Saturday, August 4, 2018

ये कहानी फ़िर सही

ये कहानी फ़िर सही...

इस साल जेठ की गर्म हवाओं के झोकों ने ज़िन्दगी के कुछ पन्ने ज़रा जल्दी पलट दिए।उन पन्नों में खुद के ही विवाह के कुछ अवतरण भी थे। उन अवतरणों में मित्र रिवेश प्रताप सिंह जी के साथ लैक्मे की लिपिस्टिक और शिल्पा की बिंदी ख़रीदने जैसा कठोर निर्णय भी शामिल था तो शेरवानी जैसे एकदिवसीय वस्त्रों के लिए हज़ारों रुपए अपव्यय का दु:ख भी।
'हम आपके हैं कौन' टाईप फ़िल्मों द्वारा प्रसारित जूता-चुराई नामक रस्म की अदायगी में सत्ताईस सौ रुपए चले जाने का असह्य ग़म तो ख़ैर किसी तरह ग़लत नहीं किया जा सकता।
कोहबर में प्रवेश के समय ग्राम-बालाओं का वह हठ कि - कोई कविता सुनाइए!
मैंने पूछा था कि कौन सी कविता ? छायावादी या प्रयोगवादी? या फिर जनवादी? दरअसल कविताओं के कई प्रकार होते हैं न!
पीछे से किसी मृगनयनी ने इठलाते हुए कहा था - प्रेम पर कोई कविता सुनाइए!
मैंने केदारनाथ सिंह की कालजयी पंक्तियाँ सुनाईं - उसका  हाथ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा कि
दुनिया को उसके हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।
तभी किसी कोमलांगी ने बिम्बफल सदृश रक्तिम अधरों को तृज्याकार मोड़ कर कहा - यह तो 'टाइफाइड' पर कविता लग रही है...।
पिछले दिनों कवि मित्र वीरू सोनकर ने सच कहा था कि कविता ख़तरे में है।
खैर! 'बन्नो तेरी अँखियाँ सुरमेदानी' से होते हुए छत पर लगे लाउड स्पीकर ने जब रुंआसी आवाज़ में गाना शुरू किया-बाबुल की दुआएँ लेती जा... तो विवाह नामक यह यज्ञ सम्पूर्ण हुआ।
               मन क्रम और वचन से 'दुल्हन ही दहेज़ है' मानने के बाद भी दुल्हन के साथ कुछ भौतिक वस्तुएँ गांठ बाँध दी गईं।मेरे हिस्से में भी कुछ स्वर्णाभूषण आए जिनमें अंगूठी और चेन टाईप कुछ संज्ञाएँ थीं।जिनका असह्य भार न सहन कर पाने की दशा में पुन:विजया जी को ही समर्पित कर देने के बाद और अँगना में मिले रुपए गाड़ी-घोड़े (यहाँ घोड़ा केवल तुक के लिए आया है) और नाच-बाजे (यहाँ नाच केवल तुक के लिए आया है) के हिसाब-किताब की बलि वेदी चढ़ गए तो जो स्थिति बनी उसे ही शास्त्रों में "पुन:मूषको भव:" कहा गया है।
                  यूँ तो जीवन में निजी कहने के लिए कुछ नहीं है किताबों के अलावा। और वो भी निजी बस इसलिए कि उन्हें ख़रीदने और रखने की जिम्मेदारी मेरी,बाकी पढ़ने ले जाने और फाड़ने की जिम्मेदारी दूसरों की।इधर कुछ वर्षों में लेखकों संपादकों और प्रकाशकों से दोस्ती का फ़ायदा यह हुआ कि घर में कुरते कम और किताबें ज्यादा होती गईं।
गाँव - जवार में जो अब थोड़े बहुत रीमा भारती और सरस सलिल के प्रशंसक बच गए हैं उनकी भी तीक्ष्ण दृष्टि पड़ी और उन्होंने कहा - बड़ी सुन्दर-सुन्दर पत्रिकाएं हैं जरा दो तो देखें क्या लिखा है इनमें!
और आगे धूमिल कहते हैं कि - 'जब सौंदर्य में स्वाद का मेल नहीं मिलता तो कुत्ते महुए के फूल पर मूतते हैं'।
यूँ किताबों का आना जब जाने का आधा रह गया तो मैंने बाहर से उठा कर सारी किताबें अंदर आलमारी में रख दीं।
और किताबों को उसी दिन निजी संपत्ति के क्षेत्र में घोषित कर दिया गया।
          विवाह निजी क्षेत्र के किस-किस कोने में प्रवेश कर सकता है यह अगले ही दिन पता चल गया जब विजया जी ने पूरी आलमारी में फ़ैली किताबों को लगभग आधे जगह में समेट दिया।
मैंने ऊँची आवाज में कहा - ये क्या हो रहा है?
उन्होंने कहा कि - आधी जगह में आपकी हिंदी की किताबें रहेंगी और आधे में मेरी संस्कृत की किताबें...।
शादी विवाह से अनजान व्यक्ति इसे निजी जीवन में अतिक्रमण कह सकता हैं लेकिन विवाहित लोग जानते हैं कि यह एक तरह का समन्वय  है। एक साहचर्य की भावना है...
उधर उन्होंने अपने हाथ में पकड़ी एक किताब की पंक्ति पढ़ते हुए कहा - यह क्या है!!
मैंने कहा- क्या?
उन्होंने किताब लगभग आँख में घुसाते हुए कहा - ये!
और मेरी आँखों ने पढ़ा - मास्टर की सुबह और रंडी की शाम नहीं ख़राब करनी चाहिए। यह उनके धंधे का समय होता है।
मैं जब तक समुचित तर्क तलाश करता तब तक उन्होंने कहा - तो यही सब पढ़ते हैं आप! और यही लिखा जा रहा है हिंदी में!
मैंने बताया - देखिए! ऐसा कुछ नहीं है। यह काशीनाथ सिंह का लिखा 'कासी का अस्सी' है और इसकी भाषा जो है ...
तब तक उन्होंने कोई दूसरी किताब निकाल कर उलटना - पलटना शुरू कर दिया था।और किसी किताब के पन्नों को देखकर कहा - उफ़! अब यह क्या है!!
मैंने फिर से देखा -
चंदर ने सुधा को पलटा और पीठ सहलाने लगा।
"ब्रा स्ट्रैप खोल दो।"
चंदर के लिए ब्रा स्ट्रैप खोलना कोई नई बात नहीं थी लेकिन वो हर बार थोड़ा-सा अटक जाता था...।
सुधा ने अपने एक हाथ से स्ट्रैप खोल दिया और अपने हाथ स्ट्रैप वाली जगह पर रख के बताया कि यहाँ सहला दो।
"दिन भर पहने-पहने निशान पड़ जाता है।"
                  और कहते हैं न कि किस्मत जब कांग्रेस होती है तो परिस्थितियाँ भी नारायण दत्त तिवारी हो जाती हैं। सैकड़ों किताबों की भीड़ में से वही किताबें मिलनी थीं? और उन किताबों के वही पन्ने खुलने थे?
मैंने कहा - देखिए ये धर्मवीर भारती के सुधा-चन्दर नहीं हैं। ये 'मुसाफिर कैफ़े' वाले दिव्य प्रकाश दुबे के सुधा-चंदर हैं।
-तो फिर ज़रूरत क्या थी इन अश्लील बातों में सुधा-चंदर को घुसाने की?
मैंने समझाया -पात्रों का नाम इतना कुछ सोचकर नहीं रखा जाता और श्लीलता-अश्लीलता के शास्त्रीय पक्ष भी तो हैं आख़िर कपड़ों के भीतर हम सभी नग्न ही तो हैं...। फिर संस्कृत में तो एक से बढ़कर एक पद हैं जहाँ अश्लीलता भी...
-तो संस्कृत के कुछ पद अश्लील हैं इस तर्क पर हिंदी अवधी भोजपुरी में भी यही हो? सच है कि श्लीलता-अश्लीलता के साहित्यिक पक्ष हैं लेकिन यह तो शब्दों की बदमाशियाँ और निजी कुंठा है। इस अश्लीलता में साहित्य कहाँ है?
मैंने बताया - ये बेस्टसेलर बुक है और पाठक की डिमांड पर ही तो...
उन्होंने अपनी किताबें समेटते हुए कहा - कुछ भी हो मेरी किताबें इन किताबों के साथ नहीं रहेंगी।
               आधे घंटे बाद कमरे के पूरब की आलमारी में भवभूति, दण्डी , कालिदास, और आनन्दवर्धन गर्वोन्नत विराजमान थे और पश्चिम की आलमारी में सत्य व्यास, नीलोत्पल मृणाल, निखिल सचान और शशिकांत मिश्र डरे-सहमे।जैसे दोनों पक्षों के बीच भीषण शास्त्रार्थ होने ही वाला हो। हम दोनों का मुँह अपने-अपने योद्धाओं की तरफ़...
रात गहराती जा रही थी।शादी ब्याह का दिन। ऊपर के कमरे में फ़िल्मी गानों से उकता कर शायद किसी लड़के ने ग़ज़ल बजानी शुरू कर दी थी - हमको किसके ग़म ने मारा। ये कहानी फ़िर सही।ये कहानी फ़िर सही...
असित कुमार मिश्र
बलिया

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