनका रूप जैसे एक हो गया था। अब इससे भी बड़ा कोई ताज़ होता है क्या!
मैंने देखा है "नदिया के पार" फ़िल्म की अदाकारा साधना सिंह को जो इस फ़िल्म में 'गुंजा' की अदा में थीं। आज उस फ़िल्म के लगभग चालीस साल बाद साधना सिंह के नाम से फ़ेसबुक पर जो आफिसियल पेज़ बना है उस पर लिखा है - साधना सिंह (गुंजा).... ।
                     इसी तरह मिर्ज़ा हादी 'रूस्वा' ने फै़ज़ाबाद से भगाकर लखनऊ लाई गई अमीरन के उमराव जान बनने की कहानी लिखी तो उस पर फ़िल्म बनाने के लिए सामने आए मुज़फ़्फ़र अली।
और अपनी अदा से उमराव जान को अमर कर देनी वाली अदाकारा थीं - रेखा। जिनकी आँखें उमराव जान 'अदा' की अदा में सदा के लिए गिरवी रखी जा चुकीं हैं...। तो ये तो रही अदाकारी की बातें।
अब भगवान राम को , मंटो को, गुंजा को या फिर उमराव जान को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि किस चेहरे को उनके नाम से जाना जा रहा है।
                    अदब - रिसाले और अफ़साने से हट कर भी कहूँ तो आपको नवाज़ुद्दीन में ही क्यों, हर सूरत-ओ-आम में मंटो क्यों नहीं दिखाई देता?
गाँव की हर सीधी-सादी नवयौवना में आपको गुंजा क्यों नहीं दिखाई देती?
चंद रंगीन काग़ज़ी टुकड़ों पर थिरकने के लिए मज़बूर वह हर चेहरा आपको उमराव का क्यों नहीं दिखता? अरुण गोविल में भगवान राम का अक्स देखने वालों को हर चेहरे में राम क्यों नहीं दिखता!
सिरहाने रखी मानस को उठाऊँ तो वहाँ बाबा ना जाने कबसे यही समझा रहे हैं -
         "सियाराम मय सब जग जानीं। करहूं प्रनाम जोरि जुग पानी" ।।
बाबा को पूरा संसार ही सियाराम का चेहरा नज़र आता है और वो सबको प्रणाम करते नहीं अघाते... और हम यहाँ इस बात पर लड़ रहे हैं कि फलां किताब पर फलां का चेहरा क्यों!
                       कम लोगों को पता होगा कि उमराव जान 'अदा' के नाम से शाइरी भी करतीं थीं। उनका एक शे'र है -
किसको सुनाएँ हाले - दिलेज़ार ऐ 'अदा' ।
आवारगी में हमने ज़माने की सैर की।।
                        मिर्ज़ा हादी "रुस्वा " तब लखनऊ में रहते थे। यार - दोस्तों की आमद होती थी शे'र पर शेरों की चढ़ाई होती थी। बदकिस्मती से जिस ओर झरोखा खुलता था उधर उमराव जान रहतीं थीं।
चूँकि मिर्ज़ा साहब मकबूल शाइर थे और उनकी लिखीं ग़ज़लें हर रंगीन पर्दों के पीछे उजालों में गाई जातीं थीं।
तो जिस दिन दोनों का साबिका हुआ उस दिन उमराव ने पहली बात कही - अल्लाह! मिर्ज़ा साहब, आप तो हमें भूल ही गए।
मुझे जाने क्यूँ ऐसा लगता है जैसे उमराव जान 'अदा' ने कहा होगा - अल्लाह! ज़माने भर में रुस्वाई मुझे मिली और तख़ल्लुस आपका - "रुस्वा"।
                           अचानक उमराव जान 'अदा' से चचा 'बनारसी' की याद आ गई। उन्होंने कहा था कि उन्हें 'अदा' से इश्क़ था।
अब समझ में आई बात। वो इस कवर पेज़ वाली रेखा के नहीं इसके भीतर की 'अदा' से इश्क़ करते हैं।
किताब हो या ज़िस्म! बेचने और खरीदने वाले के बीच कोई रिश्ता नहीं होता।लेकिन मैंने लगभग दो साल बाद उनकी माशूका के बारे में पता लगा लिया है तो बातचीत ज़रुरी थी।
                         मैंने सुबह फोन मिलाया था। चचा से बात न हो पाई। बस इतना पता चला है कि बनारस की प्रसिद्ध कब्रिस्तान "फातिमान" की मिट्टी में कहीं सोए हुए हैं।
हाँ! इधर पता चला है कि उमराव जान 'अदा' ने हज़ से लौटने के बाद बनारस में ही आखिरी साँस ली थी और उनके कब्र का पता भी ठीक यही है.... ।

असित कुमार मिश्र
बलिया

Tuesday, September 22, 2020

आवेदन पत्र दो

सेवा में ;
अधिशासी अभियंता
विद्युत वितरण प्रखंड, बलिया।
विषय -बिजली कनेक्शन काटने के उपरांत मृतक व्यक्ति के नाम से बिजली बिल जारी होने के संदर्भ में।
महोदय, स्व. जगदीश मिश्र ने दिनांक 06.04.1973 को दस हार्सपावर का निजी नलकूप कनेक्शन लिया था। तब मीटर अनुपलब्ध रहने और विलंब होने की दशा में कनेक्शन का प्रकार  D/C था।
उपभोक्ता जगदीश मिश्र के पुत्रगणों (स्व. ब्रजराज स्व. विजयशंकर स्व. शिवशंकर स्व. दयाशंकर) के द्वारा दिनांक 19.02.1976 को दिए अपने प्रार्थना पत्र के बिंदु तीन से स्पष्ट है कि इस दिनांक तक उपभोक्ता जगदीश मिश्र के जिवित न रहने की दशा में अभिलेखों में संशोधन कर वारिसों के नाम पर कनेक्शन किया गया था। (तत्कालीन आवेदन पत्र की रिसिविंग की छाया प्रति संलग्न है)
               इसके बाद 12.04.1990 तक यह कनेक्शन दयाशंकर मिश्र के नाम से था। उसी समय आटाचक्की हटाने और बिजली कनेक्शन काटने का आवेदन दिया गया। जिसके अनुसार तत्कालीन अधिशासी अभियंता द्वारा मौका निरीक्षण करके आटा चक्की हटा दिया गया था और बिजली कनेक्शन काट दिया गया था। विभाग द्वारा बिजली के खंभे, तार इत्यादि हटा लिए गए थे। और समस्त बिल रुपये 800 सौ रुपये था जिसे जमा भी कर दिया गया था। (जिसकी जमा रसीद और निरीक्षण की रिपोर्ट की छाया प्रति संलग्न है)
अधिशासी अभियंता डिवीजन प्रथम महोदय से रिसीविंग भी प्राप्त हो गई थी जिसमें इस बात का उल्लेख है कि - "समस्त कार्यवाही पूरी कर ली गयी है अब कोई भी बकाया राशि शेष नहीं है"।
                        अब लगभग तीस वर्ष के बाद 19. 09.2020 को अचानक बिजली विभाग, सिकन्दरपुर के कुछ कर्मचारी आए और बकायेदारों की सूची में दयाशंकर मिश्र का नाम दिखाया जिसमें बकाया धनराशि 1035354 (दस लाख पैंतीस हजार तीन सौ चौवन रुपये) है। जिससे प्रार्थी को अपार मानसिक और सामाजिक पीड़ा हुई है।
                   महोदय इस संबंध में निवेदन है कि जो कनेक्शन 1990 में ही समाप्त हो चुका है, अब न वहाँ कोई बिजली का खंभा है, न तार, यहाँ तक कि ट्यूबवेल भी खण्डहर की हालत में है। ऐसी स्थिति में बिल आना अत्यंत पीड़ा दायक है।
                अत: श्री मान से निवेदन है कि इस बकाया धनराशि को निरस्त करते हुए बकायेदारों की सूची से स्व. दयाशंकर मिश्र का नाम हटाने की कृपा करें।
प्रार्थी -
असित कुमार मिश्र
कृते- स्व. दयाशंकर मिश्र
ग्राम - मिश्रचक
पत्रालय - सिकन्दरपुर
जनपद-बलिया (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल - 7897176716

Monday, September 21, 2020

आवेदन पत्र

सेवा में ;
अधिशासी अभियंता
विद्युत वितरण प्रखंड सिकन्दरपुर बलिया
विषय - मृतक व्यक्ति के नाम से बिजली बिल प्राप्त होने के संदर्भ में।
महोदय, हमने दिनांक 06.04.सन् 1973 को दस हार्सपावर का निजी नलकूप कनेक्शन लिया था। तब मीटर अनुपलब्ध रहने और विलंब होने की दशा में कनेक्शन का प्रकार  D/C था। यह कनेक्शन जगदीश मिश्र के नाम से था।
उपभोक्ता जगदीश मिश्र के पुत्रगणों (स्व. ब्रजराज स्व. विजयशंकर स्व. शिवशंकर स्व. दयाशंकर) के द्वारा दिनांक 19.02.1976 को दिए अपने प्रार्थना पत्र के बिंदु तीन से स्पष्ट है कि इस दिनांक तक उपभोक्ता जगदीश मिश्र के जिवित न रहने की दशा में अभिलेखों में संसोधन कर वारिसों के नाम पर कनेक्शन किया गया था। (तत्कालीन आवेदन पत्र की रिसिविंग की छाया प्रति संलग्न है)
               इसके बाद 12.04.1990 को जब यह कनेक्शन दयाशंकर मिश्र के नाम से था तब तत्कालीन अधिशासी अभियंता के द्वारा मौका निरीक्षण करके आटा चक्की हटा दिया गया और समस्त बिल रुपये 800 सौ (आठ सौ) जमा कर दिया गया था। (जिसकी जमा रसीद और निरीक्षण की रिपोर्ट की छाया प्रति संलग्न है)
           तत्पश्चात एग्जिक्यूटिव इंजीनियर इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन डिवीजन प्रथम के कार्यालय से दिनांक 18.05.1990 को एक आफिस मेमोरेण्डम निकाला गया जिसमें स्पष्ट उल्लेख किया गया कि दिनांक 16.04.1990 के बाद दयाशंकर मिश्र के नाम कोई भी बकाया राशि शेष नहीं है।
इसके बाद बिजली कनेक्शन काट दिया गया था और सन 1991-92 में बिजली के खंभे, तार इत्यादि विभाग द्वारा हटा लिए गए थे।
                        इस घटना को बीते आज लगभग तीस वर्ष हो गए हैं। तब के द्वितीय उपभोक्ता दयाशंकर मिश्र को मरे भी दस वर्ष से अधिक हो गए।
लेकिन दिनांक 19 सितम्बर 2020 को अचानक बिजली विभाग सिकन्दरपुर के कुछ कर्मचारी आए और बकायेदारों की सूची में दयाशंकर मिश्र का नाम दिखाया जिसमें बकाया धनराशि 1035354 (दस लाख पैंतीस हजार तीन सौ चौवन रुपये) है।जिससे हम प्रार्थी को अपार मानसिक कष्ट हुआ है।
                   महोदय इस संबंध में निवेदन है कि विभाग द्वारा मौका मुआयना कराया जाए तथा कुछ ग्रामीणों से बातचीत की जाए जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि वो ट्यूबवेल अब खंडहर की हालत में है, वहाँ वर्षों से न कोई बिजली खंभा है, न कोई तार, न मोटर, न आटाचक्की यहाँ तक कि एक बल्ब और होल्डर तक नहीं है।
                अत: श्री मान से निवेदन है कि सन् 1973 से 1990 तक की समस्त पत्रावलियों की विवेचना कर ली जाए और लेजर बुक की त्रुटियों का निराकरण करते हुए सैंतालिस वर्ष पूर्व का कनेक्शन बंद कर दिया जाए।
                उपरोक्त संदर्भ में यह भी निवेदन है कि 1973 से लेकर 1990 तक के समस्त बिल उसकी जमा रसीद तथा विभाग और उपभोक्ता के बीच हुए समस्त पत्राचार की रिसिविंग उपलब्ध है। आपके कार्यालय से जब भी आदेश मिलेगा तो मय साक्ष्यों के साथ उपस्थित हो जाऊँगा।
भवदीय -
असित कुमार मिश्र
कृते- स्व. दयाशंकर मिश्र
ग्राम - मिश्रचक
पत्रालय - सिकन्दरपुर
जनपद-बलिया (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल - 7897176716

Wednesday, September 9, 2020

जब तक सिनेमा है

जब तक सिनेमा है तब तक लोग....

विजया जी!
रिया - सुशांत - कंगना जैसे लोगों पर कुछ बातचीत हो रही थी हमारी - आपकी, जब आपने फोन काटा था। तबसे मैं सोच रहा हूँ कि मेरे और आपके बीच ये अंतर कैसे आया!
मैंने कुछ सवाल पूछे थे आपसे जो अब भी सवाल ही हैं।
सुशांत जी बिहार के किस गाँव से थे? पता है आपको!
मल्लडीहा गाँव के कितने लोग बी. एड्. , एम. एड. , नेट, पी. एचडी. करके बेरोज़गार बैठे हैं और रोज़ मर रहे हैं पता है आपको!
सुशांत जी के मरने के बाद न्यूज़ चैनल्स ने जितना समय रिया पर लगाया उसके एक बटा करोड़वें सेकेंड भी यह सोचने में नहीं लगाया कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की लिखित परीक्षा में कानपुर की विदुषी रश्मि जी का सेलेक्शन 121 सवाल सही करने पर भी क्यों नहीं हुआ जबकि वो एक करोड़ रुपये देकर आए किसी भी साक्षात्कारकर्ताओं से ज़्यादा जानतीं हैं!
              आप इस चिंता में परेशान हैं कि फिल्म उद्योग में कौन - कौन कोकीन का सेवन करता है?
लेकिन आप इस बात पर परेशान नहीं हैं कि किसी भी स्ववित्तपोषित काॅलेज़ेज़ में आठ हजार से लेकर बारह हजार तक के नेट पीएचडी टीचर्स होते हैं और उतनी कीमत में एक ग्राम कोकीन मिलती है।
हमारी कीमत एक ग्राम कोकीन ही है विजया जी! हमारी विद्वत्ता, हमारे विदेशों में छपे लेख-कहानियों, आकाशवाणियों पर प्रसारित चर्चाओं की कीमत उनके एक ग्राम में है... कब समझेंगी आप!
आप चौंक जाएंगी यह जानकर कि उत्तर प्रदेश में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की भर्ती आज तीन साल से बस 'क्षैतिज आरक्षण' के कारण फँसी हुई है। अब आपको यह जानकर हँसी आएगी कि प्रतिशत निकाल लेने वाला कोई भी मास्टर यह क्षैतिज आरक्षण सेट कर देगा उसके लिए किसी सचिव वंदना त्रिपाठी की जरुरत ही नहीं!
सुशांत जी के मरने पर एक घर में अँधेरा छा गया, मानता हूँ। पर आपको नहीं पता कि इलाहाबाद और दिल्ली के लाखों छात्रों ने ही नहीं बल्कि बलिया के किसी असित कुमार मिश्र ने भी आज नौ तारीख को नौ मिनट के लिए लाइट बंद कर अँधेरा किया था।ताकि वो अपने मन की बात उस वक्ता को सुना सके जिसे जीभ देते समय भगवान भूल गया कि दो कान भी देने हैं! यह सुश्री कंगना जी से भी ज़्यादा हिम्मत का काम है!
नहीं पता है आपको कि आलू बलिया में चालीस रुपये किलो मिल रहा है! और नहीं पता है आपको कि कोरोना काल में कितनों के रोज़गार छिन गए या फिर देश की अर्थव्यवस्था कितने साल पीछे चली गई।
                 नहीं पता है आपको कि 2007 में आपकी तरह ही एक गणित की शिक्षिका थीं जिसके बारे में उस समय के एक गिद्ध सुधीर चौधरी ने स्टिंग ऑपरेशन करके बताया था कि वो लड़कियों को देह व्यापार के लिए मजबूर करती है।
फिर क्या था! हम - आप जैसी आम जनता ने उस औरत को सड़क पर घसीट लिया वो औरत नंगी हो गई हम धृतराष्ट्रों की सभा में। उसका ब्याउज़ तक फाड़ दिया गया।
बाद में वो औरत बे-गुनाह निकली। सब कुछ स्क्रिप्टेड निकला और सुधीर चौधरी ने माफ़ी माँग ली!
उस औरत का नाम नहीं पता है आपको लेकिन कंगना के हक के लिए फोन काट दिया आपने!
वो औरत भी किसी के लिए कंगना ही थी विजया जी! जो आज कहाँ और किस हाल में होगी किसी को नहीं पता। लेकिन  गिद्धों की सभा में आज भी कोई सुधीर चौधरी जरूर होगा! पता कर लीजियेगा।
किसी कंगना का करोड़ों का बंगला टूट गया वह पता है आपको! लेकिन सुशांत जी के मल्लडीहा में रजेसवा ने अपनी माँ का एक कंगन इसलिये गिरवी रखा था कि वो उस रेलवे ग्रुप डी का फार्म भर सके जिसकी परीक्षा अब तक नहीं हुई!
किस कंगना की चिंता करनी चाहिए थी और किस कंगना की चिंता कर रही हैं आप!
अपने जिले की कोरोना अपडेट पूछ दूँ तो बिना नवीन चंद्रकला भइया की पोस्ट देखे बता नहीं पाएँगी आप! लेकिन मुम्बई में बीएमसी क्या कर रही है वो पल - पल की खबर है आपको। खैर छोड़िए यह सब बातें!
                      याद है! विवाह के समय आपके पक्ष के पंडितों  ने जितने वचन उच्चरित किए थे उनमें सहमति के साथ एक शुद्ध उच्चारण मेरा भी था।
लेकिन वर पक्ष से कोई भी वचन नहीं लिया गया था। आज पहला वचन ले रहा हूँ फेसबुक के सैकड़ों पंडितों के समक्ष.... मेरी ही तरह टी. वी. नहीं देखेंगी आज के बाद।
ताकि सही मुद्दों की सही पहचान सही आँखें कर सकें.... ।
और ये आप पर छोड़ता हूँ पता कीजिएगा कि रामाधीर सिंह ने सिनेमा के बारे में क्या कहा था.... ।

असित कुमार मिश्र
बलिया