Thursday, August 31, 2023

हम चरागों

हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं....

कल की शाम यकीनन बेहद ख़राब गुज़री और मेरी तक़दीर में लिखा है कि फिर सुब्ह भी ख़राब ही होगी।
तफ़सील से कहूँ तो कल के शाम की शुरुआत कल से ही नहीं हुई थी। जहाँ तक याद है, वो गर्मियों के बेहद उमस भरे दिन थे। साथी डॉ. आनंद ने कहा था कि चलिए भैय्या! कहीं घूम आया जाए! 
यूँ तो हम घूमने के इरादे से झारखंड आए थे और घूमना ही छोड़ कर सब कुछ हो रहा था।
हम पैदल टहलते हुए विवेकानंद चौक पर पहुँचे। वहाँ किसिम - किसिम के अनाजों को भून कर गर्मागर्म भूजा खिलाने वाले धनीराम जी की लोकप्रिय दुकान थी। दुकान क्या थी! किसी बेवा की साड़ी थी। जिस पर पैबंद लगाते - लगाते अब साड़ी का ही पता नहीं चल रहा था। हालांकि डॉ. आनंद ने कहा था - देखिए भैय्या ! स्वरोजगार इसे कहते हैं। हमारी तरह बी. एड्. /पी0-एच0डी0 होता तो आज बेरोज़गार होता।
मैंने धनीराम जी की ओर देखा तो बेसाख़्ता बिना मुस्कुराए न रह सका - आग की तपिश में झुलसा साँवला सा चेहरा। दरमयाना कद। आम सी शक्ल-ओ-सूरत का एक आम आदमी। लेकिन उन्होंने जो शर्ट पहन रखी थी उस पर पाँच - पाँच सौ के नोटों के साथ दो - दो हज़ार के नोट भी छपे थे। एक झटके में कहें तो कुछ एक - आध लाख रुपये तो वो बदन पर चिपकाए घूम रहे थे। 
मैंने हँसी के लिए पूछा - धनीराम जी! ये शर्ट कहाँ से खरीदा। एक मुझे भी चाहिए था। 
उन्होंने भी हँसते हुए खोरठा भाषा में जो जवाब दिया उसका मतलब था कि ये शर्ट उनकी पत्नी ने उन्हें गिफ्ट दिया है जो सामने सिलवट पर चटनी पीस रही थी। 
अब मैंने उस ग्रामीण औरत को देखा। साड़ी के आँचल को सिर पर से लपेट कर मद्धम स्वर में कोई गीत गा रही थी जिसकी भाषा खोरठा होने के कारण मुझे समझ में तो नहीं आया लेकिन रस जरुर समझ में आया - वही जिसे भवभूति ने कहा है - एको रस:करुणैव... ।
मेरी क्षेत्रीय भाषा भोजपुरी है, और यहाँ साथ काम करने वालों के बीच मुझे क्षेत्रीय भाषा को लेकर बहुत दिक्कतें आती थीं।
फिर क्या! मैंने रात - दिन मेहनत किया। लगातार पंद्रह दिनों तक...और तब जाकर मेरे सहकर्मी लोग आज भोजपुरी बोल पाते हैं। हालांकि मेरा काम था- "खोरठा भाषा और साहित्य का अध्ययन" ।
मैंने धनीराम जी से कहा - आपको पता है दो हज़ार के नोट सरकार वापस ले रही है। आपको भी यह शर्ट बैंक में जमा करना होगा। 
भूजा भूनते हुए उनके हाथ लरज गये। लेकिन जवाब में जब उन्होंने कुछ कहा नहीं तो मैंने भी उनकी दुकान के पास बज रहे फिल्मी गीत पर ध्यान केन्द्रित किया - "गर्मी - ए - हसरत - ए नाकाम से जल जाते हैं। हम चरागों की तरह शाम से जल जाते हैं" ।
2002 के बाद जवान हुई पीढ़ी को यह यकीन दिलाना ठीक वैसे ही मुश्किल है कि "राज़" फिल्म से पहले भी यह गज़ल अदब में पाई जाती थी, जैसे 2014 के बाद आज़ाद हुई पीढ़ी को यह यकीन दिलाना कि हम कांग्रेस से नहीं अंगरेज़ों से आज़ाद हुये थे। कतील शिफ़ाई की यह ग़ज़ल बेशक उनकी सभी ग़ज़लों पर तब भारी पड़ गई जब राज़ फिल्म की नायिका ने बड़े मादक अंदाज़ में इसे फिल्म में पढ़ा था। ठीक वैसे ही जैसे आज लोकतंत्र का मतलब बड़े मादक अंदाज़ में पढ़ा जा रहा है। 
हालांकि न तो मैंने पहली दफ़ा इस ग़ज़ल को सुना था और न ही वो फिल्म वाली  लड़की पहली दफे कतील शिफ़ाई की इस ग़ज़ल के चंद शे'रों को दुहरा रही होगी।
फिर भी उस समय मेरे मन में न जाने क्यों आया कि मैंने मोबाइल निकाला और जियो - ट्यून में से सर्च करके' शोभा गूर्टू' की आवाज़ में इसी ग़ज़ल को यूँ सेट कर दिया कि कोई फोन करे तो रिंग की जगह उसे यही शे'र सुनाई दे।
उस दिन और कोई कयायत नहीं गुज़री। शाम का क्या! वो तो रोज़ की ढलनी ही थी। 
अगले दिन ही डॉ. आनंद मेरे कमरे में आए और बोले - भैय्या ! एक बात कहूँ! अपने मोबाइल में से ये सड़ा हुआ काॅलर ट्यून हटा दीजिए। 
मैं हैरान रह गया। आनंद उसी लखनऊ का है, जहाँ की पहचान अदब, तहज़ीब और नफ़ासत से थी। 
मैं डाँटने की वाला था फिर ख़्याल आया कि यह व्यक्तिगत रुचि की बात भी तो हो सकती है! क्योंकि डॉ. आनंद की योग्यता में संदेह नहीं। विद्वान होने के साथ - साथ तेज़ भी है। अभी केंद्रीय विद्यालय की टीजीटी और पीजीटी दोनों में चयनित हुआ था लेकिन मुझे छोड़ कर जाना नहीं चाहता।
                      खैर! जो कयामत आनी थी कल आई। शाम को बड़े दिनों बाद हम विवेकानंद चौक की तरफ घूमने गये। धनीराम जी वहाँ न दिखे, न उनकी वो खूबसूरत दुकान ही वहाँ थी, जिसकी फटी हुई छत से हम तारों - सितारों को बखूबी गिन सकते थे। हाँ! लुढ़कती हुई सी सिल पड़ी थी जिसके चटकार स्वाद में कैद होकर न जाने कितने लोगों ने घंटे भर इंतज़ार किया होगा कि अब भूजे के साथ चटनी मिलेगी। 
मैंने बगल की दुकान से धनीराम जी के बारे में पता किया तो मालूम हुआ कि उनकी दुकान रेल विभाग द्वारा बनाये जा रहे ओवर-ब्रिज के रास्ते में आती थी। इसलिये उनकी दुकान हटा दी गई। 
                दुकान के ध्वंसावशेषों को देखते हुए जाने क्यों मुझे लगा जैसे कोई औरत साड़ी के आँचल को सिर पर ओढ़े हुए आ रही है।मेरे बगल से निकल कर औंधी पड़ी सिल को ठीक करती है और फिर उस पर चटनी पीसने लगी है... कंठ से ठीक वही दर्द भरा गीत फूट पड़ता है। लेकिन आज खोरठा न समझते हुए भी मैं साफ़-साफ़ समझ पा रहा हूँ... जैसे किसी ने कतील शिफ़ाई की ग़ज़ल का मिसरा उठा दिया हो... गर्मी - ए- हसरत-ए- नाकाम से जल जाते हैं...।फिर किस बेखुदी में मैं कमरे तक आया, मुझे याद नहीं। 
                    आज की सुब्ह हर साल की तरह सबसे पहले आगरे से आशु चौधरी दीदी का फोन आया। मैंने डरते-डरते फोन उठाया।हे ईश्वर! कुछ गलत न सुनना पड़े! 
उन्होंने कहा - जब काॅलर - ट्यून अच्छी हो तो फोन थोड़ा देर से उठाना चाहिए। रक्षाबंधन की शुभकामना असित!
                    न चाहते हुए भी 'काॅलर ट्यून' की बात आने से मुझे फिर धनीराम जी याद आए। उनकी शर्ट, उनकी दुकान और उस बदनसीब सिल की भी याद आ गई, जिसके एक किनारे बैठ कर चटनी पीसती वो साँवली युवती एकदम कतील शिफ़ाई की ग़ज़ल जैसी थी। 
हालांकि अब वहाँ मोटा सा पिलर बन गया है और उस पर सर्च लाइट लगा दी गई है जिससे इस कस्बे में रौनक आ गई है लेकिन मुझे ये उजाला जैसे तवायफ़ के कोठे से आती रोशनी की तरह चुभता है। जिसमें रौनकें तो हैं लेकिन सूकून नहीं।उजाला तो है लेकिन इस उजाले का कोई भविष्य नहीं.... ।

असित कुमार मिश्र 
बलिया 



                    




Friday, August 25, 2023

नोटिस

नोटिस 

याद रखें कि कल से नया फेसबुक नियम (नया नाम मेटा) शुरू हो रहा है। मत भूलो कि कि अंतिम तिथि आज है!!!!
मैं असित कुमार मिश्र फेसबुक और उसके नये नाम मेटा को अपने सारे फोटोज़, लेख, टिप्पणियों, यहाँ हुए समस्त लड़ाई-झगड़ों, राजनीतिक वाद-विवादों को उसके व्यक्तिगत इस्तेमाल की इज़ाज़त नि:शुक्ल और नि:संकोच देता हूँ।
बन जाओ असित कुमार मिश्र और जी लो ससुर मेरी ज़िन्दगी। चार दिन में बुद्धि न खुल जाए तो कहना! 
अब तक लोग समझ गये होंगे कि आख़िर में मैंने भी फेसबुक को नोटिस भेज ही दिया। 
              हालांकि फेसबुक पर जीने - मरने वाले लोग जानते हैं कि, फेसबुक की दुनिया में कुछ पोस्ट कालजयी हैं। मतलब हर काल में जीने वाले। उन्हें एक बार स्पर्श कर लो बस! वो अपनी गति से दौड़ने लगते हैं।               जैसे- रिक्शे पर अख़बार पढ़ता हुआ अर्थशास्त्र में एम. ए. (गोल्डमेडलिस्ट) और नेट उत्तीर्ण एक लड़का जो रिक्शा चलाकर अपनी पढ़ाई का खर्च निकालता है। 
यह फेसबुक पर एक ज़माने में सबसे वायरल पोस्ट थी। इसे शेयर करने वालों ने एक बार भी नहीं सोचा कि नेट का मतलब क्या है! इस योग्य लड़के के दिमाग़ में यह क्यों नहीं आया कि इस अथाह शारीरिक श्रम की अपेक्षा किसी स्कूल-कालेज़ में पढ़ा कर या ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च निकाल सकता है और बची हुई एनर्जी से अपनी तैयारी भी समुचित कर सकता है! 
दूसरी एक और वायरल पोस्ट है जिसमें सब्जी बेचने वाले एक आदमी ने अपनी बेटी को डाक्टर बना दिया है। जो अब तक सेवानिवृत्त हो चुकी होंगी और एन. पी. एस. योजना के तहत हज़ार - दो हज़ार पेंशन भी पा रही होंगी। लेकिन उनके बचपन की फोटो कब तक दौड़ती रहेगी यह ठीक - ठीक पता नहीं। 
एक और पोस्ट थी अत्यंत व्यापक - नार्वे में एक रेस्तरां है जहाँ काॅफ़ी पीने वाले लोग एक कप काॅफ़ी पीकर दो कप का मूल्य देते हैं ताकि कोई और ज़रूरतमंद व्यक्ति भी आकर सम्मान के साथ पी सके। 
हालांकि कुली लाइंस के लेखक प्रवीण झा ने बताया भी कि यहाँ ऐसा कोई रेस्तरां नहीं है। फिर भी अपने पाठकों से मैं जानना चाहता था कि आप में से कोई ऐसा है क्या जो एक कप चाय पीकर दो कप का पैसा जमा कर देता हो? एक किलो सब्जी खरीद कर दुकानदार से बोलता हो कि भाई! दो किलो का पैसा काट लो और कोई जरूरतमंद आए तो उसे दे देना। एक शर्ट - पैंट खरीद कर, दो शर्ट या पैंट का पेमेंट किया है क्या आपने यह सोचकर कि किसी दिन कोई जरूरतमंद आएगा तो ले जाएगा? 
अलग से आर्थिक सहायता या किसी चीज़ के लिए चंदा जुटाना दूसरी बात है। मैं उसकी बात नहीं कर रहा। 
तो नार्वे हो या जिम्बाब्वे वहाँ ऐसा होता होगा! आपको यकीन है क्या! 
                      यह तो फेसबुक की बात हुई। लेकिन जब फेसबुक नहीं था तब भी ऐसे तमाम किस्से और पोस्ट वायरल होते थे। नब्बे के दशक में काम भर की जवान हुई पीढ़ी को याद होगा कि उस समय पीले या हरे रंग के अख़बार कागज़ पर किसी गुमनाम प्रेस से एक पर्चा छपता था कि राजस्थान के एक आदमी को सपने में नाग देवता आए और उन्होंने कहा कि इस पर्चे को पाँच सौ लोगों में छपवा कर बँटवाओ। फलवना ने नहीं छपवाया तो उसकी माँ मर गयी और चिलवना ने छपवा कर बाँट दिया तो उसे यूपी में मास्टरी की नौकरी मिल गई। 
उस दौर में अच्छे-अच्छे लोगों ने गुमनाम छापेखानों से वो पर्चे छपवाये। उस समय फेसबुक नहीं था न ही इसका नया वर्जन मेटा था तब भी सबसे ज्यादा वायरल पोस्ट यही थी। ऐसा नहीं है कि उस समय कम पढ़े-लिखे लोग थे लेकिन हम परंपरावादी लोग हैं न! और क्या जाता है सौ - पचास पर्चे छपवा ही देने से। समझ लेंगे कि सौ रुपये जेब से गिर गये। ऐसे लोगों में तब भी विद्यार्थी थे, अध्यापक थे, प्रोफ़ेसर्स थे, वकील थे... ।
                    आज चंद्रमा पर हमारे पहुँच जाने के बाद भी गौर कीजिये कि हम आज भी वहीं हैं कि नहीं? दो - तीन से हम फेसबुक को फेसबुक पर "नोटिस" भेज रहे हैं। भेजने वालों में वही विद्यार्थी हैं, अध्यापक हैं, प्रोफ़ेसर हैं, संपादक हैं... यहाँ तक तो फिर भी ठीक था। आज मित्र-सूची में शामिल एक वकील साहब ने भी बिना टिकट और बिना नोटरी अधिकारी के मुहर /हस्ताक्षर के यह 'नोटिस' फेसबुक को खींच मारी है। फेसबुक का मालिक भी हँस रहा होगा कि जिस देश में एल. एल. बी. की डिग्री इतनी सस्ती है कि बी. एड्. बेरोज़गारों से ज्यादा एल. एल. बी. बेरोज़गर हों, वहाँ से भी न्यायायिक /गैर न्यायायिक नोटिस फेसबुक पर भेजी जा रही है। कमबख्त फेसबुक का वकील हमारे सम्मन की तामील करते-करते ही खून फेंक देगा। 
             तो साथियों रुकना नहीं है। बस कल भर का ही समय है। फेसबुक और उसके नये वर्जन मेटा को यह नोटिस जारी करते रहना है। भले मेटा साल भर पुराना हो गया हो! लेकिन याद रहे कल ही आख़िरी डेट है। कल के बाद फेसबुक आपकी सारी वो गुप्त जानकारियाँ बेच देगा, जिसे कोई भी अप्लिकेशन डाउनलोड करते हुए आपने पहले दिन ही "एलाउ" कर दिया था। 
                    इस पोस्ट को काॅपी-पेस्ट अवश्य करें। यूपी के एक रिटायर्ड मास्टर ने इसे कापी पेस्ट किया तो उसे पुरानी पेंशन मिलने लगी और अजमेर के एक आदमी ने इग्नोर किया तो.... याद आयी नब्बे के दशक की धमकी! 
नोटिस के साथ-साथ प्रणाम भी स्वीकारें। 

असित कुमार मिश्र 
बलिया 


Saturday, August 19, 2023

शोध पत्र

शोध विषय :- "स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक हिन्दी उपन्यासों का सामाजिक यथार्थ"
(संदर्भ :सन् 1950 से 1975 तक) 
समस्या जिसका अध्ययन किया जाएगा:- 
 प्रस्तावित शोध की मुख्य समस्या स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक हिन्दी उपन्यासों में (सन 1950 से लेकर 1975 तक के ) पूर्वांचल पर आधारित उपन्यासों का अध्ययन करना तथा देखना कि उपरोक्त समय में पूर्वांचल तथा पूर्वांचल के समाज की वर्तमान समय से किस प्रकार की भिन्नता है जिससे पूर्वांचल के संपूर्ण समाज एवं संस्कृति को समझा जा सके। पूर्व में पूर्वांचल पर आधारित उपन्यासों का तथा इससे संबंधित अध्ययन अवश्य किया गया है, परंतु समाजशास्त्रीय आधार पर इन उपन्यासों का उल्लेख कहीं नहीं है। मैं समझता हूँ कि पूर्वांचल के समाज, संस्कृति और साहित्य को संपूर्ण रूप से समझने के लिए यह आवश्यक है कि उन प्रत्येक पहलुओं को समझा जाए जिन्होंने इसके निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस आधार पर पूर्वांचल आधारित उपन्यासों और इसका संपूर्ण समाजशास्त्र सदैव एक महत्त्वपूर्ण पहलू रहा है जिसकी भूमिका निसंदेह महनीय है तथा जिसकी उपेक्षा निश्चित ही हमारे ज्ञान हेतु अलाभकारी होगी। हिंदी उपन्यास मैला आँचल (फणीश्वर नाथ रेणु), बलचनमा (नागार्जुन) आधा गाँव (राही मासूम रजा) इत्यादि में हमें आंचलिकता तथा तत्कालीन समाज का चित्रण भलीभांति मिलता है। यथा - 'मैला आँचल' की भूमिका में रेणु कहते हैं - "इसमें फूल भी है,शूल भी है, धूल भी है, गुलाब भी है और कीचड़ भी है, मैं किसी से दामन बचाकर निकल नहीं पाया" ।
                अतः यह आवश्यक है कि परिवर्तन की इस पूरी प्रक्रिया तथा परिणाम को संपूर्णता के साथ समझा जाए क्योंकि पूर्वांचल का क्षेत्र समाज और साहित्य एक दूसरे पर परस्पर निर्भर हैं। सभी ने एक दूसरे के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यहाँ पूर्वांचल का समाज एक नए रूप में आया है। 
प्रस्तुत शोध के क्रम में समाजशास्त्र के विविध संदर्भ का अध्ययन करते हुए साहित्य में योगदान को समझने का प्रयत्न किया जाएगा तथा अधोलिखित प्रश्नों पर प्रकाश डाला जाएगा- 

1-चयनित उपन्यासों में चित्रित जीवनगत समस्याएँ क्या हैं? पूर्वांचल में ग्रामीण एवं शहरी जीवन के स्वरूप में किस तरह परिवर्तन आया है?

2- चयनित उपन्यासों जैसे बलचनमा और पुरुष पुराण आदि में समाज और संस्कृति की क्या उपादेयता है?
3- विभिन्न लेखकों की वैचारिकी और युगीन चेतना ने चयनित कृतियों और लेखकों को कैसे और कितना प्रभावित किया है?

4 चयनित उपन्यास वर्तमान समय  में किस रूप में प्रासंगिक हैं उपन्यासों की प्रखर अभिव्यक्ति में उनके कलात्मक पक्ष का कितना योगदान  है?
*अध्ययन का औचित्य* - स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक हिंदी उपन्यासों पर पूर्व में कार्य हो चुके हैं किंतु "स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक हिंदी उपन्यासों का सामाजिक यथार्थ" स्वयं में नवीन कार्य है। जिसमें शोध की अपार संभावना विद्यमान है। साहित्य में सामाजिक यथार्थ और सामाजिक संबंधों की समग्रता जनता के सामाजिक संघर्ष और इतिहास प्रक्रिया की दशा का चित्रण करके रचनाकार जनता का यथार्थ विकसित करता है जिससे जनता की चेतना तीव्र और जागृत होती है। चेतना के जागरण का अर्थ है अपनी मानसिकता सामाजिकता का बोध। और जागृत सामाजिक चेतना ही आगे चलकर परिवर्तनकारी चेतना बनती है।

(क) साहित्य के सामाजिक सरोकारों को देखते हुए भारतीय समाज के विकास की समस्याओं का अध्ययन करना तथा साहित्य के समाजशास्त्र को समझना अपेक्षित प्रतीत होता है क्योंकि जैसे-जैसे समाज में परिवर्तन होता है वैसे-वैसे साहित्य में भी परिवर्तन होता चलता है तथा साहित्यिक प्रवृत्तियाँ बदलती रहती हैं। 

(ख) साहित्य-अभिव्यंजना का सबसे सशक्त साधन है - उपन्यास। उपन्यास जीवन की सशक्त व्याख्या करता है। यह जन-जीवन का महाकाव्य है। उपन्यास मानव के यथार्थ जीवन के सबसे अधिक निकट होता है।अतः तत्कालीन समाज के यथार्थ जीवन, सामाजिक मूल्यों तथा स्थापनाओं को उद्घाटित करना हो तो उपन्यासों का अध्ययन एक सशक्त माध्यम हो सकता है।

(ग) कोई भी विशेष भू-भाग जिसकी अपनी एक संस्कृति हो, अपनी एक भाषा हो, अपनी समस्याएँ हों, संक्षेप में सामान्य देश भी जहाँ किसी विशेषता का आदेश दे- अंचल कहलाता है। जबकि आंचलिकता व्यक्ति की नवीन वृत्तियों का प्रतिफल है अतः आंचलिकता आंतरिक मूल्यों की गुणवत्ता है जो अंचल के प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक वातावरण की ही देन होती है ।
    समग्र रूप में कहा जा सकता है कि आंचलिक जीवन के यथार्थ का अध्ययन भारतीय जनमानस की आत्मा का अध्ययन है जिससे भारतीय संस्कृति, संस्कार एवं जीवन-मूल्यों को अधिक गंभीरता से समझा जा सकता है। शोध की दृष्टि से पर्याप्त सामग्री उपलब्ध होने के बावजूद "स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक हिंदी उपन्यासों का सामाजिक यथार्थ" (संदर्भ :सन् 1950 से 1975 तक) विषय पर कोई शोध-कार्य नहीं हुआ है।

*पूर्व में हुए शोध कार्य-*
 स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक (पूर्वांचल) हिंदी उपन्यासों पर हुए दो शोध-कार्य की जानकारी शोधगंगा द्वारा प्राप्त हुई है-

1. पूर्वांचल के आंचलिक उपन्यासों का विषय एवं शिल्पगत विवेचन : श्रीमती नीलमणि सिंह, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, वर्ष 2017

२. पूर्वांचल के आंचलिक कहानीकार समीक्षात्मक अध्ययन :  दिव्या सिंह, वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, वर्ष 2009

*शोध की मौलिकता-*

स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक साहित्य में सामाजिक यथार्थ विशेष जानकारी एकत्र करने के क्रम में इस बात की जानकारी हुई है कि पूर्व में आंचलिक उपन्यासों के विषय तथा शिल्पगत विवेचन पर प्रकाश डाला गया है किंतु "स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक उपन्यास का सामाजिक यथार्थ" विषय पर कार्य का अत्यंत अभाव मिला। प्रस्तुत शोध- कार्य एक नवीन अध्ययन है, जिससे तत्कालीन समाज का अध्ययन समग्र रूप में किया जा सकता है। ऐसा मेरा प्रयास रहेगा।

*मीमांसात्मक सिद्धांत-*

साहित्य की सामाजिकता का सिद्धांत हिंदी साहित्य के समालोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी जी ने लिखा है- 'साहित्य जीवन की पुनर्रचना है और आलोचना इस पुनर्रचना की पुनर्रचना है इसी के आधार पर स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक हिन्दी उपन्यासों का सामाजिक यथार्थ (संदर्भ : सन 1950 से सन 1975 ई. तक) का चित्रण कहाँ तक हुआ है? इसका अध्ययन शोध-विषय के अंतर्गत करने का प्रयास किया जाएगा।

*परिकल्पना* - प्रायः सभी आंचलिक उपन्यासकारों ने स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक हिंदी उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ की परिकल्पना प्रस्तुत की है। 

*अध्ययन की प्रविधि* - उपरियुक्त शोध-विषय का अध्ययन निम्नांकित प्रविधियों से किया जा सकेगा:-
(1)मार्क्सवादी प्रविधि - स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक हिंदी उपन्यासों के ग्रामीण समाज में वर्ग संघर्ष, वर्ग वैमनस्य और वर्ग भेद आदि का अध्ययन इसी प्रविधि से किया जाएगा। 
(2) तुलनात्मक प्रविधि -स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक हिंदी उपन्यासों में व्यक्त भारतीय ग्रामीण समाजों की तुलना और अन्यान्य पत्र - पत्रिकाओं में व्यक्त आंचलिक समाज की तुलना में तुलनात्मक प्रविधि का प्रयोग अपेक्षित होगा। 
(3) ऐतिहासिक प्रविधि - स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक हिंदी उपन्यासों में व्यक्त ग्रामीण जीवन के इतिहास, सामाजिक स्थिति और विकास आदि का आकलन कर बदलाव की माँग और संभावनाओं का अध्ययन ऐतिहासिक प्रविधि से किया जाएगा। 
*अध्ययन के स्रोत* - 
(क) प्राथमिक स्रोत - इसके अंतर्गत 1950 से 1975 तक के निम्नांकित स्वातंत्र्योत्तर आंचलिक हिंदी उपन्यासों को आधार बनाया जाएगा - 
(1) बलचनमा, नागार्जुन (1952), वाणी प्रकाशन नई दिल्ली 
(2) मैला आँचल, फणीश्वरनाथ रेणु (1954), राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली 
(3) आधा गाँव, राही मासूम रजा (1966), राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली 
(4) राग दरबारी, श्रीलाल शुक्ल (1968)राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली 
(5) पुरुष पुराण, डॉ. विवेकी राय (1975) अनुराग प्रकाशन वाराणसी 
(ख) *द्वितीयक स्त्रोत * - द्वितीयक स्त्रोत के अंतर्गत समीक्षात्मक ग्रंथ, अन्य संबंधित शोध-प्रबंध, शोध- आलेख तथा पत्र - पत्रिकाओं का आधार ग्रहण किया जाएगा। 
अध्यायों का वर्गीकरण :

अध्याय विभाजन

प्रस्तावना

अध्याय एक: सामाजिक यथार्थ : एक अध्ययन

1.1 समाज का साहित्य से अन्तर्सम्बन्ध

1.2 रचनाकार समाज और रचनाएँ
13 साहित्य का समाजशास्त्रीय अध्ययन

अध्याय दो : हिंदी आँचलिक उपन्यास : एक संक्षिप्त परिचय

2.1 प्रेमचन्द पूर्व, प्रेमचन्द युगीन, प्रेमचंदोत्तर युगीन उपन्यास और उपन्यासकार

2.2 आँचलिकता : एक परिदृश्य

2.3 हिंदी के आँचलिक उपन्यासों का उद्भव और विकास

अध्याय तीन : स्वतंत्रता से पूर्व हिन्दी आँचलिक उपन्यासों का सामाजिक / सांस्कृति यथार्थः अध्ययन

3.1 पूर्वांचल का सामाजिक अध्ययन

3.2 मध्यवर्गीय चेतना

3:3 आंचलिक उपन्यासों में ग्राम

3.4 आंचलिकता की पहचान

अध्याय चार : स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यासों के सामाजिक यथार्थ के विविध आयाम

4.1 सामाजिक आधार

4.2 सांस्कृतिक आधार

4.3 राजनीतिक आधार

4.4 आर्थिक आधार

अध्याय पाँच : स्वातंत्र्योत्तर हिंदी आंचलिक उपन्यासों का कलात्मक अध्ययन

5.1 कथानक का आधार
5.2 भाषा - शैली
5.3 बिम्ब और प्रतीक
5.4 अन्य प्रयोग

*संदर्भ ग्रंथ-सूची*
 मौलिक ग्रंथ 
1. बलचनमा - नागार्जुन (1952),वाणी प्रकाशन नई दिल्ली 
2.मैला आँचल - फणीश्वरनाथ रेणु (1954) ,राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली 
3. आधा गाँव - राही मासूम रजा (1966), राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली 
4.राग दरबारी - श्रीलाल शुक्ल (1968),राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली 
5.पुरुष पुराण - डा. विवेकी राय (1975),अनुराग प्रकाशन वाराणसी 
*समीक्षात्मक ग्रंथ - इनका समीक्षात्मक आधार लिया जाएगा। 
1.साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका :मैनेजर पाण्डेय, हरियाणा साहित्य अकादमी, चण्डीगढ़ 
2. साहित्य का समाजशास्त्रीय चिंतन : निर्मला जैन 
3. साहित्य का उत्तर समाजशास्त्र : डा. सुधीश पचौरी 
4. साहित्य और समाजशास्त्रीय दृष्टि : मैनेजर पाण्डेय 
5. साहित्य का समाजशास्त्र :डा. नगेन्द्र 
6. हिन्दी के आंचलिक उपन्यास और उनकी शिल्प विधि :डा. आदर्श सक्सेना 
7. स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी उपन्यास एक सर्वेक्षण :महेन्द्र चतुर्वेदी 
8. आंचलिक उपन्यास ग्रामीण मध्य वर्ग :हजारीप्रसाद द्विवेदी 
9. आंचलिकता और आधुनिक परिवेश कल्पना :शिव प्रसाद सिंह 
10. हिन्दी के आंचलिक उपन्यास :प्रकाश वाजपेयी 
11.शास्त्रीय समीक्षा के सिद्धांत :डॉ. त्रिगुणायत 
आंचलिक उपन्यास