Friday, August 25, 2023

नोटिस

नोटिस 

याद रखें कि कल से नया फेसबुक नियम (नया नाम मेटा) शुरू हो रहा है। मत भूलो कि कि अंतिम तिथि आज है!!!!
मैं असित कुमार मिश्र फेसबुक और उसके नये नाम मेटा को अपने सारे फोटोज़, लेख, टिप्पणियों, यहाँ हुए समस्त लड़ाई-झगड़ों, राजनीतिक वाद-विवादों को उसके व्यक्तिगत इस्तेमाल की इज़ाज़त नि:शुक्ल और नि:संकोच देता हूँ।
बन जाओ असित कुमार मिश्र और जी लो ससुर मेरी ज़िन्दगी। चार दिन में बुद्धि न खुल जाए तो कहना! 
अब तक लोग समझ गये होंगे कि आख़िर में मैंने भी फेसबुक को नोटिस भेज ही दिया। 
              हालांकि फेसबुक पर जीने - मरने वाले लोग जानते हैं कि, फेसबुक की दुनिया में कुछ पोस्ट कालजयी हैं। मतलब हर काल में जीने वाले। उन्हें एक बार स्पर्श कर लो बस! वो अपनी गति से दौड़ने लगते हैं।               जैसे- रिक्शे पर अख़बार पढ़ता हुआ अर्थशास्त्र में एम. ए. (गोल्डमेडलिस्ट) और नेट उत्तीर्ण एक लड़का जो रिक्शा चलाकर अपनी पढ़ाई का खर्च निकालता है। 
यह फेसबुक पर एक ज़माने में सबसे वायरल पोस्ट थी। इसे शेयर करने वालों ने एक बार भी नहीं सोचा कि नेट का मतलब क्या है! इस योग्य लड़के के दिमाग़ में यह क्यों नहीं आया कि इस अथाह शारीरिक श्रम की अपेक्षा किसी स्कूल-कालेज़ में पढ़ा कर या ट्यूशन पढ़ाकर अपना खर्च निकाल सकता है और बची हुई एनर्जी से अपनी तैयारी भी समुचित कर सकता है! 
दूसरी एक और वायरल पोस्ट है जिसमें सब्जी बेचने वाले एक आदमी ने अपनी बेटी को डाक्टर बना दिया है। जो अब तक सेवानिवृत्त हो चुकी होंगी और एन. पी. एस. योजना के तहत हज़ार - दो हज़ार पेंशन भी पा रही होंगी। लेकिन उनके बचपन की फोटो कब तक दौड़ती रहेगी यह ठीक - ठीक पता नहीं। 
एक और पोस्ट थी अत्यंत व्यापक - नार्वे में एक रेस्तरां है जहाँ काॅफ़ी पीने वाले लोग एक कप काॅफ़ी पीकर दो कप का मूल्य देते हैं ताकि कोई और ज़रूरतमंद व्यक्ति भी आकर सम्मान के साथ पी सके। 
हालांकि कुली लाइंस के लेखक प्रवीण झा ने बताया भी कि यहाँ ऐसा कोई रेस्तरां नहीं है। फिर भी अपने पाठकों से मैं जानना चाहता था कि आप में से कोई ऐसा है क्या जो एक कप चाय पीकर दो कप का पैसा जमा कर देता हो? एक किलो सब्जी खरीद कर दुकानदार से बोलता हो कि भाई! दो किलो का पैसा काट लो और कोई जरूरतमंद आए तो उसे दे देना। एक शर्ट - पैंट खरीद कर, दो शर्ट या पैंट का पेमेंट किया है क्या आपने यह सोचकर कि किसी दिन कोई जरूरतमंद आएगा तो ले जाएगा? 
अलग से आर्थिक सहायता या किसी चीज़ के लिए चंदा जुटाना दूसरी बात है। मैं उसकी बात नहीं कर रहा। 
तो नार्वे हो या जिम्बाब्वे वहाँ ऐसा होता होगा! आपको यकीन है क्या! 
                      यह तो फेसबुक की बात हुई। लेकिन जब फेसबुक नहीं था तब भी ऐसे तमाम किस्से और पोस्ट वायरल होते थे। नब्बे के दशक में काम भर की जवान हुई पीढ़ी को याद होगा कि उस समय पीले या हरे रंग के अख़बार कागज़ पर किसी गुमनाम प्रेस से एक पर्चा छपता था कि राजस्थान के एक आदमी को सपने में नाग देवता आए और उन्होंने कहा कि इस पर्चे को पाँच सौ लोगों में छपवा कर बँटवाओ। फलवना ने नहीं छपवाया तो उसकी माँ मर गयी और चिलवना ने छपवा कर बाँट दिया तो उसे यूपी में मास्टरी की नौकरी मिल गई। 
उस दौर में अच्छे-अच्छे लोगों ने गुमनाम छापेखानों से वो पर्चे छपवाये। उस समय फेसबुक नहीं था न ही इसका नया वर्जन मेटा था तब भी सबसे ज्यादा वायरल पोस्ट यही थी। ऐसा नहीं है कि उस समय कम पढ़े-लिखे लोग थे लेकिन हम परंपरावादी लोग हैं न! और क्या जाता है सौ - पचास पर्चे छपवा ही देने से। समझ लेंगे कि सौ रुपये जेब से गिर गये। ऐसे लोगों में तब भी विद्यार्थी थे, अध्यापक थे, प्रोफ़ेसर्स थे, वकील थे... ।
                    आज चंद्रमा पर हमारे पहुँच जाने के बाद भी गौर कीजिये कि हम आज भी वहीं हैं कि नहीं? दो - तीन से हम फेसबुक को फेसबुक पर "नोटिस" भेज रहे हैं। भेजने वालों में वही विद्यार्थी हैं, अध्यापक हैं, प्रोफ़ेसर हैं, संपादक हैं... यहाँ तक तो फिर भी ठीक था। आज मित्र-सूची में शामिल एक वकील साहब ने भी बिना टिकट और बिना नोटरी अधिकारी के मुहर /हस्ताक्षर के यह 'नोटिस' फेसबुक को खींच मारी है। फेसबुक का मालिक भी हँस रहा होगा कि जिस देश में एल. एल. बी. की डिग्री इतनी सस्ती है कि बी. एड्. बेरोज़गारों से ज्यादा एल. एल. बी. बेरोज़गर हों, वहाँ से भी न्यायायिक /गैर न्यायायिक नोटिस फेसबुक पर भेजी जा रही है। कमबख्त फेसबुक का वकील हमारे सम्मन की तामील करते-करते ही खून फेंक देगा। 
             तो साथियों रुकना नहीं है। बस कल भर का ही समय है। फेसबुक और उसके नये वर्जन मेटा को यह नोटिस जारी करते रहना है। भले मेटा साल भर पुराना हो गया हो! लेकिन याद रहे कल ही आख़िरी डेट है। कल के बाद फेसबुक आपकी सारी वो गुप्त जानकारियाँ बेच देगा, जिसे कोई भी अप्लिकेशन डाउनलोड करते हुए आपने पहले दिन ही "एलाउ" कर दिया था। 
                    इस पोस्ट को काॅपी-पेस्ट अवश्य करें। यूपी के एक रिटायर्ड मास्टर ने इसे कापी पेस्ट किया तो उसे पुरानी पेंशन मिलने लगी और अजमेर के एक आदमी ने इग्नोर किया तो.... याद आयी नब्बे के दशक की धमकी! 
नोटिस के साथ-साथ प्रणाम भी स्वीकारें। 

असित कुमार मिश्र 
बलिया 


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