Tuesday, April 7, 2020

आवेदन पत्र

सेवा में ;
लोक सूचना अधिकारी
विकास खण्ड - नवानगर
जनपद-बलिया
उत्तर प्रदेश
विषय - सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन
महोदय,
मैं प्रार्थी असित कुमार मिश्र ग्राम पंचायत चक भड़िकरा का निवासी तथा भारत का नागरिक हूँ।
1- चकभड़िकरा ग्राम पंचायत के संबंध में निम्नलिखित विवरण प्रदान करें :-
वित्तीय वर्ष 2018-19और 2019-20 में ग्राम पंचायत चकभड़िकरा को किन - किन मदों /योजनाओं के तहत कितनी राशि आवंटित की गयी?
आवंटन का वर्षवार ब्यौरा दें।
2- उपरोक्त ग्राम पंचायत द्वारा इस दौरान कराए गए सभी कार्यों से संबंधित निम्नलिखित विवरण दें :-
क- कार्य का नाम /संक्षिप्त विवरण
ख- कार्य के लिए स्वीकृत राशि
ग- कार्य समाप्त होने की तिथि अथवा चालू कार्य की स्थिति
घ - चालू कार्य पर भुगतान हो चुकी धनराशि
च- कार्य कराने वाली एजेंसी का नाम
छ- कार्य के रेखाचित्र की प्रमाणित प्रति
ज- कार्य कराने का निर्णय कब और किस आधार पर लिया गया? इससे संबंधित दस्तावेजों की प्रति भी उपलब्ध कराएं।
झ- उन अधिकारियों /कर्मचारियों का नाम व पद बताएं जिन्होंने कार्य का निरीक्षण किया और भुगतान की स्वीकृति दी।
ञ - कार्य के वर्क आर्डर /रजिस्टर एवं लेबर रजिस्टर /मस्टर रोल की प्रति उपलब्ध कराएं।
             प्रार्थी आवेदन शुल्क के रूप में 10 रुपये का नोट संलग्न कर रहा है जिसका क्रमांक है।
यदि माँगी गई सूचना आपके विभाग /कार्यालय से संबंधित नहीं है तो सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6(3)का संज्ञान लेते हुए मेरा आवेदन संबंधित लोक सूचना अधिकारी को पाँच दिनों की समयावधि के अंतर्गत हस्तानान्तरित करें।
साथ ही अधिनियम के प्रावधानों के तहत सूचना उपलब्ध कराते समय प्रथम अपील अधिकारी का नाम व पद अवश्य बताएं।
संलग्नक -
दस रुपये का नोट         भवदीय -
स्थान -
दिनांक

Wednesday, January 22, 2020

पोस्ट

तकनीकी से थोड़ा दूर रहना....

आजकल गाँव गाँधी आश्रम के उजरके कंबल जैसी धुंध में दिन भर लिपटा रहता है। इस धुंध में कब सुबह हो जाती है और कब साँझ, किसी को कुछ पता ही नहीं चलता। उधर खेतों में गेहूँ के मनढीठ पौधे सुबह की शीत का भार अपने कपार पर लिए दिन भर काँपते रहते हैं इधर सर से लेकर पाँव तक कपड़ों के भार से दबे रहने पर भी शरीर काँपता रहता है।
पिछले दिनों की धुआंधार बारिश से तो गाँव बच गया लेकिन लगता है यह ठंड जान लेकर ही छोड़ेगी।
धूप की स्थिति यह है कि तीन - चार दिन पर सूरज अचानक धुंध के बीच किसी कोने से सरकारी कर्मचारी की तरह निकलता है और आसमान के रजिस्टर पर साइन बना कर ओझल हो जाता है। दिन भर ओसारे में जलते अलाव को घेर कर बैठा हुआ गाँव अपने आप में भी धीरे-धीरे सुलगता रहता है - सैकड़ों बातों की गर्मी में... हज़ारों वादों की गर्मी में और लाखों उम्मीदों की गर्मी में।
परभुनाथ चचा सामने बैठे पूरन सिंघ से पूछ बैठते हैं -अच्छा! दिन तो बीत गया होगा न?
पूरन सिंघ "अबकी बार चार सौ पार" नामक व्हाट्स-ऐप ग्रुप के एडमिन हैं। मैसेज़ के अक्षरों पर कत्थक करती उनकी उंगलियाँ जैसे ठहर सी जातीं हैं - का बोले हैं! "अच्छा दिन" बीत गया? कान खोलकर सुन लीजिए! दुई हजार पचास तक आपके अखिलेश बाबू नहीं आने वाले...।
मन मसोस कर रह गए परभुनाथ चचा। बड़ी उम्मीद से तीन साल पहले एक फेसबुक ग्रुप बनाया था - "युवा देश युवा अखिलेश"।
लेकिन दो साल बीतते - बीतते वह ग्रुप समाज से सिमट कर परिवार तक ही रह गया। अब वहाँ सिर्फ परभुनाथ चचा पोस्ट करते हैं और अपनी ही चारों आईडी से लाइक करके दिल को समझा लेते हैं कि एक न एक दिन देश में समाजवाद जरुर आएगा।
कपार पर हाथ रखकर बोले परभुनाथ चचा - मरदे! हम राजनीतिक बात नहीं किए! हम तो बस पूछ रहे थे कि दिन अभी केतना बचा है?
तभी ओसारे के भीतर का दरवाज़ा खोल कर चाची एक हाथ में संझवत का दिया और दूसरे हाथ से घंटी टुनटुनाते हुए निकलीं। मुँह से हमेशा की तरह श्लोक ही झर रहे थे - "अपने तो न कोई काम है न धाम। आ ऊपर से एगो आ गया है मुँहझौंसा मोबाइल! दिन-रात बस टिप - टिप, टिप-टिप... " ।
              चाची तुलसीचौरे पर दिया रखकर चलीं गईं। दिए की हिलती - डुलती लौ को देखते हुए रजेसवा ने कहा - परभुनाथ चचा! मटर नहीं बोवाया है का हो!
परभुनाथ चचा थोड़ा तन गए और बोले - उन्नीस सौ सत्तर के बाद कोई ऐसा साल नहीं बीता जिस साल कियार के खेत से तीन कुंतल मटर न निकला हो!
तभी अलाव के धुएँ से 'सेक्युलर हिंदुओं' की तरह आँखें बंद किए रजेसवा बोल पड़ा - का फायदा ऊ तीन कुंतल मटर होने से जब ओसारे में बैठे दु - चार आदमी को देखने तक को न मिले।
अपनी ही बातों में फंसे परभुनाथ चचा बेमन से उठे और अंगना में चाची के पास जाकर खड़े हो गए। लेकिन साफ़ साफ़ कहने की हिम्मत नहीं हुई। इसलिए बात को दूसरे तरह से कहा - सरसों का तेल घर में होगा कि नहीं?
चाची ने कहा - हाँ, है।
आ हरियर मरिचा भी होगा न?
चाची ने अबकी आँखें दिखा कर कहा - हूँ ऽऽ।
परभुनाथ चचा ने आखिरी चाल चलते हुए कहा - भूख जैसा लग रहा है दू अंजुरी मटर भून दीजिए न!
चाची ने उनके चाल की काट करते हुए पूछा - लगी है भूख? ई कांहे नहीं कह रहे हैं कि ओसारे में जमे डीह - देवता लोगों को खिलाना है!
परभुनाथ चचा ने नरमी से समझाया - देवनथवा की माँ! समाजवाद यही कहता है कि सबको खिला कर आप खाइए! अपना पेट तो जानवर भी भर लेता है...।
चाची ने दाँत पीसते हुए कहा - "ये अपना समाजवाद ओसारे में जाकर उन्हीं लोगों को समझाइए। पूरन सिंघ के छज्जे से कम से कम पचास गो लौकी तुराया होगा। कांहे नहीं एक लौकी लाकर दुआर पर पटक दिए! अवधेसवा की भैंस एतना दूध देती है आज तक जोरन भी नहीं निकला उसके तीनों दयादी से..." ।
परभुनाथ चचा ने हैरानी से चाची की ओर देखा और सोचा - आखिर कौ जीबी का मेमोरी है इसके दिमाग में कि पूरे गाँव की एक छोटी सी बात से लेकर किसके तरकारी में कितना नमक पड़ता है, सबका हिसाब रखे रहती है।
उधर ओसारे में अलाव पर दो - तीन लकड़ियाँ और रख दी गई थीं ताकि आग थोड़ी देर तक और रह सके।
                   मटर भूनने की महक भर आने की देर थी कि बगल से रामानंद चौधरी भी चले आए। सबने थोड़ा - थोड़ा सरक कर उनके लिए भी जगह बनाया। रामानंद को बैठे हुए थोड़ी देर हुई थी कि पूरन सिंघ बोल पड़े - कहीं कुछ जलने की महक आ रही है क्या?
रामानंद जी बड़े पर्यावरण संरक्षक के तौर पर सोशल मीडिया में उभरे हैं। फेसबुक पर बिना पौधे लगाने की पोस्ट किए नहाते - खाते नहीं हैं। उन्होंने फेसबुक ही खोला था। एक कमेंट को लाइक करते हुए उपदेशक की भांति कहा उन्होंने - तुम लोगों को अपने - अपने नेताओं से फ़ुरसत मिलेगी तब न जानोगे कि अमेजन के जंगल में आग लगी है और जंगल खतम होने की देर है साक्षात परलय होगा परलय...!
तभी रजेसवा ने झटके से उठ कर अलाव के कोने पर सुलगती उनकी चादर हटाते हुए कहा - मरदे! जंगल - वंगल नहीं आपके चादर का हई कोना जल रहा है।
रामानंद जी ने देखा अमेजन के जंगल के साथ-साथ उनके ऊनी चादर का एक कोना भी ठीक-ठाक जल चुका था और ओसारे के भीतर मटर की घुघनी खाते हुए अब एनआरसी पर बहस छिड़ चुकी थी.... ।
                    ठीक उसी समय ओसारे के बाहर दुआर पर भी एक गाँव था। जिसमें न फेसबुक था, न व्हाट्स-ऐप, न ट्विटर और न ही लाइक-कमेंट। वहाँ पाँच - छह छोटे - छोटे बच्चे थे और बच्चों के बीच में भूरी देह पर सफेद चकत्ते लिए छोटा सा 'मोतिया' था। जिसके चारों पैरों में बच्चों ने सरसों की पायल पहनाई थी और कमर में सरसों की करधन।पूँछ में बाँधी गई सरसों के फूलों की लंबी लड़ियाँ और कानों में सरसों के फूल। मोतिया को सजाते हुए चिरइया बोल रही थी - "पहिन लो सरसों तो गाँव का सिंगार होता है ..." ।
उधर रजेसवा ने यू-ट्यूब पर प्रधानमंत्री का "परीक्षा पर कार्यक्रम" लगा दिया है जिसमें वो कह रहे हैं कि - दिन में कुछ ऐसा समय होना चाहिए कि आप खुद को तकनीकी से दूर रखें। तकनीकी से थोड़ी दूर रहना अपने थोड़े पास हो जाना है....

असित कुमार मिश्र
बलिया
              

Monday, January 6, 2020

पंचाङ्ग

बच्चों के प्रारम्भिक बोध के लिये लिखा है,
पञ्चाङ्ग के महीनों के आगे कोष्ठ में गैगेरियन कैलेंडर 2020-21 की डेट अंकित कर दी है - जिससे समझने में आसानी हो,

प्रत्येक माह में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष बोल कर 15-15 दिन होते हैं, जब रात अंधेरी तो कृष्ण पक्ष, और जब उजली तो शुक्ल पक्ष,
पहले दिन को एकम या प्रतिपदा बोला जाता है -फिर द्वितीया या दूज, तृतीया या तीज, चतुर्थी या चौथ,पंचमी, षष्ठी-छठ, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी -तेरस, चतुर्दशी - चौदस, कृष्ण पक्ष के अंतिम दिन को अमावस और शुक्ल पक्ष के अंत को पूर्णिमा बोला जाता है.
(यह विद्वानों के लिये नहीं है )

बसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर
इन छह ऋतुओं के दो-दो माह -

१. #चैत्र (21मार्च-20अप्रैल)

चैत, चइत, चैत्र कृष्ण प्रतिपदा यानी एकम से आरम्भ होता है, परन्तु शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गणेश-पूजन, कलश स्थापन, देवी पूजन से श्री रामजन्मोत्सव, नवमी तक मनाते हुये - सोल्लास वर्षारम्भ होता है,

चैती एक गायन विधा भी है,

चैतन्यता का प्रतीक है चैत्र !

चैत्र नामक स्वारोचिष मन्वंतर के मनु-पुत्र का भी नाम था.

चित्रा नक्षत्र से सम्बद्ध होने के कारण पहले महीने का नाम चैत्र पड़ा,

इस महीने के पहले दिन ब्रह्मा ने सृष्टि का चित्र खींचा.

२. #वैशाख (21अप्रैल-21मई)

बैसाख, बइसाख में बसन्त से ग्रीष्म ऋतु में प्रवेश कराता है, रवि गेहूँ आदि की फसल पक कर तैयार होती है, शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाते हैं वैशाखी.

इसी माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय-तृतीया बोलते हैं,

शुक्ल पक्ष चौदस को नृसिंह प्राकट्य भी मनाते हैं.

३. #ज्येष्ठ (22मई-21जून)

जेठ शब्द से परिचित ही होंगे,
यह 'बड़े' के रूप में प्रयुक्त होता है, वट सावित्री व्रत इसी माह की कृष्ण अमावस्या को मनाते हैं, शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा-दशहरा, फिर निर्जला-एकादशी और द्वादशी को नारद-जयन्ती.

४. #आषाढ़ (22जून-22जुलाई)

असाढ़ बोलते पूरब के भइया लोग मिल जायेंगे,

शुक्ल पक्ष की द्वितीया रथयात्रा और पूर्णिमा को व्यास या गुरु-पूर्णिमा.

५. #श्रावण (23जुलाई-22अगस्त)

सावन बोलते ही हृदय झूला झूलने लगता है, हरियाली ही हरियाली, शुक्ल तृतीया ही हरियाली तीज है, और पंचमी नाग-पञ्चमी, शिव भक्तों की बम बम और कृष्ण भक्तों की राधे राधे श्रवण कराने के लिए ही श्रावण सावन आता है.
इसी मास की शुक्ल पूर्णिमा रक्षा बन्धन - राखी नाम से जानी जाती है.

६. #भाद्रपद (23अगस्त-22सितम्बर)

भादों यानी भाद्र पद में दुनिया के सबसे भद्र ने पृथ्वी पर अपना पद यानी पाँव रखा - भाद्र पद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ - श्रीकृष्ण जन्माष्टमी बोलते हैं. शुक्ल पक्ष की अष्टमी "राधाष्टमी".

कृष्ण पक्ष की षष्ठी यानी छठ हल षष्ठी या ललही छठ भी बोली जाती है, कृष्ण अमावस्या को कुशोत्पाटनी अमावस्या बोलते हैं.

७. #आश्विन (23सितम्बर-22अक्टूबर)

बोलचाल की भाषा में क्वार या कुआर भी बोला जाता है,

कृष्ण प्रतिपदा से अमावस्या तक की अवधि ही पितृ पक्ष बोली गयी - मानो अपने कुल के जनों का स्मरण कराता है - आश्विन का प्रथम पक्ष. इसी मास के द्वितीय यानी शुक्ल पक्ष से शारदीय नवरात्र आरम्भ हो जाता है, जो कि नवमी को पूरा हो दशमी को विजय दशमी - दशहरा बताता है, शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा यानी शरद-पूर्णिमा के साथ यह माह पूरा होता है.

८. #कार्तिक (23अक्टूबर-23नवम्बर)

कातिक बोलते हुए गंगा नहान का जो मजा है वह तो वही जाने जो कातिक नहाया हो. यह पूरी तरह से लोडेड माह है - "सात वार तेरह त्योहार" वाली कहावत को पूरी करता है -
कृष्ण द्वादशी - गोवत्स द्वादशी
कृ. त्रयोदशी - धन-तेरस, धन्वन्तरि जयन्ती
नरक चतुर्दशी, हनुमान जयन्ती
अमावस्या - दीपावली

शुक्ल द्वितीया - भाई दूज
शुक्ल षष्ठी - सूर्य षष्ठी डाला छठ
शुक्ल अष्टमी - गोपाष्टमी
शुक्ल एकादशी - तुलसी विवाह
शुक्ल चतुर्दशी - वैकुण्ठ-चौदस
शुक्ल पूर्णिमा - कार्तिक पूर्णिमा

९. #मार्गशीर्ष (24नवम्बर-23दिसम्बर)

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने आपको महीने में मार्गशीर्ष कहा -
मासानां मार्गशीर्षोSहम् 10.35,

मृगशिरा नक्षत्र पर इस माह की पूर्णिमा पड़ती है, अतः इस माह का नाम मार्गशीर्ष पड़ा. अग्रहायण को बोलचाल में इसे अगहन या अघहन भी बोलते हैं, अघ यानी पाप को हन मारनेवाला, या अ गहन - जिसमें सरलता हो .

इसी माह की शुक्ल पञ्चमी को सीता-राम विवाह हुआ.

१०. #पौष (22दिसम्बर-20जनवरी)

पूस की रात पढ़ते ही रोआ सिहर गया था, इसके शुक्ल  पक्ष में सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। उस दिन मकर संक्रांति , खिचड़ी पोंगल मनाते हैं.

११. #माघ (21जनवरी-19फरवरी'21)

माघ शुक्ल पञ्चमी यानी सरस्वती पूजा, बसन्त ऋतु का पदार्पण.

१२. #फाल्गुन (20फरवरी-20मार्च'21)

फागुन में फगुनहट चढ़ते ही होली और फाग की आग धधक उठती है, कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को शिव-विवाह हुआ, जिसे शिव-रात्रि बोलते हैं - उससे पहले वाली एकादशी - रंगभरी एकदशी बोली जाती है, और होली खेल पूर्णिमा बोल - फाल्गुन वर्ष पूरा कर जाता है.

___
लोक गीतों ने हर माह के अलग अलग गीत गाये हैं,

तुलसीदास जी ने और जायसी ने बारहमासा रचा है,

घाघ, भड्डर और भड्डरी ने अनेक कहावतें इन महीनों के नाम ले लेकर कहीं हैं,

विकिपीडिया पर भी हर माह की जानकारी उपलब्ध है,

जन्म जयन्ती तिथियों और भी पर्वो के बारे में विस्तार भय से संकोच हुआ.
💐
बहुत सी बातें लेख लम्बा होने के डर से नहीं उल्लेखित की गयीं,
फिर कभी ....

साभार
सोमदत्त द्विवेदी जी

Thursday, January 2, 2020

आवेदन पत्र

सेवा में ;
जिला समाज कल्याण अधिकारी अधिकारी बलिया ।

विषय :- छात्र /छात्राओं के संदेहास्पद डाटा के सम्बन्ध में -

महोदय! आपके पत्रांक संख्या C-5563. दिनांक 17 दिसम्बर 2019 का संदर्भ ग्रहण करते हुए, दशमोत्तर छात्रवृत्ति आवेदन करने वाले उन सभी छात्र - छात्राओं की सूची निर्दिष्ट प्रारूप में संलग्नकों के साथ प्रेषित की जा रही है जिनका आवेदन पत्र संदिग्धता की श्रेणी में आ गया है।
प्राचार्य
श्री किशुन काॅलेज़ चक उजियारी बलिया

Wednesday, May 22, 2019

शोध-कार्य

शोध कार्य की आवश्यकता एवं महत्व
डॉक्टर बेशेंट का तर्क है कि वर्तमान समाज में गुरु पद की महिमा का विघटनहुआ है। आज विद्यार्थी गुरु के प्रति वैसी श्रद्धा नहीं रखता जैसी प्राचीन काल में दृष्टिगोचर होती थी। उनके अनुसार ऐसा शिक्षण पद्धति में धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों के क्षय के कारण हुआ है। इसलिए उन्होंने भारत में अंग्रेजों द्वारा भौतिक शिक्षा व्यवस्था का घोर विरोध किया तथा ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा की महत्ता पर बल दिया जो विद्यार्थियों में राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण कर सके।ऐसी शिक्षा संस्कार सद्भाव एवं नैतिकता पर आधारित होगी।राष्ट्रीय शिक्षा के अभाव में भारत में विभाजन विभेद और विद्वेष की स्थिति का आविर्भाव हो जाएगा। अतः वर्तमान परिस्थिति में एनी बेसेंट का शिक्षा बहुत ही प्रासंगिक हो जाता है।

                               शोध विधि
जिस प्रकार कोई कार्य करने के लिए कुछ उपकरणों की आवश्यकता होती है ठीक उसी प्रकार व्यावहारिक विज्ञान में अध्ययन के लिए समस्या के चुनाव हो जाने पर यह निर्धारित करना आवश्यक हो जाता है कि समस्या के समाधान के लिए किन किन पद्धतियों व प्रवृत्तियों का उपयोग समस्या के अनुकूलन से हो सकता है । इसलिए प्रस्तुत अय्यंकाली में पद्धतियां एवं विधियों का वर्णन किया जाएगा जिनकी सहायता से अनुसंधानकर्ता अपना शोध कार्य संपन्न करेगा।
           प्रस्तुत शोध में ऐतिहासिक एवं दार्शनिक विधियों का अनुसरण किया गया है। वर्णनात्मक एवं विश्लेषण शैली प्रयुक्त की गई है। मानव ने जो कुछ अतीत से प्राप्त किया है इतिहास उसका प्रमाण है। इतिहास विशेष समय एवं स्थान पर घटित घटनाओं का एक सत्य सुनियोजित व परीक्षित अभिलेख होता है।इतिहास का प्रयोग भूतकाल की पृष्ठभूमि में वर्तमान को समझने एवं भविष्य के लिए उचित निर्णय लेने के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त शोधार्थी द्वारा अध्ययन की विभिन्न विधियों के प्रयोग का निर्णय लिया गया है।इस अनुसंधान में वर्णनात्मक विधि का भी
प्रयोग किया गया है वर्णनात्मक अनुसंधान वस्तुतः वर्तमान में विद्यमान परिस्थितियों का अध्ययन करके 'क्या है ?'प्रश्न का उत्तर देता हैवहीं दूसरी तरफ ऐतिहासिक अनुसंधान वस्तुतः अतीत का अध्ययन करके 'क्या था ?' प्रश्न का उत्तर प्रदान करते हैं।वर्तमान एवं प्राचीन परिस्थितियों को देखते हुए इन विधियों का प्रयोग किया गया है।

शोध में प्रयुक्त शब्दों का संप्रत्यात्मक अर्थ

शिक्षा--
          शिक्षा जीवन पर्यंत चलने वाली विकास की प्रक्रिया है।शिक्षा एक ऐसा व्यापक शब्द है जिसके विषय में विद्वानों ने अपने दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा शब्द की व्याख्या की है प्राचीन समय में शिक्षा को विद्या कहा गया है। शिक्षा को प्राचीन अवधारणा में ज्ञान मनुष्य अर्थात ज्ञान मनुष्य का तृतीय नेत्र होता है इस रूप में परिभाषित किया गया है। दार्शनिक दृष्टिकोण से सा विद्या या विमुक्तए की बात की जाती है अर्थात विद्या वह होता है जो व्यक्ति को मुक्ति प्रदान करें या मोक्ष प्रदान करें ।परंतु आज शिक्षा के अर्थ के संबंध में प्राचीन धारणा बदल गई है और शिक्षा शब्द का प्रयोग नए अर्थ में किया जाने लगा है। शिक्षा अंग्रेजी शब्द एजुकेशन का हिंदी रूपांतर है जो कि लैटिन भाषा के एजुकेटम शब्द से निकला है।वर्तमान में शिक्षा का अर्थ है कि व्यक्ति के अंतर्निहित शक्तियों एवं गुणों को प्रकट और विकसित करना।

दर्शन-
          दार्शनिक चिंतन का उद्देश्य बौद्धिक जिज्ञासा की तृप्ति मात्र नहीं है अपितु बेहतर जीवन की तलाश है।दर्शन शब्द का अर्थ है सत्य की अनुभूति है केवल जानना मात्र नहीं।भारतीय दर्शन में संत हुए बिना केवल ज्ञानी ही कोई अर्थ नहीं रखता। सत्य ज्ञान की विषय नहीं अपितु अनुभूति का विषय। दार्शनिक चिंतन का उद्देश्य उस दिव्य दृष्टि को प्राप्त करना है जिससे जीवन में प्रकाश मिल सके तथा जीवन का रूपांतरण किया जा सके।

वर्तमान-
             व्यक्ति जिस परिस्थिति में किसी कार्य को कर रहा होता है वह परिस्थिति हीं उसकी वर्तमान होती है। वर्तमान हमेशा 'क्या है ?' जैसे प्रश्नों का उत्तर देता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वर्तमान उस व्यक्ति या कार्य के वास्तविक दशा का वर्णन करता है जिस समय में कार्य घटित होता हो या वह व्यक्ति जीवन जी रहा होता है।

प्रासंगिकता-
                  प्रासंगिकता से आशय यह है कि कोई सूचना , क्रिया या चीज किसी मामले समस्या या मुद्दे से कितना संबद्ध है।

पूर्व शोध कार्यों का सिंहावलोकन-
      किसी समस्या के अध्ययन हेतु अनुसंधानकर्ता को उस समस्या से संबंधित जिससे वह अध्ययन हेतु चुना है की पूर्व अध्ययनों को जानना आवश्यक हो जाता है तभी वह अपनी ली गई समस्या के संबंध में पूर्व अध्ययनों की पुनरावृति से बच सकता है तथा पूर्व अध्ययनों के परिणामों को ध्यान में रखते हुए अपनी समस्या के अध्ययन की एक नई योजना प्रक्रिया निर्मित कर सकेगा जिससे इससे वह पुनरावृति में धन समय तथा शक्ति के होने से बच जाता है तथा सक्रिय परिणाम देने वाले निकलते हैं जिस प्रकार अंधेरे में तीर छोड़ने से लक्ष्य की पूर्ति ना होकर पूर्ण रूप से अनिश्चितता बनी रहती है उसी प्रकार शुद्ध कर उचित दिशा में नहीं बढ़ सकता है जब तक कि उसे ज्ञात ना हो उस क्षेत्र में कितना कार्य हुआ है किस विधि से कार्य किया गया तथा उसकी क्या निष्कर्ष आए।
                  अनुसंधान में साहित्य सर्वेक्षण की आवश्यकता तथा महत्व से संबंधित साहित्य का तात्पर्य अनुसंधान प्रबंध एक अध्याय को जोड़ देने अथवा ग्रंथ सूची को बढ़ाने तक सीमित नहीं रहता वरन अनुसंधान के औचित्य को स्पष्ट करने रूपरेखा को बनाने एवं पदों का संकलन व व्याख्या में महत्वपूर्ण सहायता करता है।
स्केट्स महोदय ने विचार दिया है कि "जिस प्रकार एक कुशल चिकित्सक के लिए जरूरी है कि हो रही और सगे संबंधी आधुनिकतम खोजों से परिचित होता रहे उसी प्रकार शिक्षा के जिज्ञासु छात्र अनुसंधान के क्षेत्र में कार्य करने वाले तथा अनुसंधान कर्ता के लिए भी उस क्षेत्र से संबंधित सूचनाओं एवं खोजों से परिचित होना आवश्यक है।"

Monday, February 25, 2019

वो अमावस सी लड़की, वो पतझड़ सा लड़का...

वो अमावस सी लड़की, वो पतझड़ सा लड़का ....

एक अमावस भरी आँखों वाली लड़की थी। सुबह के धूप सी मासूम, एकदम छुईमुई की तरह नाज़ुक। दोनों चोटियों में सुबह के मद्धम चाँद - सितारे जगमगाते थे।तितलियों से दोस्ती थी उसकी और वो परियों से बातें करती थी।
अक्सर खुली खिड़कियों से चाँद को धीरे - धीरे जाते देखा करती थी और सोचा करती थी कि बस थोड़ी बड़ी और हो जाऊँ फिर देखना है कि ये चाँद जाता कहाँ है! ...
लेकिन खुली खिड़कियाँ अक्सर धोखा देतीं हैं। पिछली रात खिड़कियों के पर्दे हटा कर बसंत घुस आया था... ।
अब लड़की बालों को दो चोटी नहीं बनाती बल्कि बालों के बादलों को पकड़ कर गोल जूड़े बना लेती है। दोनों भौहों के बीच टिका देती है एक छोटी सी बिंदी की गोलाई और देखती है आइने में खुद को तब तक - जब तक आइना बोल नहीं पड़ता - अद्भुत सौंदर्य है तुम्हारा...
                    इसी बीच एक लड़का भी था कहीं। पतझड़ की तरह उदास आँखों वाला। जैसे किसी दार्शनिक के अधूरे रह गए ग्रंथों की वीरान पाण्डुलिपियाँ...
जैसे सूख चुकी नदी की दरारों से झाँकते कुछ बेरंग से तिनके।
दोनों किसी लाइब्रेरी में अपनी - अपनी किताबों के साथ बैठे थे। तभी लड़की ने कहा - सुनो!
लड़के ने किताब में खोए हुए ही कहा - हूँ!
लड़की शब्दों से बातों के सिलसिले बना नहीं पाई - नहीं! कुछ नहीं।
थोड़ी देर बाद उसने चुपके से कलाई घड़ी के शीशे में खुद को निहारा। थोड़ी हिम्मत मिली फिर मुस्कुराई और पूछा -अच्छा! बताओ! सौंदर्य किसे कहते हैं?
लड़के ने बगैर नज़रें उठाए कहा - जो बहुत सुंदर हो।
लड़की खीझ गई। शायद उसे इतने साधारण जवाब की आशा न थी। वो सर झुकाकर किताब में देखने लगी। अमावस भरी आँखों में बदरी भर आई थी। सब कुछ जैसे धुंधला सा दिखने लगा था...।
लड़की के हाथ में थी कोई प्रेम कहानी और आँखें अटकी थीं बड़ी देर से उसी पन्ने पर जहाँ, नायक ने नायिका से कहा था - तुम मेरी 'काव्य-प्रेरणा' हो...।
लड़की ने गुलाबी दुपट्टे के कोने से आँखों के कोरों को पोछा। मुस्कुराई और बड़ी देर तक लाज के चुप्पियों की अनगिनत गिरहों में से प्रेम के अक्षरों को निकालती रही। फिर थोड़े संकोच से पूछा - 'काव्य-प्रेरणा' किसे कहते हैं?
कवि जिस प्रेरणा से काव्य-सृष्टि करता है - लड़के ने सूखा सा जवाब दिया।
लड़की को यह अपमान सहन नहीं हुआ। नहीं! अब और नहीं।
उसने जोर से किताब बंद की। उठी और जाने लगी...।
इधर से लड़का भी पाण्डुलिपियाँ लिए उठ गया। लड़की के हाथ से किताब गिर गई और लड़के के हाथों से उसकी पाण्डुलिपियाँ। उसने लड़की का हाथ पकड़ा और अपनी तरफ खींच लिया। फिर आँखों से गिर रहे लापरवाह बूँदों को होठों से पकड़ते हुए कहा - बेवकूफ़ लड़की! तुम मेरा 'काव्य-सर्वस्व' हो...
                   लड़की ने बदराई आँखों से देखा - लाइब्रेरी की खिड़कियों के पर्दे हटाकर बसंत घुस रहा था और लड़के की वीरान आँखों ने देखा - नीचे गिरी दर्शनशास्त्र की पाण्डुलिपियों पर लड़की के मुहब्बत की उस नाज़ुक सी किताब की प्रतिष्ठा हो चुकी थी...।

असित कुमार मिश्र
बलिया