Tuesday, September 22, 2020

आवेदन पत्र दो

सेवा में ;
अधिशासी अभियंता
विद्युत वितरण प्रखंड, बलिया।
विषय -बिजली कनेक्शन काटने के उपरांत मृतक व्यक्ति के नाम से बिजली बिल जारी होने के संदर्भ में।
महोदय, स्व. जगदीश मिश्र ने दिनांक 06.04.1973 को दस हार्सपावर का निजी नलकूप कनेक्शन लिया था। तब मीटर अनुपलब्ध रहने और विलंब होने की दशा में कनेक्शन का प्रकार  D/C था।
उपभोक्ता जगदीश मिश्र के पुत्रगणों (स्व. ब्रजराज स्व. विजयशंकर स्व. शिवशंकर स्व. दयाशंकर) के द्वारा दिनांक 19.02.1976 को दिए अपने प्रार्थना पत्र के बिंदु तीन से स्पष्ट है कि इस दिनांक तक उपभोक्ता जगदीश मिश्र के जिवित न रहने की दशा में अभिलेखों में संशोधन कर वारिसों के नाम पर कनेक्शन किया गया था। (तत्कालीन आवेदन पत्र की रिसिविंग की छाया प्रति संलग्न है)
               इसके बाद 12.04.1990 तक यह कनेक्शन दयाशंकर मिश्र के नाम से था। उसी समय आटाचक्की हटाने और बिजली कनेक्शन काटने का आवेदन दिया गया। जिसके अनुसार तत्कालीन अधिशासी अभियंता द्वारा मौका निरीक्षण करके आटा चक्की हटा दिया गया था और बिजली कनेक्शन काट दिया गया था। विभाग द्वारा बिजली के खंभे, तार इत्यादि हटा लिए गए थे। और समस्त बिल रुपये 800 सौ रुपये था जिसे जमा भी कर दिया गया था। (जिसकी जमा रसीद और निरीक्षण की रिपोर्ट की छाया प्रति संलग्न है)
अधिशासी अभियंता डिवीजन प्रथम महोदय से रिसीविंग भी प्राप्त हो गई थी जिसमें इस बात का उल्लेख है कि - "समस्त कार्यवाही पूरी कर ली गयी है अब कोई भी बकाया राशि शेष नहीं है"।
                        अब लगभग तीस वर्ष के बाद 19. 09.2020 को अचानक बिजली विभाग, सिकन्दरपुर के कुछ कर्मचारी आए और बकायेदारों की सूची में दयाशंकर मिश्र का नाम दिखाया जिसमें बकाया धनराशि 1035354 (दस लाख पैंतीस हजार तीन सौ चौवन रुपये) है। जिससे प्रार्थी को अपार मानसिक और सामाजिक पीड़ा हुई है।
                   महोदय इस संबंध में निवेदन है कि जो कनेक्शन 1990 में ही समाप्त हो चुका है, अब न वहाँ कोई बिजली का खंभा है, न तार, यहाँ तक कि ट्यूबवेल भी खण्डहर की हालत में है। ऐसी स्थिति में बिल आना अत्यंत पीड़ा दायक है।
                अत: श्री मान से निवेदन है कि इस बकाया धनराशि को निरस्त करते हुए बकायेदारों की सूची से स्व. दयाशंकर मिश्र का नाम हटाने की कृपा करें।
प्रार्थी -
असित कुमार मिश्र
कृते- स्व. दयाशंकर मिश्र
ग्राम - मिश्रचक
पत्रालय - सिकन्दरपुर
जनपद-बलिया (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल - 7897176716

Monday, September 21, 2020

आवेदन पत्र

सेवा में ;
अधिशासी अभियंता
विद्युत वितरण प्रखंड सिकन्दरपुर बलिया
विषय - मृतक व्यक्ति के नाम से बिजली बिल प्राप्त होने के संदर्भ में।
महोदय, हमने दिनांक 06.04.सन् 1973 को दस हार्सपावर का निजी नलकूप कनेक्शन लिया था। तब मीटर अनुपलब्ध रहने और विलंब होने की दशा में कनेक्शन का प्रकार  D/C था। यह कनेक्शन जगदीश मिश्र के नाम से था।
उपभोक्ता जगदीश मिश्र के पुत्रगणों (स्व. ब्रजराज स्व. विजयशंकर स्व. शिवशंकर स्व. दयाशंकर) के द्वारा दिनांक 19.02.1976 को दिए अपने प्रार्थना पत्र के बिंदु तीन से स्पष्ट है कि इस दिनांक तक उपभोक्ता जगदीश मिश्र के जिवित न रहने की दशा में अभिलेखों में संसोधन कर वारिसों के नाम पर कनेक्शन किया गया था। (तत्कालीन आवेदन पत्र की रिसिविंग की छाया प्रति संलग्न है)
               इसके बाद 12.04.1990 को जब यह कनेक्शन दयाशंकर मिश्र के नाम से था तब तत्कालीन अधिशासी अभियंता के द्वारा मौका निरीक्षण करके आटा चक्की हटा दिया गया और समस्त बिल रुपये 800 सौ (आठ सौ) जमा कर दिया गया था। (जिसकी जमा रसीद और निरीक्षण की रिपोर्ट की छाया प्रति संलग्न है)
           तत्पश्चात एग्जिक्यूटिव इंजीनियर इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन डिवीजन प्रथम के कार्यालय से दिनांक 18.05.1990 को एक आफिस मेमोरेण्डम निकाला गया जिसमें स्पष्ट उल्लेख किया गया कि दिनांक 16.04.1990 के बाद दयाशंकर मिश्र के नाम कोई भी बकाया राशि शेष नहीं है।
इसके बाद बिजली कनेक्शन काट दिया गया था और सन 1991-92 में बिजली के खंभे, तार इत्यादि विभाग द्वारा हटा लिए गए थे।
                        इस घटना को बीते आज लगभग तीस वर्ष हो गए हैं। तब के द्वितीय उपभोक्ता दयाशंकर मिश्र को मरे भी दस वर्ष से अधिक हो गए।
लेकिन दिनांक 19 सितम्बर 2020 को अचानक बिजली विभाग सिकन्दरपुर के कुछ कर्मचारी आए और बकायेदारों की सूची में दयाशंकर मिश्र का नाम दिखाया जिसमें बकाया धनराशि 1035354 (दस लाख पैंतीस हजार तीन सौ चौवन रुपये) है।जिससे हम प्रार्थी को अपार मानसिक कष्ट हुआ है।
                   महोदय इस संबंध में निवेदन है कि विभाग द्वारा मौका मुआयना कराया जाए तथा कुछ ग्रामीणों से बातचीत की जाए जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि वो ट्यूबवेल अब खंडहर की हालत में है, वहाँ वर्षों से न कोई बिजली खंभा है, न कोई तार, न मोटर, न आटाचक्की यहाँ तक कि एक बल्ब और होल्डर तक नहीं है।
                अत: श्री मान से निवेदन है कि सन् 1973 से 1990 तक की समस्त पत्रावलियों की विवेचना कर ली जाए और लेजर बुक की त्रुटियों का निराकरण करते हुए सैंतालिस वर्ष पूर्व का कनेक्शन बंद कर दिया जाए।
                उपरोक्त संदर्भ में यह भी निवेदन है कि 1973 से लेकर 1990 तक के समस्त बिल उसकी जमा रसीद तथा विभाग और उपभोक्ता के बीच हुए समस्त पत्राचार की रिसिविंग उपलब्ध है। आपके कार्यालय से जब भी आदेश मिलेगा तो मय साक्ष्यों के साथ उपस्थित हो जाऊँगा।
भवदीय -
असित कुमार मिश्र
कृते- स्व. दयाशंकर मिश्र
ग्राम - मिश्रचक
पत्रालय - सिकन्दरपुर
जनपद-बलिया (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल - 7897176716

Wednesday, September 9, 2020

जब तक सिनेमा है

जब तक सिनेमा है तब तक लोग....

विजया जी!
रिया - सुशांत - कंगना जैसे लोगों पर कुछ बातचीत हो रही थी हमारी - आपकी, जब आपने फोन काटा था। तबसे मैं सोच रहा हूँ कि मेरे और आपके बीच ये अंतर कैसे आया!
मैंने कुछ सवाल पूछे थे आपसे जो अब भी सवाल ही हैं।
सुशांत जी बिहार के किस गाँव से थे? पता है आपको!
मल्लडीहा गाँव के कितने लोग बी. एड्. , एम. एड. , नेट, पी. एचडी. करके बेरोज़गार बैठे हैं और रोज़ मर रहे हैं पता है आपको!
सुशांत जी के मरने के बाद न्यूज़ चैनल्स ने जितना समय रिया पर लगाया उसके एक बटा करोड़वें सेकेंड भी यह सोचने में नहीं लगाया कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की लिखित परीक्षा में कानपुर की विदुषी रश्मि जी का सेलेक्शन 121 सवाल सही करने पर भी क्यों नहीं हुआ जबकि वो एक करोड़ रुपये देकर आए किसी भी साक्षात्कारकर्ताओं से ज़्यादा जानतीं हैं!
              आप इस चिंता में परेशान हैं कि फिल्म उद्योग में कौन - कौन कोकीन का सेवन करता है?
लेकिन आप इस बात पर परेशान नहीं हैं कि किसी भी स्ववित्तपोषित काॅलेज़ेज़ में आठ हजार से लेकर बारह हजार तक के नेट पीएचडी टीचर्स होते हैं और उतनी कीमत में एक ग्राम कोकीन मिलती है।
हमारी कीमत एक ग्राम कोकीन ही है विजया जी! हमारी विद्वत्ता, हमारे विदेशों में छपे लेख-कहानियों, आकाशवाणियों पर प्रसारित चर्चाओं की कीमत उनके एक ग्राम में है... कब समझेंगी आप!
आप चौंक जाएंगी यह जानकर कि उत्तर प्रदेश में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की भर्ती आज तीन साल से बस 'क्षैतिज आरक्षण' के कारण फँसी हुई है। अब आपको यह जानकर हँसी आएगी कि प्रतिशत निकाल लेने वाला कोई भी मास्टर यह क्षैतिज आरक्षण सेट कर देगा उसके लिए किसी सचिव वंदना त्रिपाठी की जरुरत ही नहीं!
सुशांत जी के मरने पर एक घर में अँधेरा छा गया, मानता हूँ। पर आपको नहीं पता कि इलाहाबाद और दिल्ली के लाखों छात्रों ने ही नहीं बल्कि बलिया के किसी असित कुमार मिश्र ने भी आज नौ तारीख को नौ मिनट के लिए लाइट बंद कर अँधेरा किया था।ताकि वो अपने मन की बात उस वक्ता को सुना सके जिसे जीभ देते समय भगवान भूल गया कि दो कान भी देने हैं! यह सुश्री कंगना जी से भी ज़्यादा हिम्मत का काम है!
नहीं पता है आपको कि आलू बलिया में चालीस रुपये किलो मिल रहा है! और नहीं पता है आपको कि कोरोना काल में कितनों के रोज़गार छिन गए या फिर देश की अर्थव्यवस्था कितने साल पीछे चली गई।
                 नहीं पता है आपको कि 2007 में आपकी तरह ही एक गणित की शिक्षिका थीं जिसके बारे में उस समय के एक गिद्ध सुधीर चौधरी ने स्टिंग ऑपरेशन करके बताया था कि वो लड़कियों को देह व्यापार के लिए मजबूर करती है।
फिर क्या था! हम - आप जैसी आम जनता ने उस औरत को सड़क पर घसीट लिया वो औरत नंगी हो गई हम धृतराष्ट्रों की सभा में। उसका ब्याउज़ तक फाड़ दिया गया।
बाद में वो औरत बे-गुनाह निकली। सब कुछ स्क्रिप्टेड निकला और सुधीर चौधरी ने माफ़ी माँग ली!
उस औरत का नाम नहीं पता है आपको लेकिन कंगना के हक के लिए फोन काट दिया आपने!
वो औरत भी किसी के लिए कंगना ही थी विजया जी! जो आज कहाँ और किस हाल में होगी किसी को नहीं पता। लेकिन  गिद्धों की सभा में आज भी कोई सुधीर चौधरी जरूर होगा! पता कर लीजियेगा।
किसी कंगना का करोड़ों का बंगला टूट गया वह पता है आपको! लेकिन सुशांत जी के मल्लडीहा में रजेसवा ने अपनी माँ का एक कंगन इसलिये गिरवी रखा था कि वो उस रेलवे ग्रुप डी का फार्म भर सके जिसकी परीक्षा अब तक नहीं हुई!
किस कंगना की चिंता करनी चाहिए थी और किस कंगना की चिंता कर रही हैं आप!
अपने जिले की कोरोना अपडेट पूछ दूँ तो बिना नवीन चंद्रकला भइया की पोस्ट देखे बता नहीं पाएँगी आप! लेकिन मुम्बई में बीएमसी क्या कर रही है वो पल - पल की खबर है आपको। खैर छोड़िए यह सब बातें!
                      याद है! विवाह के समय आपके पक्ष के पंडितों  ने जितने वचन उच्चरित किए थे उनमें सहमति के साथ एक शुद्ध उच्चारण मेरा भी था।
लेकिन वर पक्ष से कोई भी वचन नहीं लिया गया था। आज पहला वचन ले रहा हूँ फेसबुक के सैकड़ों पंडितों के समक्ष.... मेरी ही तरह टी. वी. नहीं देखेंगी आज के बाद।
ताकि सही मुद्दों की सही पहचान सही आँखें कर सकें.... ।
और ये आप पर छोड़ता हूँ पता कीजिएगा कि रामाधीर सिंह ने सिनेमा के बारे में क्या कहा था.... ।

असित कुमार मिश्र
बलिया

Friday, August 21, 2020

बोलिए एसपी साहेब

बोलिए एस. पी. साहेब!....

भारतीय फ़िल्म इतिहास में 'गैंग्स आॅफ वासेपुर' का उतना ही महत्त्वपूर्ण स्थान है जितना नसबंदी किए गए लोगों के बीच इंदिरा जी का।
इसी फ़िल्म के एक सीन में सरदार खान ने रामाधीर सिंह के बेटे को, जो तत्कालिक विधायक भी हैं, उनको एस. पीए. आफ़िस में कूट दिया।
अज़ीब दृश्य है जब सरदार खान ने एस. पी. साहेब से पूछा है कि -  "एस. पी. साहेब! एक विधायक को सरेआम थाने में थप्पड़ मारने के लिए केतना दिन जेल में रहना पड़ता है"?
यह दृश्य मैं दोस्तों के साथ सिनेमाघर में देख रहा था। जैसे ही सरदार खान ने विधायक जी को थप्पड़ मारा वैसे ही सिनेमाघर सीटियों और चीख-चिल्लाहटों से गूँज उठा.... लेकिन मैं चुप रहा।
अगले सीन में बगल में खड़ा एक व्यक्ति बोल पड़ता है - अब तो एस. पी. साहेब हमहूँ जेल में जायेंगे ... और विधायक जी को वो भी एक थप्पड़ लगा देता है....।
इस सीन पर मैंने सीटियाँ बजाईं, खूब चिल्लाया....लेकिन पूरा सिनेमाघर चुप रहा।
                    कुछ देर बाद साथी उदित ने पूछा - भैया! कभी-कभी आप एकदम समझ में नहीं आते!
मैंने कहा - देखिए उदित! सरदार खनवां का थप्पड़ मारना प्रतिक्रिया मात्र है। अपने ज़माने के हिस्ट्रीशीटर रहे रामाधीर सिंह के बेटे को थप्पड़ मारना, एक नये-नये उभर रहे हिस्ट्रीशीटर सरदार खान की जवाबी कार्रवाई है यह! और कुछ भी नहीं।
लेकिन अगले सीन में एक आम आदमी की हिम्मत है। व्यवस्था के दुष्चक्र से ऊब चुका वह आदमी भले ही धीरे से विधायक को चपत लगाता है, लेकिन यह दृश्य इतना बताने के लिए काफ़ी है कि आम आदमियों को भी गुस्सा आता है। वो भी कभी-कभी अपने आत्म-सम्मान के लिए जेल जाने से नहीं हिचकता।
और लोकतंत्र की ताकत सरदार खान की प्रतिक्रिया में नहीं, उसी आम आदमी के द्वारा मारे जाने वाले थप्पड़ की आवाज़ में ज़िंदा है.... ।
छोड़िये भी ये सनीमा की बातें!
                बलिया जिला कभी क्रांतिकारी कहा जाता था। शायद इमर्जेंसी में इंदु जी ने ऐसी नसबंदी की, कि बलिया की आने वाली पीढ़ियों में भी मर्दाना ताकत की कमजोरी साफ़-साफ़ देखी जा सकती है।
इसी बलिया की एक तहसील बेल्थरा-रोड के एसडीएम हैं अशोक चौधरी।
सत्ता और कुर्सी का नशा इनकी बुढ़ौती पर अक्सर भारी पड़ने लगता है। कल ये अपने कार्यालय से अचानक निकले, हाथ में प्रशासनिक लाठी उठाई और आम जनता को लोकतंत्र का मतलब समझाने लगे।
उन्होंने दौड़ा-दौड़ा कर लोगों को मारा। फिर भी मन न भरने पर सड़क पर उतर आए और आते-जाते लोगों को पीटना शुरू किया।
भ्रष्ट तंत्र के अधिकारी अक्सर अंधे हो जाते हैं और इन्हें फिर नहीं दिखाई देता कि किसने मास्क लगाया है या नहीं!
इन्हें नहीं दिखाई देता कि जेईई की परीक्षा में माननीय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी - जिंदगी नहीं रुकती।
इन्हें नहीं दिखाई देता कि प्रधानमंत्री कह रहे हैं - हमें कोरोना के साथ जीना होगा।
इनको ये भी नहीं पता कि किसी भी तहसील में आम जनता के लिए ए. सी. नहीं लगा है कि कोई आराम करने आएगा।आम आदमी अगर सिस्टम में न फँसे तो किसी कोर्ट - कचहरी या तहसील में पेशाब भी न करने जाए!
                  इसी बीच सोशल मीडिया पर इनके करतूतों के विडियोज़ दौड़ने लगे और डी. एम. ने इनका स्थानांतरण किया। बाद में सरकार ने भी डैमेज़ कंट्रोल किया।
यह विडियोज़ देखिए और सोचिए कि आप अपनी माँ को बहन को या किसी को भी लेकर बाइक से जा रहे हैं और आपके देह पर एसडीएम की लाठी गिरने से पहले आपकी माँ या आपकी पत्नी अपने हाथों पर वह लाठी की चोट रोक ले रही है। कैसा लगता आपको! क्या करते आप!
                      मैं सैकड़ों पार्टियों के हज़ारों नेताओं को कुछ नहीं कहूँगा।
सत्ता की दलाली से पेट भरने वाले सभी अख़बारों के पत्रकारों को कुछ नहीं कहूँगा।
लेकिन लाइब्रेरी की किताबों और दस रुपये फ़ीस की बढ़ोत्तरी होने पर बवाल मचा देने वाले छात्र - नेताओं तुम तो 1975 की इमर्जेंसी के बाद पैदा हुए! तुम कैसे हिजड़े निकल गए?
एसडीएम का पे-बैंड 9300-34800 होता है और ठीक यही पे-बैंड भारत के किसी भी इंटर कॉलेज में पढ़ा रहे साधारण से मास्टर का भी होता है। इतनी ही औक़ात है एसडीएम अशोक चौधरी की।
               ऐ 1975 के बाद के लोगों! अगर ज़मीर जाग जाए तो जाओ ट्विटर पर और "एस. पी. बलिया" के पेज़ पर जाकर पूछो कि -
"बोलिए एसपी साहेब! किसी एसडीएम को सरेआम उसके चैम्बर में थप्पड़ मारने के लिए केतना दिन जेल में रहना पड़ता है..." ।

असित कुमार मिश्र
बलिया

Friday, August 14, 2020

मुक्ति-पर्व एक

मुक्ति-पर्व....

विज्ञापन - बाजार की दुनिया कहती है कि एक लेखक को सदैव इसी तरह के 'सस्पेंस' वाले भड़काऊ और अट्रैक्टिव शीर्षक देने चाहिए ताकि पाठकों को लगे कि लेखक की निज़ी ज़िंदगी में ज़रूर कुछ ऐसा दोष है, जिससे मुक्ति का नाम है - मुक्ति-पर्व।या कि उसने ऐसा कुछ 'मी-टू' टाइप पाप किया है जिसकी मुक्ति का पर्व है यह मुक्ति पर्व।
लेकिन मुक्ति से पहले उस बंधन के बारे में बताना ज़रूरी है, जिनसे मुक्त होना ही आज उत्सव है।
शास्त्रोक्ति भी कहती है कि परमात्मा को बताने से पूर्व आत्मा को बताना आवश्यक है, संन्यास को बताने से पूर्व गृहस्थ को बताना आवश्यक है, सत्य को बताने से पूर्व असत्य को या फिर अंधेरे को बताने से पूर्व उजाले को ही.... इस नित्य युगल का भी कहीं अंत है भला !
                       टेलीफ़ोनिक-वार्ता के इस वाक्य से ही इस विपत्ति का प्रारंभ हुआ था जब नायिका ने मनुहार किया था - "प्लीज़ एक बाइक खरीद लीजिए न! मुझे आपका साइकिल से आना-जाना अच्छा नहीं लगता"।
मैंने मूल इच्छा को समझना चाहा - देखिए! आपको मेरा साइकिल से चलना अच्छा नहीं लगता और मैं बाइक खरीद लूँ। यह दोनों दो अलग-अलग बातें हैं। मैं बिना बाइक खरीदे ही साइकिल चलाना छोड़ दूँ तो कैसा रहेगा?
अब उधर से तर्क की जगह भावना के तीर चले थे - मेरी उम्र की लड़कियों के सपने में उनका राजकुमार 'आॅडी' से नहीं तो कम से कम 'स्विफ़्ट डिज़ायर' से तो ज़रूर आता है, लेकिन मेरे सपने का राजकुमार एटलस गोल्डलाइन सुपर से...।
ना चाहते हुए भी मैं उत्तेजित हो गया था - यह पूँजीवादी विचार है। क्यों कोई राजकुमार आॅडी - फ़रारी से ही आएगा! क्या साइकिल से आने वाले का हृदय नहीं होता! चमचमाते 'हश-पपीज़' सैंडिल पहन कर आने वाले नायक ही प्रेम के पात्र हैं और कच्ची पगडंडियों पर धूल-धूसरित, बिवाईयों वाले पैरों के लिए प्रेम का दरवाज़ा बंद रहेगा? यह तो बाज़ारवाद है, प्रपञ्च है, प्रेम का अनादर है।
                      लेकिन भावनाओं को तर्क, शास्त्र, संवाद, भाषण आदि से नहीं जीता जा सकता है। बस यथार्थ में ही वह शक्ति है जो भावना को परास्त कर देती है।
मैंने समझाया - देखिए! जिस तेजी से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता घट रही है लोग आॅडी और स्विफ़्ट गाड़ियों को छोड़ कर साइकिल पर आ रहे हैं। लोग नये प्रकार के पतले अनाजों को छोड़कर मोटे अनाजों पर आ रहे हैं।शहरों को मन, वचन, क्रम से पकड़े हुए लोग, अब शहरों को छोड़ रहे हैं। छोड़ना ही होगा उन्हें। क्योंकि वही जीवन है वही सत्य है...
                         "पहले पकड़ तो लीजिए तब छोड़िएगा".... गुस्साई हुई इसी आवाज़ के साथ फोन कट गया था।
इस एक वाक्य ने चिंता और चिंतन दोनों में एक साथ डाल दिया। चिंतन इस बात का कि सत्य वास्तविक रूप में इतना ही कड़वा है। ऐसा बहुधा देखा गया है कि लोग आज़ादी के दिन पक्षियों को आज़ाद करते हैं ताकि वो आज़ादी का आनंद ले सके। लेकिन उसके पहले उसे कैद भी तो करते हैं!
पिछले साल एक प्रसिद्ध कामरेड मित्र का फोन आया था - असित भाई! विवाह - बंधन में बँध रहा हूँ। आपके आगमन की प्रतीक्षा रहेगी।
मैं चौंक गया था - लेकिन साथी आप तो हमेशा आज़ादी की बातें करते थे मैंने यू-ट्यूब चैनल्स पर अक्सर सुना है आपको।
साथी ने अट्टहास किया - भाई! पहले बँध तो जाने दीजिए तब न आज़ाद होऊँगा।
मतलब बँधना क्यों ताकि मुक्त हो सकें। बिना बँधे मुक्ति कैसी ! बिना पकड़े छोड़ना कैसा! मतलब पहले बाइक खरीद लें फिर उसे छोड़ कर साइकिल को पकड़ लें।
और चिंता इस बात की कि धन संग्रह को सदैव वणिक-वृत्ति मानता रहा। अतः न तो कोई फिक्स डिपॉजिट ही उपलब्ध था और न बचत खाते में इतने पैसे। हम उन प्रकार के लोगों में से हैं जिन्हें देख कर एलआईसी वाले लोग खुद रास्ते बदल लेते हैं।
तय हुआ कि अब बाइक खरीदनी है चाहे सब कुछ बेचना पड़े। और इस कार्य में सामने आए दोस्त-मित्र .... खरीदने में नहीं! बेचने में।
कोई फेफड़ों की अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में क़ीमतें बता रहा था तो किसी मित्र ने सलाह दी थी कि बस एक यकृत बेच दीजिए और मनपसंद बाइक ले लीजिए। कोई मित्र अखबार पढ़ कर सुनाने लगे कि परसों 'आई - फ़ोन' के लिए एक लड़के ने अपनी एक किडनी बेच दी।
एक मित्र बहुत देर से कुछ कहना चाह रहे थे। आखिरकार पास आए और फुसफुसाते हुए बोले - कुछ नहीं। असित भाई! बाइके न चाहिए! बस समझिए कि दुआर पर खड़ी हो गई है।
मैं हैरानी से उनके आत्मविश्वास की थाह लेने लगा।
उन्होंने समझाया - किडनी-फेफड़ा कुछ नहीं बेचना है। बस ब्लड...
मैंने तुरंत रोक लिया - भैया! सुई लगवाने से पहले खुद को तैयार करना पड़ता है। कमज़ोर हृदय का आदमी हूँ। ब्लड निकालने की बातें न कीजिये।
मित्रवर नाराज़ हुए - तुम्हारी यही कमी है। बात पूरी नहीं सुनते हो। जैसे आजकल ब्लड बेचा जा रहा है न! वैसे ही 'वो' भी बिक रहा है...।
मेरे मुँह से निकला - मैं समझा नहीं!
अच्छा! छोड़ो यह सब। ये बताओ "विक्की डोनर" फिल्म देखे हो कि नहीं!
उधर से जैसे ही फिल्म की स्टोरी समझाई गई वैसे ही मुझे एक बात समझ में आई कि - 'मनुष्य की अतृप्त इच्छाएँ ज्यों-ज्यों उठती जाएँगी, बाजार त्यों - त्यों गिरता जाएगा' ।
उस रात स्वप्न में विभिन्न प्रकार की देशी-विदेशी मोटर साइकिलें आतीं रहीं। मोटर साइकिल को लेकर कोई विशेष इच्छा नहीं रही कभी भी। पीछे से उठी हुई, बेतरह सीट और अनावश्यक रूप से मोटे-मोटे पहियों वाली मोटर साइकिलों से अरुचि ही हुई। किसी का पिक-अप बहुत तेज़ तो किसी की रफ़्तार बहुत तेज़... इन सबमें कभी से कोई दिलचस्पी नहीं।
जीवन में सामान्य चाल और स्वभाविक शैली की पक्षधरता औरों को भी पसंद आए, यह ज़रूरी नहीं फिर भी अपनी पसंद भी तो कुछ होती है।
                            अगले दिन हम कस्बे के मनीष आटोमोबाइल्स पर गए।वहाँ ग्राहकों की भीड़ और बाइक्स की अनुपलब्धता देख कर दु:ख भी हुआ कि इस दौड़ में मैं ही पीछे कैसे रह गया। विभिन्न जातियों, उपजातियों और वर्णों की बाइक देखीं और समझीं जाने लगीं।
तभी एक अनहोनी घटना हुई। एक लंबे-चौड़े वर्दीधारी महोदय ने आकर प्रणाम किया। दोनों कंधों पर 'यूपी पुलिस' खुदा हुआ था।
ये उस समय की बात है जब यूपी पुलिस से डर नहीं लगता था। बहुत हुआ तो पुलिसकर्मियों ने यदा-कदा मुँह से ही 'ठाँय-ठाँय' कर लिया। इसके अतिरिक्त उनसे और किसी बात का डर नहीं रहता था।
मैंने देखा कि अजित थे।अजित मेरे बैचमेट और विद्यार्थी होने के साथ-साथ पड़ोसी जिले में सौ नंबर में कार्यरत हैं।
मैंने डाँटा - अपने जिले में अनावश्यक वर्दी पहन कर क्यों घूम रहे हो?
अजित बोले - नहीं सर! ड्यूटी से सीधा यहीं आया हूँ और एक बाइक ख़रीद कर फिर ड्यूटी पर ही चला जाऊँगा।
मैंने नई बाइक की अग्रिम बधाई दी और लगे हाथ यह भी पूछ लिया कि कौन सी बाइक लोगे।
अजित ने कहा - देखते हैं सर! जो भी सस्ती और टिकाऊ हो क्योंकि किश्त पर लेना है।
हालांकि बात छोटी सी है, लेकिन खुशी हुई कि लड़का सौ नंबर में है और बाइक किश्तों पर ले रहा है वर्ना चाहता तो ट्रक या ट्रेन भी खरीद सकता था।
मैंने अपने साथ के मित्र उदित से कहा - भाई! किश्तों पर बाइक कैसे मिलती है पता कीजिए! देखिए कि इज्ज़त और उसूल को छोड़कर जमानत क्या रखा जा सकता है!
                     यूँ हम भी किश्तों पर ही खुशी के खरीदार बन बैठे। तब नहीं पता था कि किश्तों में मिली खुशियाँ और किश्तों में लिखी जाने वाली कहानियाँ बहुत दर्द देती हैं...।
तब नहीं पता था कि ये कमबख़्त किश्तें ही एक दिन हाथों में पुलिस की हथकड़ियाँ डलवाएंगी....
खैर! शेष अगली किश्तों में ही....

असित कुमार मिश्र
बलिया