Thursday, March 3, 2016

नाम - नाम सत्य है निबंध


शीर्षक से चौंकने की आवश्यकता नहीं! गलत नहीं लिखा है, गलत लिखूंगा भी नहीं। क्योंकि यही गलती तो इस निबंध का कारण है।
भले ही रेख्ते के उस्ताद गालिब ने कहा हो कि 'नाम में क्या रखा है' लेकिन नाम की महत्ता पर संदेह नहीं किया जा सकता। नाम, नाम ही है भले ही उल्टा-सीधा क्यों न हो। तभी तो महर्षि वाल्मीकि के बारे में कहा गया है कि -
उल्टा नाम जपत जग जाना। बाल्मीक भये ब्रह्म समाना।
मानस में गोस्वामी जी नाम की महत्ता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि -
रूप विसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें।
सुमिरिअ नाम रूप बिन देखे। आवत हृदय सनेह विसेषे।।
अर्थात् नाम के बिना रूप की विशिष्टता को नहीं जाना जा सकता। इसे हथेली पर रखकर भी पहचाना नहीं जा सकता। क्योंकि बिना रूप को देखे भी नाम का स्मरण करने से विशेष प्रेम के साथ वह रूप हृदय में प्रकट हो जाता है।
           मैं नाम के स्वभाव, रूप के सापेक्ष उसकी महत्ता आदि पर शास्त्रीय विमर्श नहीं करना चाहता। मैं तो दैनिक जीवन में इन नामों के कारण होने वाली कठिनाइयों का उल्लेख मात्र करना चाहता हूं।इस नाम रुपी भवसागर में मुझ जैसे अज्ञ से लेकर आप जैसे विज्ञ तक सभी फंस कर चक्कर काटते रहते हैं। और कमाल यह कि ऐसे कठिन समय में भी बचने का आधार क्या है- यही नाम! 'कलियुग केवल नाम अधारा'।
मसल वही कि' उसी को देखकर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले'।
           मेरे अंग्रेजी के गुरुदेव बहुत विद्वान सरल और सहज हैं। मेरा सौभाग्य कि मुझे उनके साथ डर डर कर पढ़ाने का अवसर मिला। वो अक्सर नोबेल पुरस्कार विजेता टाॅमस स्टर्न्स इलियट की इस थ्योरी को मेरे दिमाग में भरते रहते थे - poetry is not a turning loose of emotion but an escape from emotion. it is not the expression of personality, but an escape from personality. अर्थात् कविता कवि व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व से पलायन है।
मैं डर डर कर कहता कि यही बात तो हिंदी में भी है आसान भाषा में कि - ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे....। गुरुदेव बस पीटते ही नहीं थे मुझे,नि:संदेह यह बड़प्पन था उनका।
         एक बार यही गुरुवर बाजार से जूता लाए, पहना, और 'जीर्णावस्थाया: प्राप्तकाले' पता चला कि यह 'गोल्ड स्टार' नहीं 'ग्लाड स्टार' है। यही नाम का जगत व्यापार है। आप बुद्धि व्यापार में भले ही निष्णात् हों इस नाम के छद्म रुप को भेदने की कला भी आनी चाहिए।
ऐसा नहीं कि जो व्यक्ति जाॅन ड्राइडन, स्काट जेम्स और सेन्ट्सबरी जैसे कठिन लेखकों को पढता-समझता हो वो 'गोल्ड स्टार' और 'ग्लाड स्टार' में अंतर न समझ सके। पर नाम के हाथों छलना लिखा था न! क्या करे कोई? क्या राम नहीं जानते थे कि काञ्चन मृग नहीं होता।
             इसी नाम की एक और ऐसी ही अवस्था तब आती है जब विवाह का निमंत्रण पत्र हाथ में हो। और लाल अक्षरों में लिखा शब्द सामने हो - 'गनेश परिणय पारबती'। नीचे स्वर्णाक्षरों में' बाल अनुरोध' कि - 'मेले मामा की छादी में जलूल से जलूल आना'।
अब संदेह उस आचार्य प्रवर कुलगुरु की विद्वता पर होता है, जिसने विवाह के पहले गण वंश गोत्र कुल इत्यादि पर तो ध्यान दिया लेकिन' गनेश परिणय पारबती' पर?  'मौनं एवास्ति'!
यहाँ तरस उस लौकिक गनेश पर आता है जिसने पारबती का वरण प्रिया के रूप में किया है।
नाम के इसी गुण को आप वाहनों के शीशे पर बलात् चिपकाए गए 'पांडेय परिवार' के साथ वाले पोस्टर्स पर भी देख सकते हैं जहां छपा होता है - संतोष परिणय अनुराग। इसे देखते ही लगता है कि हम अकस्मात् उन यूरोपीय देशों में आ गए जहाँ समलैंगिक विवाह की भी मान्यता है। यह पता करना ही कठिन है कि कौन वर है कौन वधू?
कहीं कहीं वाहनों को ढंकते हुए सर्वव्यापी बोर्ड 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' के साथ, एक छोटा बोर्ड और होता है जिस पर लिखा होता है -
राणा समरवीर बहादुर सिंह तोमर परिणय सोनी।
ऐसा लगता है मानों हाथी के साथ हरिणी को बांध दिया गया हो।
          बाज़ार भी अब ऐसी जगह बन गई है जहां 'नाम' किसी नटी की तरह नित्य लीलाएं कर रहा है। कोई सरल हृदया ग्रामीण बाला 'सास बहू सीरियल' के बीच में 'सात दिनों में पाएं गोरी त्वचा' वाले विज्ञापन देखकर, फेयर एण्ड लवली खरीद लाती है। लगातार चौदह दिन उसकी त्वचा रुपी आत्मा फेयर एंड लवली रुपी परमात्मा से एकाकार होती रहती है तब पता चलता है कि ओह! यह तो 'फेस एंड लवली' है। इसीलिये मेरी त्वचा गोरी नहीं हुई। हाय रे नाम!
बालों के सफेद होने के भय से भीता नायिका महीने भर 'केश निखार' लगाने के बाद भी यह नहीं जान पाती है कि यह केश निखार नहीं 'केश निसार' है।
         इधर व्यापार ने अपने व्यवसाय का तरीका बदल लिया है।अब चीजें देश से जोड़ी जाने लगी हैं । क्रिकेट जैसे खेल में भी टीम नहीं हारती जीतती। देश हारता जीतता है। तेल मसाले से लेकर दाल चावल तक देश का कहा जाने लगा है। महात्मा गांधी ने नमक कानून देश के लिए तोड़ा हो या नहीं, टाटा नमक 'देश का नमक' जरुर है।
कल संध्या समय मैं भी साबुन तेल नमक चीनी जैसी गृहोपयोगी वस्तुएं लाने बाजार गया था। दुकानदार श्री वर्मा जी ने पूछा था - ए बाबा! 'नमकवा' कौन सा दें?
यही बलिया है, भोजपुरी का हार्टलैण्ड। यहां हर चीज में प्रत्यय लगा कर बोला जाता है। 'नमक' यहां 'नमकवा' हो जाता है। मेरे दिमाग में भी नमक से पहले देश उभर आया और स्वत: मुख से निकला - 'टटवा' नमक ही दीजियेगा।
वर्मा जी के सहायक श्री बेदर्दी जी ने सारे सामान थैले में रखकर थैला दे दिया।
घर आते ही इस नमक ने अपने नाम का रुप दिखा दिया। यह सच में 'टटवा नमक' ही था। अब अजीब हास्यास्पद स्थिति हो गई थी। गाँव की भौजाईयां भी हंस कर कहने लगीं कि - का जी बबुआ! एमए, बीए करना सब अकारथ गया आपका।
और मैं नियति नहीं! नहीं!! नाम पर स्तब्ध था। मैं क्या जानता था कि सच में टटवा नमक भी हो सकता है। मैं दुकानदार वर्मा जी के पास गया और बोला कि वर्मा जी आपने मुझे गोल्ड स्टार के जगह पर ग्लाड स्टार धरा दिया? फेयर एंड लवली की जगह फेस एंड लवली धरा दिया? टाटा नमक की जगह टटवा नमक धरा दिया?
वर्मा जी ने कहा था - बाबा आप ईहे 'नमकवा' तो मांगे थे।
फिर नमक से नमकवा हो रहा है। खैर मैंने दोनों नमक, टाटा और टटवा का चित्र ले लिया है। और सारी स्थिति भी स्पष्ट कर दी है। मन करे तो हंस लीजिएगा मेरे एमए, बीए करने पर। या नाम के इस छल व्यापार पर। लेकिन यह जरूर कहूंगा कि - 'नाम - नाम सत्य है भाई' ! अकाट्य सत्य।
असित कुमार मिश्र
बलिया

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