Wednesday, May 22, 2019

शोध-कार्य

शोध कार्य की आवश्यकता एवं महत्व
डॉक्टर बेशेंट का तर्क है कि वर्तमान समाज में गुरु पद की महिमा का विघटनहुआ है। आज विद्यार्थी गुरु के प्रति वैसी श्रद्धा नहीं रखता जैसी प्राचीन काल में दृष्टिगोचर होती थी। उनके अनुसार ऐसा शिक्षण पद्धति में धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों के क्षय के कारण हुआ है। इसलिए उन्होंने भारत में अंग्रेजों द्वारा भौतिक शिक्षा व्यवस्था का घोर विरोध किया तथा ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा की महत्ता पर बल दिया जो विद्यार्थियों में राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण कर सके।ऐसी शिक्षा संस्कार सद्भाव एवं नैतिकता पर आधारित होगी।राष्ट्रीय शिक्षा के अभाव में भारत में विभाजन विभेद और विद्वेष की स्थिति का आविर्भाव हो जाएगा। अतः वर्तमान परिस्थिति में एनी बेसेंट का शिक्षा बहुत ही प्रासंगिक हो जाता है।

                               शोध विधि
जिस प्रकार कोई कार्य करने के लिए कुछ उपकरणों की आवश्यकता होती है ठीक उसी प्रकार व्यावहारिक विज्ञान में अध्ययन के लिए समस्या के चुनाव हो जाने पर यह निर्धारित करना आवश्यक हो जाता है कि समस्या के समाधान के लिए किन किन पद्धतियों व प्रवृत्तियों का उपयोग समस्या के अनुकूलन से हो सकता है । इसलिए प्रस्तुत अय्यंकाली में पद्धतियां एवं विधियों का वर्णन किया जाएगा जिनकी सहायता से अनुसंधानकर्ता अपना शोध कार्य संपन्न करेगा।
           प्रस्तुत शोध में ऐतिहासिक एवं दार्शनिक विधियों का अनुसरण किया गया है। वर्णनात्मक एवं विश्लेषण शैली प्रयुक्त की गई है। मानव ने जो कुछ अतीत से प्राप्त किया है इतिहास उसका प्रमाण है। इतिहास विशेष समय एवं स्थान पर घटित घटनाओं का एक सत्य सुनियोजित व परीक्षित अभिलेख होता है।इतिहास का प्रयोग भूतकाल की पृष्ठभूमि में वर्तमान को समझने एवं भविष्य के लिए उचित निर्णय लेने के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त शोधार्थी द्वारा अध्ययन की विभिन्न विधियों के प्रयोग का निर्णय लिया गया है।इस अनुसंधान में वर्णनात्मक विधि का भी
प्रयोग किया गया है वर्णनात्मक अनुसंधान वस्तुतः वर्तमान में विद्यमान परिस्थितियों का अध्ययन करके 'क्या है ?'प्रश्न का उत्तर देता हैवहीं दूसरी तरफ ऐतिहासिक अनुसंधान वस्तुतः अतीत का अध्ययन करके 'क्या था ?' प्रश्न का उत्तर प्रदान करते हैं।वर्तमान एवं प्राचीन परिस्थितियों को देखते हुए इन विधियों का प्रयोग किया गया है।

शोध में प्रयुक्त शब्दों का संप्रत्यात्मक अर्थ

शिक्षा--
          शिक्षा जीवन पर्यंत चलने वाली विकास की प्रक्रिया है।शिक्षा एक ऐसा व्यापक शब्द है जिसके विषय में विद्वानों ने अपने दृष्टिकोण के अनुसार शिक्षा शब्द की व्याख्या की है प्राचीन समय में शिक्षा को विद्या कहा गया है। शिक्षा को प्राचीन अवधारणा में ज्ञान मनुष्य अर्थात ज्ञान मनुष्य का तृतीय नेत्र होता है इस रूप में परिभाषित किया गया है। दार्शनिक दृष्टिकोण से सा विद्या या विमुक्तए की बात की जाती है अर्थात विद्या वह होता है जो व्यक्ति को मुक्ति प्रदान करें या मोक्ष प्रदान करें ।परंतु आज शिक्षा के अर्थ के संबंध में प्राचीन धारणा बदल गई है और शिक्षा शब्द का प्रयोग नए अर्थ में किया जाने लगा है। शिक्षा अंग्रेजी शब्द एजुकेशन का हिंदी रूपांतर है जो कि लैटिन भाषा के एजुकेटम शब्द से निकला है।वर्तमान में शिक्षा का अर्थ है कि व्यक्ति के अंतर्निहित शक्तियों एवं गुणों को प्रकट और विकसित करना।

दर्शन-
          दार्शनिक चिंतन का उद्देश्य बौद्धिक जिज्ञासा की तृप्ति मात्र नहीं है अपितु बेहतर जीवन की तलाश है।दर्शन शब्द का अर्थ है सत्य की अनुभूति है केवल जानना मात्र नहीं।भारतीय दर्शन में संत हुए बिना केवल ज्ञानी ही कोई अर्थ नहीं रखता। सत्य ज्ञान की विषय नहीं अपितु अनुभूति का विषय। दार्शनिक चिंतन का उद्देश्य उस दिव्य दृष्टि को प्राप्त करना है जिससे जीवन में प्रकाश मिल सके तथा जीवन का रूपांतरण किया जा सके।

वर्तमान-
             व्यक्ति जिस परिस्थिति में किसी कार्य को कर रहा होता है वह परिस्थिति हीं उसकी वर्तमान होती है। वर्तमान हमेशा 'क्या है ?' जैसे प्रश्नों का उत्तर देता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वर्तमान उस व्यक्ति या कार्य के वास्तविक दशा का वर्णन करता है जिस समय में कार्य घटित होता हो या वह व्यक्ति जीवन जी रहा होता है।

प्रासंगिकता-
                  प्रासंगिकता से आशय यह है कि कोई सूचना , क्रिया या चीज किसी मामले समस्या या मुद्दे से कितना संबद्ध है।

पूर्व शोध कार्यों का सिंहावलोकन-
      किसी समस्या के अध्ययन हेतु अनुसंधानकर्ता को उस समस्या से संबंधित जिससे वह अध्ययन हेतु चुना है की पूर्व अध्ययनों को जानना आवश्यक हो जाता है तभी वह अपनी ली गई समस्या के संबंध में पूर्व अध्ययनों की पुनरावृति से बच सकता है तथा पूर्व अध्ययनों के परिणामों को ध्यान में रखते हुए अपनी समस्या के अध्ययन की एक नई योजना प्रक्रिया निर्मित कर सकेगा जिससे इससे वह पुनरावृति में धन समय तथा शक्ति के होने से बच जाता है तथा सक्रिय परिणाम देने वाले निकलते हैं जिस प्रकार अंधेरे में तीर छोड़ने से लक्ष्य की पूर्ति ना होकर पूर्ण रूप से अनिश्चितता बनी रहती है उसी प्रकार शुद्ध कर उचित दिशा में नहीं बढ़ सकता है जब तक कि उसे ज्ञात ना हो उस क्षेत्र में कितना कार्य हुआ है किस विधि से कार्य किया गया तथा उसकी क्या निष्कर्ष आए।
                  अनुसंधान में साहित्य सर्वेक्षण की आवश्यकता तथा महत्व से संबंधित साहित्य का तात्पर्य अनुसंधान प्रबंध एक अध्याय को जोड़ देने अथवा ग्रंथ सूची को बढ़ाने तक सीमित नहीं रहता वरन अनुसंधान के औचित्य को स्पष्ट करने रूपरेखा को बनाने एवं पदों का संकलन व व्याख्या में महत्वपूर्ण सहायता करता है।
स्केट्स महोदय ने विचार दिया है कि "जिस प्रकार एक कुशल चिकित्सक के लिए जरूरी है कि हो रही और सगे संबंधी आधुनिकतम खोजों से परिचित होता रहे उसी प्रकार शिक्षा के जिज्ञासु छात्र अनुसंधान के क्षेत्र में कार्य करने वाले तथा अनुसंधान कर्ता के लिए भी उस क्षेत्र से संबंधित सूचनाओं एवं खोजों से परिचित होना आवश्यक है।"

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