Friday, August 21, 2020

बोलिए एसपी साहेब

बोलिए एस. पी. साहेब!....

भारतीय फ़िल्म इतिहास में 'गैंग्स आॅफ वासेपुर' का उतना ही महत्त्वपूर्ण स्थान है जितना नसबंदी किए गए लोगों के बीच इंदिरा जी का।
इसी फ़िल्म के एक सीन में सरदार खान ने रामाधीर सिंह के बेटे को, जो तत्कालिक विधायक भी हैं, उनको एस. पीए. आफ़िस में कूट दिया।
अज़ीब दृश्य है जब सरदार खान ने एस. पी. साहेब से पूछा है कि -  "एस. पी. साहेब! एक विधायक को सरेआम थाने में थप्पड़ मारने के लिए केतना दिन जेल में रहना पड़ता है"?
यह दृश्य मैं दोस्तों के साथ सिनेमाघर में देख रहा था। जैसे ही सरदार खान ने विधायक जी को थप्पड़ मारा वैसे ही सिनेमाघर सीटियों और चीख-चिल्लाहटों से गूँज उठा.... लेकिन मैं चुप रहा।
अगले सीन में बगल में खड़ा एक व्यक्ति बोल पड़ता है - अब तो एस. पी. साहेब हमहूँ जेल में जायेंगे ... और विधायक जी को वो भी एक थप्पड़ लगा देता है....।
इस सीन पर मैंने सीटियाँ बजाईं, खूब चिल्लाया....लेकिन पूरा सिनेमाघर चुप रहा।
                    कुछ देर बाद साथी उदित ने पूछा - भैया! कभी-कभी आप एकदम समझ में नहीं आते!
मैंने कहा - देखिए उदित! सरदार खनवां का थप्पड़ मारना प्रतिक्रिया मात्र है। अपने ज़माने के हिस्ट्रीशीटर रहे रामाधीर सिंह के बेटे को थप्पड़ मारना, एक नये-नये उभर रहे हिस्ट्रीशीटर सरदार खान की जवाबी कार्रवाई है यह! और कुछ भी नहीं।
लेकिन अगले सीन में एक आम आदमी की हिम्मत है। व्यवस्था के दुष्चक्र से ऊब चुका वह आदमी भले ही धीरे से विधायक को चपत लगाता है, लेकिन यह दृश्य इतना बताने के लिए काफ़ी है कि आम आदमियों को भी गुस्सा आता है। वो भी कभी-कभी अपने आत्म-सम्मान के लिए जेल जाने से नहीं हिचकता।
और लोकतंत्र की ताकत सरदार खान की प्रतिक्रिया में नहीं, उसी आम आदमी के द्वारा मारे जाने वाले थप्पड़ की आवाज़ में ज़िंदा है.... ।
छोड़िये भी ये सनीमा की बातें!
                बलिया जिला कभी क्रांतिकारी कहा जाता था। शायद इमर्जेंसी में इंदु जी ने ऐसी नसबंदी की, कि बलिया की आने वाली पीढ़ियों में भी मर्दाना ताकत की कमजोरी साफ़-साफ़ देखी जा सकती है।
इसी बलिया की एक तहसील बेल्थरा-रोड के एसडीएम हैं अशोक चौधरी।
सत्ता और कुर्सी का नशा इनकी बुढ़ौती पर अक्सर भारी पड़ने लगता है। कल ये अपने कार्यालय से अचानक निकले, हाथ में प्रशासनिक लाठी उठाई और आम जनता को लोकतंत्र का मतलब समझाने लगे।
उन्होंने दौड़ा-दौड़ा कर लोगों को मारा। फिर भी मन न भरने पर सड़क पर उतर आए और आते-जाते लोगों को पीटना शुरू किया।
भ्रष्ट तंत्र के अधिकारी अक्सर अंधे हो जाते हैं और इन्हें फिर नहीं दिखाई देता कि किसने मास्क लगाया है या नहीं!
इन्हें नहीं दिखाई देता कि जेईई की परीक्षा में माननीय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी - जिंदगी नहीं रुकती।
इन्हें नहीं दिखाई देता कि प्रधानमंत्री कह रहे हैं - हमें कोरोना के साथ जीना होगा।
इनको ये भी नहीं पता कि किसी भी तहसील में आम जनता के लिए ए. सी. नहीं लगा है कि कोई आराम करने आएगा।आम आदमी अगर सिस्टम में न फँसे तो किसी कोर्ट - कचहरी या तहसील में पेशाब भी न करने जाए!
                  इसी बीच सोशल मीडिया पर इनके करतूतों के विडियोज़ दौड़ने लगे और डी. एम. ने इनका स्थानांतरण किया। बाद में सरकार ने भी डैमेज़ कंट्रोल किया।
यह विडियोज़ देखिए और सोचिए कि आप अपनी माँ को बहन को या किसी को भी लेकर बाइक से जा रहे हैं और आपके देह पर एसडीएम की लाठी गिरने से पहले आपकी माँ या आपकी पत्नी अपने हाथों पर वह लाठी की चोट रोक ले रही है। कैसा लगता आपको! क्या करते आप!
                      मैं सैकड़ों पार्टियों के हज़ारों नेताओं को कुछ नहीं कहूँगा।
सत्ता की दलाली से पेट भरने वाले सभी अख़बारों के पत्रकारों को कुछ नहीं कहूँगा।
लेकिन लाइब्रेरी की किताबों और दस रुपये फ़ीस की बढ़ोत्तरी होने पर बवाल मचा देने वाले छात्र - नेताओं तुम तो 1975 की इमर्जेंसी के बाद पैदा हुए! तुम कैसे हिजड़े निकल गए?
एसडीएम का पे-बैंड 9300-34800 होता है और ठीक यही पे-बैंड भारत के किसी भी इंटर कॉलेज में पढ़ा रहे साधारण से मास्टर का भी होता है। इतनी ही औक़ात है एसडीएम अशोक चौधरी की।
               ऐ 1975 के बाद के लोगों! अगर ज़मीर जाग जाए तो जाओ ट्विटर पर और "एस. पी. बलिया" के पेज़ पर जाकर पूछो कि -
"बोलिए एसपी साहेब! किसी एसडीएम को सरेआम उसके चैम्बर में थप्पड़ मारने के लिए केतना दिन जेल में रहना पड़ता है..." ।

असित कुमार मिश्र
बलिया

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