Monday, February 29, 2016

अथातो बसंत जिज्ञासा (निबंध)

प्रसाद जी द्वारा लिखित चन्द्रगुप्त नाटक पढ़ रहा था। चाणक्य का स्वगत कथन सामने था - 'समझदारी आने पर यौवन चला जाता है'...। तभी मोबाइल बजा और स्क्रीन पर अक्षर अठखेलियाँ करने लगे - चंदन मिश्रा कालिंग।
मैंने बेमन से पूछा - क्या है?
उन्होंने उतावले भाव से कहा - जल्दी आइए,यौवन देखना है तो!
मैंने किताब बंद की। ऐसा लगा मानों चाणक्य डांट रहें हों मुझे - अरे! धृष्ट, मूर्ख, बुद्धिहीन, सरस्वतीशून्य, जड़मति अभी मैंने क्या कहा था कि समझदारी आने पर यौवन चला जाता है। और तुम 'यौवन लोलुप' हो रहे हो?
मैंने भी स्वगत कथन का आश्रय लिया और कहा - हे विप्रश्रेष्ठ! मधुमास में समझदारी और यौवन का युद्ध उचित नहीं। परिणाम विपरीत भी हो सकता है। आप अन्यथा न लें, मैं अभी आता हूँ।
          चंदन भैया स्वभावतः 'रसिक' हैं। हालांकि रसिक काव्यशास्त्रीय शब्द है। रसिक वह है जो नाट्य रस का आस्वाद लेने में सक्षम है। जिसमें सुरुचि, शिष्टता और बौद्धिक क्षमता है। रस जिनका और अधिक विस्तार करता है। लेकिन जबसे सिनेमाघरों और सड़कों पर सीटियां बजाने और फब्तियां कसने वालों को रसिक समझा जाने लगा है, तबसे किसी को रसिक कहना 'काव्यशास्त्रीय' नहीं 'जोखिम' की बात हो गई है।
मैंने चंदन भैया को देखा। वो एकटक आम्र मञ्जरियों से ढके एक पेड़ को देख रहे थे।
मैंने पूछा - कहां है यौवन?
उन्होंने जैसे भावावेश में कहा - असित क्या है यह?
मैंने कहा - भाई साहब! यह आम है, एनाकार्डिएसी परिवार का पेड़। इसका वैज्ञानिक नाम मैंगीफेरा इंडिका है और अंग्रेज़ी में मैंगो ट्री। अरबी में अंबज और फारसी में अंब: कहा जाता है।
उन्होंने खीझ कर कहा - अरे विज्ञान की 'दृष्टि' से नहीं बसंत की 'दृष्टि' से देखो।  अच्छा! यह 'दृष्टि' भी साहित्य का ही विषय है। जयशंकर प्रसाद जी ने तो स्पष्ट कहा है कि - 'संस्कृति सौंदर्यबोध के विकसित होने की मौलिक चेष्टा है'। मूलतः' दृश' धातु से बना है यह, इसका अर्थ है देखना। गोस्वामी जी ने कहा है कि - जाकर रही भावना जैसी। प्रभु मूरत तिंहिं देखी तैसी।।
मतलब दृष्टि जितनी वाह्य है उतनी आंतरिक भी। भाव और भावना भी दृष्टि को देखने का दृष्टिकोण देते हैं। खैर मैंने आंखों पर बसंत का चश्मा लगाया और ज्योंही बसंत की दृष्टि से पहली नजर डाली, तो लगा कि इस सदी का सोलहवां बसंत तो है ही, इन आम्र मञ्जरियों का भी सोलहवां बसंत है। कानों में सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर जी की कर्ण प्रिय पंक्तियाँ गूंज उठीं - 'सोलह बरस की बाली उमर को सलाम। ऐ प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम'।
            यह 'सोलह बरस' का होना जितनी जैविक प्रक्रिया है उससे ज्यादा साहित्यिक प्रक्रिया।प्रक्रिया नहीं बल्कि घटना। घटना भी नहीं शायद सौंदर्य... ओह नहीं! शायद अथातो बसंत जिज्ञासा। इन आम्र मञ्जरियों को अब 'सोलहवें साल' की दृष्टि से देख रहा हूँ। कहा गया है कि - 'प्राप्ते तु षोडशे वर्षे सूकरी अपि अप्सरायते' ।सोलह वर्ष की अवस्था प्राप्त करते ही सूकरी भी अप्सरा तुल्य दिखने लगती है। फिर यह तो आम्र मञ्जरी ही है। वही आम्र मञ्जरी जो शतपथ ब्राह्मण में है, शिवपुराण में है, रामायण में है, महाभारत में है और चरक संहिता में है। यही नहीं ऋतुसंहार में भी है, मेघदूतम् में भी है, अभिज्ञान शाकुंतलम् में भी है और कुमारसंभवम् में भी है।
ऋतुसंहार में तो कालिदास लिखते हैं - 'लो प्रिया! आम्र मञ्जरियों के तीक्ष्ण बाण लेकर, और धनुष पर भ्रमरों की प्रत्यञ्चा चढ़ा कर वीर बसंत श्रृंगार करने वाले रसिकों को घायल करने आ गया है'।
कुमारसंभवम् में रति विलाप करते हुए बसंत से कहती हैं कि -'हे बसंत! जब तुम कामदेव का श्राद्ध करना तब उनके लिए पत्रों वाली आम्र की मञ्जरी अवश्य देना। क्योंकि तुम्हारे मित्र को आम की मञ्जरी बहुत प्रिय थी'...।
            आम्र मञ्जरी की इतनी चर्चा क्यों! इसलिए कि बसंत ऋतु में सौंदर्य के देवता कामदेव पुष्पबाण चलाते हैं। इन पुष्पबाणों में पांच बाण होते हैं - अरविंद बाण, अशोक बाण, आम्र मञ्जरी बाण, नवमल्लिका बाण और नीलोत्पल बाण। सम्पूर्ण प्रकृति जगत् पर इन पुष्पबाणों का प्रभाव दिखाई देता है। सोलहवें बसंत में प्रवेश कर रही नायिका भी इन पुष्पबाणों से चोटिल होती है और उसके प्रभाव को बिहारी से अच्छा कौन समझ सकता था -
अपने तनु के जानिकै, यौवन नृपति प्रवीन।
स्तन, मन, नैन, नितंब को बड़ो इजाफा कीन।।
कामदेव के पुष्पबाणों से नायिका के वक्षस्थल, मन, नेत्र और नितंब बड़े हो जाते हैं। इस प्रकार नायिका बसन्त में यौवन और सौन्दर्य से युक्त हो जाती है। मैथिल कोकिल विद्यापति ने मैथिली में इस अवस्था का मनोहारी वर्णन किया है। लेकिन संस्कृत में - आह! अद्भुत! अलौकिक!
गदितुमितिगतेद्वै चक्षुषी कर्णमूलं
तरुणि! तव कुवाम्यां वर्तमालोक्याय:।
तव यदि विधियोगात् दुर्गमार्गे स्खलन्त्या
मटदिति तनुमध्यं भज्यते नौ न दोष:।।
दोनों बड़ी हो चुकी आंखें, कानों के पास यह कहने के लिए आईं हैं कि हे नायिके सुनो! तुम्हारे वक्ष इतने बड़े हो गए हैं कि हमें आगे का रास्ता नहीं दिखता। 'विधि संयोग' से कभी तुम 'दुर्गम मार्ग' पर गिर गई, और तुम्हारी यह पतली कमर मचक गई तो हमें दोष मत देना।
श्रृंगार के ऐसे पक्ष पर यह संस्कृत-कवि ही हो सकता है जो 'विधियोगात्' लिख कर आंखों को उनके इस 'आपराधिक कृत्य' के लिए भी 'बाइज्जत बरी' कर दे। और यह दुर्गम मार्ग क्या है? कहीं वही तो नहीं, जिसे बोधा ने 'तरवारि की धारि पै धावनौ' कहा है। या फारसी शैली में जिसे 'इक आग का दरिया' कहा गया है।
            यद्यपि कि यह 'यौवन का मधुभार' अपने साथ कठिनाइयां लेकर भी आता है। इसी कठिनाई को 'कविता कौमुदी' में पंडित रामनरेश त्रिपाठी ने इस लोक प्रचलित दोहे से व्यक्त किया है -
नीक भयो जोबन गयो, तन से गई बलाय।
जने जने का रुठना, मों सो सहा न जाय।।
नायिका सोलहवें साल के प्रस्थान पर खुश है, लेकिन इस खुशी में आनंद नहीं क्षोभ है विषाद है - जाने दो बला टली। अच्छा हुआ यौवन चला गया। कितनों का दिल टूट रहा था। कितने व्यंग्य और उपालंभ सुनने पड़ते थे।कल ही कोई आशिक किसी मासूक के शवाब पर तंज करते हुए कह रहा था कि - 'जब शवाब आया है आंख क्यों चुराते हो'। इस अपयश से तो मुक्ति मिली।
लेकिन निर्दय उस नायक ने तो सौंदर्य की महत्ता पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया -
हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम।
वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती।।
इस न किए हुए कत्ल का इल्जाम लेकर जीते रहने से अच्छा है - नीक भयो जोबन गयो।
            चंदन भैया मुझसे पूछ रहे हैं - है न गजब का सौंदर्य?
मैं सोच रहा हूँ कि यह सौंदर्य भी तो शास्त्रीय विषय है। क्योंकि शब्द, रूप, रस, स्पर्श और गन्ध के माध्यम से ही मनुष्य सौंदर्य की अभिव्यक्ति या आकलन करता है। और सौन्दर्य की तीन कोटियां बताईं हैं आचार्य भरत मुनि ने।
1- सौंदर्य व्यक्ति सापेक्ष है - अर्थात् एक ही वस्तु किसी को सुंदर लग सकती है तो किसी को असुंदर।
2- सौंदर्य काल सापेक्ष है - अर्थात् एक ही वस्तु एक समय में बहुत सुंदर लगती है दूसरे समय सामान्य और बाद में असुंदर।
3- सौंदर्य स्थिति सापेक्ष भी है - अर्थात् सामाजिक मानसिक परिस्थितियां भी सौंदर्य की अनुभूति और अभिव्यक्ति में परिवर्तन कर सकती हैं। जैसे - जो गोपियां कृष्ण के साथ यमुना नदी में केलि करती थीं वही कृष्ण से वियोग की स्थिति में कहती हैं - वृथा बहति जमुना।
             मैं कुछ कह नहीं पाता। स्वीकार करता हूं कि यह यौवन का सौंदर्य है। यह दृष्टि का सौंदर्य है और बसंत का सौंदर्य भी। 'अथातो बसंत जिज्ञासा' की भी कोई सीमा है? नहीं। सौंदर्य तो अपरिमित और असीम है। चाहे वह नायिका का हो, नायक का हो, दृष्टि का हो या आम्र मञ्जरी का ही क्यों न हो।
असित कुमार मिश्र
बलिया

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